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मिसालः हिंदू-मुस्लिम बेटियों ने किडनी देकर बचाई एक दूजे के परिजनों की जान, खतरे से हैं बाहर
Thu, 05 Mar 2020 12:55 PM IST
पंचकुला ब्यूरो
अमर उजाला नेटवर्क, चंडीगढ़
अमर उजाला नेटवर्क, चंडीगढ़
Published by: पंचकुला ब्यूरो
Updated Thu, 05 Mar 2020 12:55 PM IST
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मां-पति के साथ इफरा और पूजा
- फोटो : अमर उजाला
यही है इबादत, यही दीन-ओ-ईमान/ कि काम आए दुनिया में इंसान के इंसान। दो अलग-अलग धर्मों से होने के बावजूद कश्मीर की मुस्लिम बेटी और हरियाणा की एक हिंदू बेटी ने वो कर दिखाया जो मजहब के नाम पर नफरत फैलाने वालों के लिए सबक है और हमारी गंगा जमुनी तहजीब की मिसाल। कश्मीर की रहने वाली इफरा जान (20) ने यमुनानगर (हरियाणा) के 33 वर्षीय अजय कुमार को अपनी किडनी दान दी तो अजय की पत्नी गीता (30) ने इफरा की मां जुबैदा बानो (47) को अपनी किडनी दान देकर उनकी जान बचाई।
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कुलगाम, जम्मू-कश्मीर की रहने वाली 20 वर्षीय इफरा जान 12वीं कक्षा में पढ़ती हैं। उन्होंने बताया कि उनकी मां जुबैदा बानो की दोनों किडनी खराब हो गई थीं। ऐसे में किडनी ट्रांसप्लांट के लिए वह पंचकूला के अल्केमिस्ट अस्पताल पहुंचे। अब्बू ने अम्मी को किडनी देने की इच्छा जाहिर की लेकिन वह मेडिकली फिट नहीं पाए गए।
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अम्मी-अब्बू के अलावा बस मेरा एक छोटा भाई है। ऐसे में मेरे अलावा कोई और विकल्प नहीं बचा था। जांच के बाद मेरी किडनी मेरी अम्मी के ग्रुप से नहीं मिल पाई। ऐसे में डाक्टरों ने स्वैप किडनी ट्रांसप्लांट का विकल्प रखा। इसके बाद हमें यमुनानगर (हरियाणा) के 33 वर्षीय अजय कुमार और उनकी पत्नी पूजा मिले। अजय कुमार की भी दोनों किडनी खराब हो चुकी थीं।
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ऐसे में उनकी पत्नी किडनी देने को तैयार थीं लेकिन उनका भी ग्रुप उनसे मैच नहीं हुआ। इसके बाद डाक्टरी जांच में हम दोनों के ग्रुप एक दूसरे से मैच हो गए और हमने एक दूसरे के परिजनों की जान बचाने के लिए किडनी की अदला-बदली का फैसला लिया। इंसानियत भी यही कहती है कि हमें एक दूसरे के सुख-दुख में हमेशा काम आना चाहिए, चाहे हम किसी भी मजहब के हों।
उधर, दोनों मरीजों का किडनी ट्रांसप्लांट करने वाले अल्केमिस्ट अस्पताल के किडनी ट्रांसप्लांट सर्जन डॉ. नीरज गोयल और डॉ. रमेश कुमार ने बताया कि जम्मू-कश्मीर क ा केस होने के कारण कागजी प्रक्रिया पूरी होने में थोड़ा विलंब हुआ लेकिन दोनों मरीज अब पूरी तरह खतरे से बाहर हैं। उनकी दोनों किडनी खराब होने के कारण वे लगातार डायलिसिस पर थे, जिसका साइड इफैक्ट लगातार बढ़ रहा था।
ऐसे में उनका किडनी ट्रांसप्लांट जरूरी हो गया था। परिजन उन्हें अपनी किडनी देना चाह रहे थे लेकिन ग्रुप मैच न होने के कारण ऐसा संभव नहीं हो पा रहा था। हॉस्पिटल में स्वैप किडनी ट्रांसप्लांट के जरिए उन्हें एक-दूसरे के बारे में जानकारी मिली और ट्रांसप्लांट संभव हो पाया।