चंडीगढ़ में एमपीलैड्स फंड में खेल: एक टॉयलेट का खर्च 17 लाख.. इंजीनियरिंग विभाग के एस्टीमेट्स से MP भी स्तब्ध
चंडीगढ़ नगर निगम वित्तीय संकट से जूझ रहा है। कई पार्षदों ने सांसद मनीष से एमपीलैड्स फंड से छोटे-छोटे कामों के लिए पैसे मांगे। तिवारी के हामी भरने के बाद जब उन कार्यों के लिए एस्टीमेट्स बने तो खुद सांसद हैरान रह गए।
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चंडीगढ़ में एमपीलैड्स फंड से किए जा रहे विकास कार्यों के खर्चे सवालों के घेरे में आ गए हैं। इंजीनियरिंग विभाग के एस्टीमेट्स इतने चौंकाने वाले हैं कि खुद सांसद मनीष तिवारी भी दंग रह गए।
एक सोलर लाइट की कीमत 70 हजार रुपये तो सीमेंट का बेंच 40 हजार रुपये का बताया गया है। इतने महंगे एस्टीमेट्स को देखकर सांसद तिवारी ने ऐसे एस्टीमेट्स का ऑडिट कराने की सिफारिश की है। मामला अब मंत्रालय तक भी पहुंच सकता है।
नगर निगम वित्तीय संकट से जूझ रहा है। ऐसे में कई पार्षद तिवारी के पास पहुंचे और उन्होंने एमपीलैड्स फंड से छोटे-छोटे कामों के लिए पैसे मांगे। तिवारी ने पैसे देने के लिए हामी भरी और जब उन कार्यों के लिए एस्टीमेट्स बने तो पता चला कि जो खर्च इंजीनियरिंग विभाग ने बताया वो सामान्य रेट से कई गुना ज्यादा हैं।
पब्लिक टाॅयलेट का खर्च 17 लाख
सेक्टर-38सी में एक पब्लिक टॉयलेट बनवाना था। तिवारी ने पैसे देने की बात कही तो इंजीनियरिंग विभाग ने एक टॉयलेट का 17 लाख रुपये का खर्च बता दिया। यही नहीं, पांच सोलर लाइट लगाने का खर्च 3.51 लाख रुपये बताया गया। यानी एक सोलर लाइट करीब 70 हजार रुपये की। सूत्रों ने बताया कि यही सोलर लाइट्स 11 हजार रुपये में लगते हैं। कुछ पार्कों में सीमेंट का बेंच लगाने के लिए भी तिवारी ने पैसा देने की बात कही तो इंजीनियरिंग विभाग ने 10 सीमेंट के बेंच लगाने का खर्च 4.03 लाख रुपये बता दिया गया। यानी एक बेंच 40 हजार रुपये का। जबकि सीमेंट के बेंच मनीष तिवारी ने पिछले लोकसभा क्षेत्र में करीब 2400 रुपये का एक लगवाया था।
गलियों में पेवर ब्लॉक लगाने का खर्च बताया 41 लाख रुपये
हल्लोमाजरा में 5 गलियों में पेवर ब्लॉक लगाने का काम था तो इसका एस्टीमेट 41 लाख रुपये का बनाया गया। ऐसे कई अन्य कार्यों का खर्च कई गुना ज्यादा बताया गया, जिससे नाराज होकर तिवारी ने डीसी निशांत कुमार यादव को एक पत्र लिखा और ऐसे एस्टीमेट्स की ऑडिट कराने की मांग की। ऐसा ही सीसीटीवी कैमरों में भी देखने को मिला, जिसपर तिवारी ने कैमरों की स्पेसिफिकेशन तय किए जाने की मांग की है ताकि इसमें भी कोई गड़बड़ी न हो।
तिवारी के पत्र के बाद इंजीनियरिंग विभाग ने सफाई भी दी है। हालांकि सूत्रों का कहना है कि तिवारी इससे संतुष्ट नहीं है और मामला यहीं थमने वाला नहीं है। इसकी सूचना सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय को भी दी जा सकती है, ताकि वो अपने स्तर पर इसकी उच्च स्तरीय जांच करा सकें।
ऐसे पकड़ में आया महंगे एस्टीमेट का खेल
अमूमन सांसद की तरफ से किसी भी काम को कराने के लिए काम की सिफारिश डीसी को भेजी जाती है। वह सिफारिशों की जांच-पड़ताल करके कार्य स्वीकृत करते हैं और एमपीलैड्स फंड से पैसे उपलब्ध कराते हैं। लोगों की सहूलियत को देखते हुए चंडीगढ़ में यह व्यवस्था बनाई गई कि जो भी काम कराना है, उसकी जानकारी पहले इंजीनियरिंग विभाग को दे दी जाए, ताकि पता चल सके कि उस पर कितना खर्च आएगा और उस अनुसार ही एमपीलैड्स फंड से राशि जारी करने की सांसद की तरफ से सिफारिश की जाए। इस दौरान ही तिवारी ने पाया कि हर काम के लिए सामान्य से कई गुना ज्यादा एस्टीमेट बनाए जा रहे हैं।
ऑडिट सेंट्रल भी जता चुका है आपत्ति
प्रिंसिपल डायरेक्टर ऑफ ऑडिट (सेंट्रल) चंडीगढ़ ने यूटी प्रशासन के इंजीनियरिंग विभाग के एक विंग के वर्ष 2020-21 के ऑडिट में एस्टीमेट्स पर आपत्ति जताई थी। कहा कि उस वर्ष विंग ने 10 काम पूरे किए। इनकी अनुमानित राशि काफी ज्यादा थी, क्योंकि ठेकेदार ने इन कामों को 17.75 फीसदी से 81.86 फीसदी तक के डिस्काउंट पर लिया। लिखा है कि इससे यह साबित होता है कि अनुमानित राशि काफी ज्यादा तय की जा रही है, जबकि ऐसा करना जरूरी नहीं है।