{"_id":"59d4bd2c4f1c1bae538b5be5","slug":"money-fraud-via-commettes-in-chandigarh","type":"feature-story","status":"publish","title_hn":"पैसे के नुकसान और ठगी से बचना है तो भूल कर भी न करें ये काम","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
पैसे के नुकसान और ठगी से बचना है तो भूल कर भी न करें ये काम
राजेश ढल्ल/अमर उजाला, चंडीगढ़
Updated Thu, 05 Oct 2017 09:03 AM IST
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- फोटो : money
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अगर आप ठगी और आर्थिक नुकसान से बचना चाहते हैं तो सावधानी में ही बचाव है। भूल कर भी ये काम न करें, वरना पछताएंगे और कानूनी झमेला भी होगा। चंडीगढ़ में कमेटियों का खेल जमकर चल रहा है। कमेटियों के चंगुल में शहर के 40 प्रतिशत से ज्यादा फंसे हैं, जबकि कमेटियों का कोई कानूनी आधार नहीं है। इसमें निवेश और मिलने वाली राशि को भी आयकर रिकॉर्ड में शामिल नहीं किया जा सकता।
इसके बावजूद हर माह शहर में करोड़ों रुपये का कमेटियों का कारोबार हो रहा है, जिसे पुलिस भी नहीं रोक पा रही है। मालूम हो कि धनास के एक दंपति पर 100 से ज्यादा लोगों को कमेटियों के नाम पर ठगने का आरोप लगा है। दंपति अपना मकान बेचकर फरार हो गए हैं। इस समय 70 प्रतिशत व्यापारियों ने कमेटियां डाली हुईं हैं। कमेटियों में अघोषित आय को निवेश किया जाता है। जबकि ठगी का यह धंधा जारी रहने की उम्मीद है।
कमेटियों का धंधा विश्वास पर चल रहा है। सरकारी कार्यालयों से लेकर कालोनियों तक कमेटियों का कारोबार चल रहा है। कमेटियों के कारोबार से जुड़े कई लोग ऐसे भी हैं, जो पिछले 25 से 35 साल से कमेटियों के आयोजक बने हुए हैं। कमेटियों की हर माह आने वाली किस्त और इसके भुगतान का सारा रिकार्ड कच्चे कागजों में ही रखते हैं।
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कमेटी डालने वाले भी भाग जाते हैं
ऐसा नहीं कि कमेटी के आयोजक ही फरार होते हैं, कमेटी डालने वाले भी कई बार फरार हो जाते हैं। अगर कोई कमेटी का सदस्य भागता है तो उसके नुकसान की भरपाई कमेटी आयोजक करता है, क्योंकि कमेटी लेने वाले की समय पर भुगतान करने की जिम्मेदारी कमेटी आयोजक की ही होती है, चाहे कोई कमेटी का सदस्य मासिक किस्त का भुगतान करे या नहीं।
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इसके बावजूद हर माह शहर में करोड़ों रुपये का कमेटियों का कारोबार हो रहा है, जिसे पुलिस भी नहीं रोक पा रही है। मालूम हो कि धनास के एक दंपति पर 100 से ज्यादा लोगों को कमेटियों के नाम पर ठगने का आरोप लगा है। दंपति अपना मकान बेचकर फरार हो गए हैं। इस समय 70 प्रतिशत व्यापारियों ने कमेटियां डाली हुईं हैं। कमेटियों में अघोषित आय को निवेश किया जाता है। जबकि ठगी का यह धंधा जारी रहने की उम्मीद है।
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कमेटियों का धंधा विश्वास पर चल रहा है। सरकारी कार्यालयों से लेकर कालोनियों तक कमेटियों का कारोबार चल रहा है। कमेटियों के कारोबार से जुड़े कई लोग ऐसे भी हैं, जो पिछले 25 से 35 साल से कमेटियों के आयोजक बने हुए हैं। कमेटियों की हर माह आने वाली किस्त और इसके भुगतान का सारा रिकार्ड कच्चे कागजों में ही रखते हैं।
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कमेटी डालने वाले भी भाग जाते हैं
ऐसा नहीं कि कमेटी के आयोजक ही फरार होते हैं, कमेटी डालने वाले भी कई बार फरार हो जाते हैं। अगर कोई कमेटी का सदस्य भागता है तो उसके नुकसान की भरपाई कमेटी आयोजक करता है, क्योंकि कमेटी लेने वाले की समय पर भुगतान करने की जिम्मेदारी कमेटी आयोजक की ही होती है, चाहे कोई कमेटी का सदस्य मासिक किस्त का भुगतान करे या नहीं।
कमेटी आयोजक को क्या है फायदा
Fraud shimla
कमेटी आयोजक को फायदा होता है कि कमेटी डालने के दूसरे माह में सदस्यों द्वारा बोली नहीं कराई जाती है। उस माह सभी सदस्यों को कमेटी की पूरी राशि का भुगतान करना होता है। सदस्यों को कोई भी प्रोफिट नहीं होता है। उदाहरण के तौर पर अगर कमेटी के 15 सदस्य हैं और 10 हजार रुपये प्रति माह की कमेटी चलती है तो कमेटी आयोजक को दूसरे माह डेढ़ लाख की राशि बिना बोली के मिल जाती है,
जबकि इस माह को छोड़कर बाकी सभी माह बोली होती है। कमेटी का सदस्य घाटे पर बोली देकर कमेटी हासिल करता है। जो सबसे ज्यादा घाटे की बोली देता है, उसे कमेटी दे दी जाती है। यह घाटा सभी सदस्यों में बंट जाता है, जो कि कमेटी का प्रोफिट माना जाता है। शुरुआत में घाटे की बोली ज्यादा होने पर सदस्यों को ज्यादा प्रोफिट होता है। जैसे जैसे कमेटी के माह बढ़ते जाते हैं, प्रोफिट कम होता जाता है।
क्यों लोग डालते है कमेटियां
लोग इसे बचत और प्रोफिट का सबसे बढ़िया तरीका मानते है। लोगों का कहना है कि हर माह अपनी कमाई से एक हिस्सा भुगतान करने की आदत हो जाती है। इसी बहाने से सेविंग हो जाती है। सेविंग के साथ साथ हर माह बोली का प्रोफिट मिल जाता है। कमेटी डालने वाले एक व्यापारी विनय सिंह का कहना है कि बैंक में राशि जमा करने से काफी कम ब्याज मिलता है, जबकि कमेटी डालने से प्रोफिट तो होता ही है। साथ ही कुछ माह बाद एक मुश्त राशि मिल जाती है। जिसे प्रापर्टी या कारोबार में निवेश कर दिया जाता है, जिससे कारोबार भी बढ़ता है।
जबकि इस माह को छोड़कर बाकी सभी माह बोली होती है। कमेटी का सदस्य घाटे पर बोली देकर कमेटी हासिल करता है। जो सबसे ज्यादा घाटे की बोली देता है, उसे कमेटी दे दी जाती है। यह घाटा सभी सदस्यों में बंट जाता है, जो कि कमेटी का प्रोफिट माना जाता है। शुरुआत में घाटे की बोली ज्यादा होने पर सदस्यों को ज्यादा प्रोफिट होता है। जैसे जैसे कमेटी के माह बढ़ते जाते हैं, प्रोफिट कम होता जाता है।
क्यों लोग डालते है कमेटियां
लोग इसे बचत और प्रोफिट का सबसे बढ़िया तरीका मानते है। लोगों का कहना है कि हर माह अपनी कमाई से एक हिस्सा भुगतान करने की आदत हो जाती है। इसी बहाने से सेविंग हो जाती है। सेविंग के साथ साथ हर माह बोली का प्रोफिट मिल जाता है। कमेटी डालने वाले एक व्यापारी विनय सिंह का कहना है कि बैंक में राशि जमा करने से काफी कम ब्याज मिलता है, जबकि कमेटी डालने से प्रोफिट तो होता ही है। साथ ही कुछ माह बाद एक मुश्त राशि मिल जाती है। जिसे प्रापर्टी या कारोबार में निवेश कर दिया जाता है, जिससे कारोबार भी बढ़ता है।
होटल में होती है कमेटियां
fraud for employment
व्यापारियों की अधिकतर कमेटियां होटलों में होती है, जिसे किटी का भी नाम दिया जाता है। यहां पर जो व्यापारी एवं सदस्य घाटे की सबसे ज्यादा बोली देकर कमेटी लेता है, वह ही होटल के खाने पीने के बिल का भुगतान करता है कई कमेटियों में हर सदस्य से होटल का आने वाला बिल आपस में बांट दिया जाता है।
लोगों का कहना है कि इससे सदस्यों में आपस में संबंध भी अच्छे होते हैं। जो कमेटियां करोड़ों रुपये की होती है, उसमें पूरा परिवार शामिल होता है। शहर से बाहर पर्यटक स्थलों में भी ऐसी बड़ी कमेटियों की बोली होती है। कमेटी का कार्यकाल 10 से 24 माह का होता है।
कानूनी नहीं होती है कमेटियां: डीएसपी
डीएसपी क्राइम पवन कुमार का कहना है कि कमेटियां का कोई कानूनी आधार नहीं है। देश भर में कई मामले समय समय पर ऐसे आ चुके हैं, जिसमें कमेटी के आयोजक लोगों के लाखों करोड़ ठगकर भाग चुके हैं। इसलिएकमेटियों से लोगों को बचना चाहिए।
कई अपनी घोषित आय को भी काले धन में बदले देते हैं
आयकर वकील हितेश पुरी का कहना है कि अधिकतर वह लोग कमेटियों में अघोषित आय को निवेश करते हैं। जबकि कुछ लोग ऐसे भी हैं जो अनजाने में अपनी घोषित आय को कमेटियों में लगाकर काले धन में बदल रहे हैं। इनमें अधिकतर कर्मचारी वर्ग हैं, जिन्हें हर माह घोषित वेतन मिलता है।
जिनका वह आयकर भी हर साल अदा करते हैं। पुरी का कहना है कि कमेटियों से होने वाली आय को लीगल बना सकते हैं, लेकिन इसके लिए व्यक्ति को 30.9 प्रतिशत का टैक्स अदा करना पड़ता है। ऐसे व्यक्ति को आयकर विभाग को बताना पड़ता है कि अन्य स्त्रोत से कमाई हुई है, जिनमें लाटरी, जुआ और पुरस्कार शामिल होता है।
लोगों का कहना है कि इससे सदस्यों में आपस में संबंध भी अच्छे होते हैं। जो कमेटियां करोड़ों रुपये की होती है, उसमें पूरा परिवार शामिल होता है। शहर से बाहर पर्यटक स्थलों में भी ऐसी बड़ी कमेटियों की बोली होती है। कमेटी का कार्यकाल 10 से 24 माह का होता है।
कानूनी नहीं होती है कमेटियां: डीएसपी
डीएसपी क्राइम पवन कुमार का कहना है कि कमेटियां का कोई कानूनी आधार नहीं है। देश भर में कई मामले समय समय पर ऐसे आ चुके हैं, जिसमें कमेटी के आयोजक लोगों के लाखों करोड़ ठगकर भाग चुके हैं। इसलिएकमेटियों से लोगों को बचना चाहिए।
कई अपनी घोषित आय को भी काले धन में बदले देते हैं
आयकर वकील हितेश पुरी का कहना है कि अधिकतर वह लोग कमेटियों में अघोषित आय को निवेश करते हैं। जबकि कुछ लोग ऐसे भी हैं जो अनजाने में अपनी घोषित आय को कमेटियों में लगाकर काले धन में बदल रहे हैं। इनमें अधिकतर कर्मचारी वर्ग हैं, जिन्हें हर माह घोषित वेतन मिलता है।
जिनका वह आयकर भी हर साल अदा करते हैं। पुरी का कहना है कि कमेटियों से होने वाली आय को लीगल बना सकते हैं, लेकिन इसके लिए व्यक्ति को 30.9 प्रतिशत का टैक्स अदा करना पड़ता है। ऐसे व्यक्ति को आयकर विभाग को बताना पड़ता है कि अन्य स्त्रोत से कमाई हुई है, जिनमें लाटरी, जुआ और पुरस्कार शामिल होता है।