दिल्ली में हार पर भाजपाई मंत्री ने ये क्या कह दिया?
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दिल्ली चुनाव में यदि मुख्यमंत्री पद का दावेदार जनता और पार्टी के बीच का चेहरा होता, तो निसंदेह भाजपा दिल्ली में हारती नहीं। दिल्ली भाजपा की ओर से चुनाव प्रचार में नकारात्मकता भी दिखाई दी।
पीएम मोदी की उपलब्धियों को आगे रखकर ये चुनाव नहीं लड़ा गया। इसलिए दिल्ली में भाजपा का चुनाव हारना लाजिमी था। बाहर से लाए गए नेताओं पर भी भाजपा को दांव लगाने की जरूरत नहीं थी।
यह विचार ‘अमर उजाला’ से विशेष बातचीत में हरियाणा के कैबीनेट मंत्री अनिल विज ने व्यक्त किए। वह दिल्ली चुनाव के दौरान भाजपा की हार पर चर्चा कर रहे थे। विज ने कहा कि ऐसा नहीं है कि देश में मोदी का जादू खत्म हो गया है या लोग भाजपा को नकार चुके हैं। भाजपा ने देश के लोगों में एक नई उम्मीद जगाई है।
दिल्ली चुनाव के दौरान कई ऐसी कमियां रह गईं, जिनकी वजह से जानता ने भाजपा को नकार दिया। नैतिकता के आधार पर हार को स्वीकार किया गया है।
'पार्टी वर्करों में किरण बेदी को लेकर नाराजगी थी'
विज के अनुसार, उनकी नजर में दिल्ली चुनाव में सीएम पद के लिए ठोस दावेदार की कमी सबसे ज्यादा नुकसानदायक रही। भाजपा ने हाल ही में जो भी विधानसभा चुनाव लड़े हैं, उनमें से किसी में भी पहले से सीएम पद के लिए कोई चेहरा प्रोजेक्ट नहीं किया गया था।
हां, चर्चाएं होती रही थीं। ये सभी चुनाव पीएम मोदी की उपलब्धियों और उनकी शख्सियत को सामने रखकर लड़े गए थे। लेकिन, ऐसा दिल्ली में नहीं किया गया। विज ने कहा, ‘इसमें कोई शक नहीं है कि किरण बेदी ईमानदार छवि वाली हैं।
लेकिन, अचानक इस चेहरे को दिल्ली में सालों से समर्पित भाजपा नेताओं और वर्करों पर थोपना, मेरी नजर में रणनीतिकारों का उचित कदम नहीं था। क्या दिल्ली में भाजपा के समर्पित नेताओं की कमी थी, जो आयात करके किरण बेदी को उन पर थोपा गया।
भाजपा नेतृत्व को चाहिए था कि दिल्ली भाजपा में से ही एक लोकप्रिय नेता को सक्रिय किया जाता और उसके बूते पर चुनाव लड़ा जाता।’
विज के अनुसार, दिल्ली में हार के बाद अब ये बात उठ रही है कि भाजपा का वर्कर किरण बेदी को अचानक सीएम प्रत्याशी के रूप में उतारने से खफा था। ऐसा इसलिए कहा जा रहा है, क्योंकि कहीं न कहीं पार्टी वर्करों में इस बात को लेकर नाराजगी थी। इसका खामियाजा भाजपा को भुगतना पड़ा।
विज ने दावा किया कि भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व में कोई कमी नहीं है, मगर दिल्ली चुनाव में जो भी हुआ, उसके लिए रणनीतिकारों को मंथन जरूर करना होगा, समर्पित पार्टी नेताओं और वर्करों की बात को गंभीरता से लेना होगा।