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मिल्खा सिंह: नंगे पैर स्कूल जाते थे...धूप में न जलें पांव इसलिए लगाते थे सात मील तक की दौड़

Sun, 20 Jun 2021 10:19 AM IST
ajay kumar कविता बिश्नोई, अमर उजाला, चंडीगढ़
कविता बिश्नोई, अमर उजाला, चंडीगढ़ Published by: ajay kumar Updated Sun, 20 Jun 2021 10:19 AM IST
सार

मैंने पहली कार 1958 में अपने 500 रुपये की इनामी राशि से खरीदी थी। यह इनामी राशि मुझे पटियाला के महाराजा यादविंद्र की ओर से भेंट गई थी। उन्होंने मुझे चुनौती दी थी कि अगर तुम पाकिस्तान के फ्लाइंग बर्ड अब्दुल खालिक को 200 मीटर रेस में हरा दोगे तो मैं तुम्हें 500 रुपये का इनाम दूंगा। मैंने ये कर दिखाया और इस तरह मैंने जिंदगी की पहली कार खरीदी।

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Milkha Singh shared the story of his struggle in his autobiography
मिल्खा सिंह - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

महान धावक मिल्खा सिंह ने अपने जीवन के संघर्ष और सफलता को आत्मकथा ‘द रेस ऑफ माई लाइफ’ में पिरोया है। इस आत्मकथा को लिखने में उनकी बेटी सोनिया ने सहयोग किया है। बचपन में स्कूल जाते समय शरारत हो या बंटवारे में परिवार से बिछड़ने का दर्द, इस किताब में उनके जीवन के हर छोटी-बड़ी बात का जिक्र है।

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मिल्खा सिंह ने किताब के आखिरी पेज पर लिखा है कि ये मेरे अंतिम शब्द हैं, खिलाड़ी की जिंदगी बहुत मुश्किल होती है। बहुत बार दिमाग में आता है कि ये जंग छोड़ दो लेकिन याद रखो जीत का कोई शॉर्टकट नहीं है। ऐसे समय में उर्दू की एक कहावत आपको प्रेरणा दे सकती है : मिटा दे अपनी हस्ती को अगर कोई मरतबा चाहे, कि दाना खाक में मिल कर गुल-ए-गुलजार होता है। उनकी किताब से कुछ अनुभवों को हम आपसे साझा कर रहे हैं...
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..और पिताजी को रोजाना अंग्रेजी का एक ही पैराग्राफ सुना देता था
किताब में मिल्खा सिंह ने लिखा है कि मेरी पांचवीं कक्षा की पढ़ाई गोबिंदपुरा गांव के स्कूल में पेड़ों के नीचे हुई थी। मेरा पढ़ाई की तरफ रुझान कम था। पिताजी चाहते थे कि पढ़ लिखकर घर की आर्थिक स्थिति सुधारने में मदद करूं, इसलिए उन्होंने कोट अड्डू के सरकारी स्कूल में मेरा दाखिला करवा दिया। 

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स्कूल की दूरी मेरे घर से सात मील (11.26 किमी) थी। उस समय घड़ी नहीं होती थी तो सुबह गांव से जब मुल्तान की ट्रेन जाती तब अपने दोस्त साहिब के साथ मैं स्कूल के लिए निकलता था। घर आते समय बहुत तेज धूप होती थी, इसलिए मैं सात मील नंगे पांव भागकर ही आता था। 

स्कूल से घर आने में लगभग दो घंटे लगते थे। स्कूल समय में ही खूब दौड़ लगाई थी। नए स्कूल में अंग्रेजी उबाऊ विषय था। मेरे पिता को अंग्रेजी नहीं आती थी लेकिन वे खुश थे क्योंकि मैं अंग्रेजी पढ़ रहा था। रोजाना शाम को वे मुझे किताब पढ़कर सुनाने को बोलते और मैं रोजाना एक ही पैराग्राफ पढ़ देता था, क्योंकि मुझे लगता था उन्हें कौन सी अंग्रेजी आती है।

बंटवारे के दौरान 15 अगस्त 1947 को पिता ने पहली बार बोला ‘भाग मिल्खा भाग’ 
विभाजन की घोषणा के बाद 15 अगस्त 1947 की आधी रात को गांव गोबिंदपुरा में उपद्रव मच गया, मुस्लिम सिखों और हिंदुओं को मार रहे थे। सुबह लगभग 4 बजे का समय था, जब मेरे घर भी हाहाकार मच गया था, घर की सारी औरतों को गुरुद्वारे में पनाह दिलवाई गई थी। मेरे पिता लाठी और तलवारों से ही बचाव करने में लगे थे।

मैं इधर से उधर जान बचाते छिप रहा था और अपने पिता को हमारे लिए लड़ते देख रहा था। तभी अचानक मैंने देखा कि वो धराशायी हो गए और चिल्लाए ‘भाग मिल्खा भाग’। मैं सहम गया और मुश्किल से ही हिल पा रहा था। तभी मुझे पता चला कि पास के गुरुद्वारे में जहां मेरी मां को रखा गया था, उसे आग लगा दी गई है। मेरे भाई दौलत और आमिर ने अपनी पत्नियों और बेटियों का कत्ल कर दिया, जिससे उन्हें गलत हाथों से बचाया जा सके।

मेरी एक बहन हूंडी अपनी एक साल की बेटी को लेकर वहां से जिंदा भाग निकली थी। मेरे दिमाग में सिर्फ ‘भाग मिल्खा भाग’ घूम रहा था। मैं पता नहीं कब कोट अड्डू रेलवे स्टेशन पहुंचा, लहूलुहान हालत में स्टेशन पर मैं मुल्तान के लिए ट्रेन में बैठा। जहां मेरे फौजी भाई की पत्नी आर्मी बैरक में रह रही थी।

बहन ने जेल से छुड़ाने के लिए बेची थी बालियां, 1960 ओलंपिक मैच से पहले लौटाईं 
मेरी एक बहन ईशर दिल्ली में अपने ससुराल वालों के पास रहती थी। एक बार मैं वर्ष 1948 में शहादरा से दिल्ली की लोकल ट्रेन में बिना टिकट पकड़ा गया। हालांकि इससे पहले मैंने हमेशा बिना टिकट ही चोरी छिपे सफर किया था। इसके बाद मुझे मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया।

मुझे तीन महीने की जेल या 15 रुपये के जुर्माने की सजा मिली। मेरे पार कौड़ी भी नहीं थी, इसलिए मुझे तीन माह के लिए जेल में डाल दिया गया। कुछ दिन बाद मैंने ईशर को इसका संदेश पहुंचाया, उसने मुझे रिहा करवाने के लिए अपनी सोने की बालियां बेच दीं। हालांकि ससुराल में उसकी हालत अच्छी थी। 

इसके बाद पहली बार मेरे परिवार का कोई सदस्य (मेरी बहन ईशर) वर्ष 1960 में रोम ओलंपिक से पहले दिल्ली स्टेडियम में मुझे भागते हुए देखने के लिए आई, इससे पहले उसने मेरे बारे में सिर्फ लोगों से सुना था। उसने मुझे कहा ‘तू धीरे भागा कर, तू बेहोश हो जाता है’ यह कहकर वह रोने लगी। उसे नहीं पता था कि उस दिन उसके लिए मैंने सरप्राइज रखा था। मैंने उसे अपना इंडिया लिखा कोट पहनाया और कहा जेब में हाथ डालकर दिखाओ। मैंने दोनों जेब में सोने की बालियां रखी थीं और वो बस लगातार रोए जा रही थी।

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