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रोजीरोटी को मोहताज हुए मजदूरों का दर्द छलका, बोले- कोरोना संक्रमण से नहीं, भूख से डर लगता है

Thu, 23 Jul 2020 11:42 AM IST
खुशबू गोयल मोनिका नागर, चंडीगढ़
मोनिका नागर, चंडीगढ़ Published by: खुशबू गोयल Updated Thu, 23 Jul 2020 11:42 AM IST
सार

  • लेबर चौक पर काम की उम्मीद में दिन भर बैठे रहते हैं मजदूर
  • खाली हाथ शाम को मायूस लौट जाते हैं, झेल रहे भुखमरी के हालात

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Migrant Workers Life Reality Check in Corona Pandemic Perios from Labour Chowk Chandigarh
लेबर चौक पर जमा हुए मजदूर - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

कोरोना महामारी के दौर ने देश के मजदूर वर्ग से कैसे रोजी-रोटी छीन ली है, इसका जीता जागता उदाहरण है चंडीगढ़ का लेबर चौक। चार महीने से बेरोजगार बैठे मजदूर कर्ज लेकर गुजारा करने को मजबूर हैं। सेक्टर 44-45 के लेबर चौक पर बैठे मजदूरों की आंखों में दर्द का समंदर है। अपनी बेबसी बयां करने के लिए शब्द तक नहीं हैं। आप आंखों की भाषा पढ़ पाएं तो इनका दर्द महसूस कर सकते हैं।
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सोशल डिस्टेंसिंग और मास्क पहनने के सरकारी फरमानों के बीच इनकी जिंदगी पिसकर रह गई है। रोजीरोटी का संकट सामने हो तो सोशल डिस्टेंसिंग का कहां तक पालन होगा। मजदूरों की यह वह जमात है, जो कोरोना काल में भी चंडीगढ़ छोड़कर नहीं गई। इस उम्मीद में कि संकट टल जाएगा। अच्छा वक्त आएगा। लेकिन आज इनके सामने भुखमरी के हालात हैं। नमक के साथ  रोटी तक नसीब नहीं है।
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लॉकडाउन के पहले सूने रहने वाले लेबर चौक आज मजदूरों से भरे पड़े हैं। कोई काम नहीं है। इन मजदूरों के कंधों पर यूपी बिहार में रह रहे अपने परिवारों को पालने की जिम्मेदारी भी है। दोबारा लॉकडाउन लगने की बात सुनकर ही ये सिहर जाते हैं। आंखों के सामने पुराने मंजर घूम जाते हैं। मजदूर बस यही चाहते हैं कि प्रशासन कोरोना से लड़ने के साथ साथ उनकी रोजी रोटी की भी व्यवस्था करे।
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एक सप्ताह से नहीं मिला कोई काम

गोरखपुर निवासी लालचंद ने बताया कि मैं चंडीगढ़ में अकेला रहता हूं। एक सप्ताह से कोई काम नहीं मिला। सुबह 7 बजे लेबर चौक पर आ जाता हूं और रात को 8 बजे घर जाता हूं। उधार पैसे लेकर गुजारा चल रहा है। सरकार की तरफ से राशन तक नहीं मिल रहा। नेताओं की सिफारिश वालों को ही राशन दिया गया।

दो वक्त की रोटी के लिए भी तरस गए
जौनपुर निवासी 56 वर्षीय नारायण ने बताया कि मेरा परिवार यूपी में ही रहता है। मेहनत मजदूरी करके उनके लिए हर महीने कुछ न कुछ रुपये भेज दिया करता था लेकिन चार महीने से काम नहीं मिला। ऐसे में परिवार के लिए भी कुछ नहीं भेज सका। नौबत भुखमरी की आ गई है। दो वक्त की रोटी के लिए भी तरस जाएंगे, यह तो कभी सपने में भी नहीं सोचा था।

काम छिन गया..कैसे होगी बेटियों की शादी
जौनपुर के कपूरी निवासी बनसलोचन विकलांग हैं। उन्होंने बताया कि मेरी पत्नी और तीन बेटियां यूपी में ही रहती हैं। वह अकेले यहां पर मजदूरी करके घर पर पैसा भेजते थे। एक महीने से ऊपर हो गया, उन्हें काम नहीं मिला है। रोजाना लेबर चौक पर आकर बेकार चले जाते हैं। लॉकडाउन के दौरान मैंने घर जाने के लिए ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन भी कराया था, लेकिन नंबर नहीं आया। बेटियों की शादी की चिंता मुझे हर समय सताती है।

कोरोना से नहीं, भूख से लगता है डर
सेक्टर 52 की टीन कॉलोनी निवासी धर्मेंद्र ने बताया कि कोरोना ने ऐसे दिन दिखा दिए, जिनके बारे में कभी सेचा भी नहीं था। कितने ही दिन परिवार भूखा सोया है। प्रशासन को यहां बचे मजदूरों की रोजीरोटी की व्यवस्था करनी चाहिए। भुखमरी की हालत में कितने दिन जिंदा रहेंगे। सुना है फिर से लॉकडाउन की तैयारी है, क्या प्रशासन ने सबकी रोटी की व्यवस्था कर दी है। क्या पहले की तरह लोग दाने दाने के लिए मोहताज नहीं हो जाएंगे। क्या हमें यहां रहने की सजा भुगतनी होगी।

बेटियों की शादी के लिए जमा किए पैसे भी खर्च

फैजाबाद के रामसागर बताते हैं कि मेरी तीन बेटियां हैं। चंडीगढ़ में मजदूरी करके बेटियों की शादी के लिए रुपये जमा करने में लगा था। कोरोना में ऐसा संकट आया कि रोटी के लाले पड़ गए। जमा किए पैसे गुजारे में खर्च हो गए। तीन महीने से किराया नहीं दे पा रहा हूं। काम नहीं मिलने से बेहद परेशान हूं।

जमापूंजी खत्म, 25 हजार कर्जा भी हो गया
यूपी के गोंडा निवासी श्रीराम कहते हैं कि चार महीने में अपनी जमापूंजी तो खर्च हो ही गई, 25 हजार का कर्ज भी हो गया। आधार कार्ड और बीपीएल कार्ड होने के बावजूद राशन नहीं मिला। पहले चार चार घंटे खाने के लिए लाइन में लगे अब रोजगार के लिए मारे मारे फिरते हैं।

काम नहीं मिल रहा..बेटे का इलाज कैसे कराऊं
बिहार के दीपक बताते हैं कि चार महीने का किराया थोड़ा थोड़ा करके चुका रहे हैं। बेटा  हॉस्पिटल में दाखिल है। उसे वहां छोड़कर मैं यहां लेबर चौक पर आता हूं शायद कोई काम मिल जाए। यहां पहले ही बहुत मजदूर साथी रहते हैं। सभी बेहद परेशान हैं। अस्पताल वालों ने बेटे का टेस्ट कराने के लिए 25 हजार खर्च बताया है। अब बिना काम के इतनी बड़ी रकम कहां से लाऊं।

दोबारा लॉकडाउन लगा तो कैसे जिंदा रहेंगे

यूपी के गुड्डू ने बताया कि ब्याज पर 20 हजार उधार लेकर घर का खर्च चलाया। अब दोबारा लॉकडाउन लगा तो जिंदा कैसे रहेंगे। दिनभर की मशक्कत के बाद थोड़ी बहुत कमाई का साधन है, यह भी उनके हाथ से चला जाएगा। सरकारी राशन तक मुझे नहीं मिल रहा।

पानी वाली दाल खाकर कर रहे गुजारा
जगतपुरा निवासी राजू ने बताया दो महीने हो गए हरी सब्जी तक नहीं खाई है। पानी वाली दाल खाकर ही वह गुजारा कर रहे हैं। अफसर मास्क और सोशल डिस्टेंसिंग की बातें करते हैं, रोजगार की बात कोई नहीं करता। आदमी को जिंदा रहने के लिए रोटी चाहिए। काम चाहिए। जब जेब में पैसा ही नहीं है तो कहां से मास्क खरीदें। गमछे से मुंह ढककर ही काम चला रहे हैं।

रोजाना रोजगार का इंतजार
यूपी के हरदोई निवासी सर्वेश कुमार ने बताया कि मैं परिवार में अकेला कमाने वाला हूं। पिछले दिनों पेट का ऑपरेशन हुआ था। डॉक्टरों ने आराम के लिए कहा था। पत्नी घरों में साफ सफाई का काम करती थी। इस संकट में हम दोनों का काम छूट गया। रोजाना इस उम्मीद में आता हूं कि कुछ न कुछ मजदूरी तो मिल ही जाएगी लेकिन मायूस होकर लौट जाता हूं। इन दिनों मेरा परिवार नमक की रोटी खाकर बस जिंदा है।
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