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जैविक पिता होना ही बच्चे की कस्टडी पाने का आधार नहीं: हाईकोर्ट

Wed, 07 Oct 2026 01:45 AM IST
Chandigarh Bureau चंडीगढ़ ब्यूरो
Updated Wed, 07 Oct 2026 01:45 AM IST
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Merely being the biological father is not the basis for obtaining child custody: High Court
अभिभावकता मामला लंबित हो तो हाईकोर्ट नहीं करेगा हस्तक्षेप
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कस्टडी विवाद पर अभिभावकता अदालत ही तय करेगी बच्चे का कल्याण
अमर उजाला ब्यूरो
चंडीगढ़। पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने नाबालिग बच्चे की कस्टडी से जुड़े मामले में अहम टिप्पणी करते हुए कहा है कि केवल जैविक पिता होने के आधार पर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका के जरिए बच्चे की तत्काल हिरासत नहीं दिलाई जा सकती। खासकर तब, जब बच्चे की अभिरक्षा और अभिभावकता को लेकर सक्षम अदालत में पहले से मामला लंबित हो।

जस्टिस सुमित गोयल ने कहा कि बच्चे के कल्याण का निर्धारण विस्तृत साक्ष्यों और परिस्थितियों की जांच के बाद ही किया जा सकता है। इसलिए ऐसे विवाद का फैसला संक्षिप्त बंदी प्रत्यक्षीकरण कार्यवाही में नहीं किया जा सकता। सोनीपत निवासी अमित कुमार ने अपने नाबालिग बेटे की हिरासत उसके नाना-नानी और मामा से दिलाने की मांग की थी। याचिकाकर्ता की शादी मार्च 2019 में हुई थी और मार्च 2020 में बेटे का जन्म हुआ। मई 2022 में बच्चे की मां की मृत्यु हो गई। पिता के अनुसार इसके बाद बच्चा उसके साथ रह रहा था और सोनीपत के एक स्कूल में पढ़ रहा था। पिता का आरोप था कि 30 जून 2023 को बच्चे के नाना, मामा और नानी उसे यह कहकर पटियाला ले गए कि वह पांच-सात दिन उनके पास रहेगा, लेकिन बाद में बच्चे को वापस नहीं किया। इसके बाद पिता ने सोनीपत के उपमंडल मजिस्ट्रेट के समक्ष दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 97 के तहत कार्यवाही शुरू की। 22 अप्रैल 2024 को आदेश जारी कर पिता को बच्चे की जिम्मेदारी लेने के लिए कहा गया लेकिन बच्चे के कल्याण और स्थायी कस्टडी का फैसला सक्षम अदालत से कराने को कहा गया। जुलाई 2024 में सोनीपत पुलिस भी पिता के साथ पटियाला गई लेकिन बच्चा ननिहाल पक्ष के पास ही रहा। इस बीच बच्चे की नानी ने पटियाला में अभिभावक और वार्ड अधिनियम की धारा 25 के तहत याचिका दायर कर दी। पिता ने खुद को बच्चे का जैविक पिता और प्राकृतिक अभिभावक बताते हुए कस्टडी पर अपना प्राथमिक अधिकार होने का दावा किया। वहीं ननिहाल पक्ष ने कहा कि बच्चे को पिता की सहमति से पटियाला लाया गया था और मां की मृत्यु के बाद कम उम्र के बच्चे की वे लगातार देखभाल कर रहे हैं। उन्होंने यह भी बताया कि पिता ट्रक चालक है। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब सक्षम अदालत पहले से बच्चे की कस्टडी के विवाद पर विचार कर रही हो तो हाईकोर्ट के हस्तक्षेप का दायरा बेहद सीमित हो जाता है। केवल गंभीर और तत्काल परिस्थिति में ही हस्तक्षेप किया जा सकता है।
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