पंजाब विधानसभा चुनाव: पंजाब भाजपा को चेहरों की दरकार, धड़ेबंदी और किसान संघर्ष ने बढ़ाई पार्टी की मुश्किलें
पंजाब में भाजपा का ग्रामीण इलाकों में जनाधार कभी नहीं रहा। लेकिन इस बार शहरों में भी किसान आंदोलन के प्रति हमदर्दी ने साफ कर दिया कि पार्टी की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है।
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पंजाब विधानसभा चुनाव की तैयारियों में जुटी भाजपा की मुश्किलें कम नहीं हो रहीं। केंद्र सरकार द्वारा तीन विवादित कृषि कानून रद्द कर दिए जाने के बाद भी पार्टी को राज्य में किसानों के गुस्से का सामना करना पड़ रहा है। हालात ये हैं कि पार्टी को राज्य में प्रत्याशी बनाने के लिए नए चेहरे नहीं मिल रहे, वहीं प्रदेश इकाई में धड़ेबंदी के चलते पुराने दिग्गज अब तक पार्टी की गतिविधियों से सक्रिय रूप से नहीं जुड़े हैं।
पंजाब में 25 वर्ष पुराने सहयोगी अकाली दल से गठबंधन टूटने के बाद भाजपा ने इस बार पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह की पंजाब लोक कांग्रेस और अकाली दल से अलग हुए सीनियर टकसाली नेताओं के संयुक्त अकाली दल के साथ गठबंधन किया है। इस गठबंधन की खास बात यह है कि राज्य में पहली बार भाजपा अपने गठबंधन में मुख्य पार्टी होगी और करीब 60 सीटों पर चुनाव लड़ेगी। अकाली दल के साथ गठबंधन में भाजपा को लड़ने के लिए 20-25 सीटें ही मिलती थीं। नए गठबंधन में मुख्य पार्टी होने के कारण मुख्यमंत्री भी भाजपा का ही होगा, क्योंकि कैप्टन भी खुद को मुख्यमंत्री प्रोजेक्ट करने से इनकार कर चुके हैं।
छिटक चुका है पार्टी का काडर
पंजाब में भाजपा एक मजबूत कद के साथ चुनाव में उतरेगी, लेकिन भीतर और बाहर पार्टी अपनी मुश्किलों का हल अब तक नहीं ढूंढ सकी है। बीते एक साल के दौरान भाजपा का काडर वोटर भी उससे छिटक चुका है, जिसका प्रमाण पंचायत व निगम चुनाव में देखा गया था। तब भाजपा अनेक वार्डों में अपने लिए प्रत्याशी भी खोज नहीं सकी थी। ठीक वैसे ही हालात अब तक बने हुए दिखाई दे रहे हैं।
कैप्टन और सुखदेव ढींडसा से गठबंधन से पहले पंजाब भाजपा राज्य की सभी 117 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ने का एलान कर चुकी थी। उसके सामने समस्या ग्रामीण क्षेत्रों के वोटों की थी, क्योंकि पंजाब में भाजपा का ग्रामीण इलाकों में जनाधार कभी नहीं रहा। लेकिन इस बार शहरों में भी किसान आंदोलन के प्रति हमदर्दी ने साफ कर दिया कि पार्टी की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। भले ही कांग्रेस, बसपा और आम आदमी पार्टी के बीच वोट बंटने का लाभ मिलने की उम्मीद लगाई गई थी। फिलहाल गठबंधन में सीटों के बंटवारे पर मंथन चल रहा है, इसलिए तीनों पार्टियों ने अपने प्रत्याशियों का एलान नहीं किया है। इस संबंध में इसी हफ्ते फैसला होने की उम्मीद है, जिसके बाद साफ हो जाएगा कि भाजपा लोकप्रिय चेहरों को उतार सकेगी या नहीं।
अंदरूनी धड़ेबंदी से भी जूझ रही पार्टी
भाजपा की दूसरी सबसे बड़ी मुश्किल अंदरूनी धड़ेबंदी है। 2017 के विधानसभा चुनाव के दौरान प्रदेश भाजपा की कमान विजय सांपला के हाथ थी, लेकिन पार्टी ने उन्हें केंद्र सरकार में बुलाकर अश्विनी शर्मा को प्रधान नियुक्त कर दिया, लेकिन अश्विनी शर्मा पार्टी में एकजुटता बनाने में सफल नहीं हुए और सांपला के समय सक्रिय रहे ज्यादातर नेता चुपचाप घरों में बैठ गए। वहीं, पंजाब भाजपा के अनेक सीनियर नेता जो आम लोगों के बीच आज भी अपना रसूख रखते हैं और जिन्हें आज भी जनता सुनती और उनकी बात मानती है, को भी साइडलाइन कर दिया गया। ताजा हालात यह हैं कि इस समय पंजाब भाजपा का नेतृत्व अश्विनी शर्मा और उनके सहयोगी कर रहे हैं, जबकि पार्टी के पुराने चेहरे नदारद हैं।