गजब का कारनामा, छात्र को बना दिया मनरेगा मजदूर
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अंबाला के गांव साहा में एक छात्र को मनरेगा का मजदूर बना दिए जाने का मामले सामने आया है। मामला उजागर होने के बाद डीसी अंबाला डा. साकेत कुमार ने तुरंत प्रभाव से टपरियां गांव की महिला सरपंच को निलंबित कर दिया है। इससे एक बार फिर इस मनरेगा घोटाले में शामिल कर्मचारियों और अफसरों में हड़कंप मच गया है।
इस मामले में भी वही बातें सामने आईं, जो दूसरे गांवों में जांच के बाद सामने आ चुकी हैं। गौरतलब है कि जिले में महात्मा गांधी ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना में हुए करोड़ों रुपये के गोलमाल के मामले में भले ही अब तक फाइल मुख्य सचिव स्तर पर ही अटकी पड़ी है, मगर इस मामले में रोजाना नए-नए खुलासे हो रहे हैं।
12वीं कक्षा का छात्र है अश्वनी
डीसी डा. साकेत की ओर से जारी निलंबन आदेश में बताया गया है कि सरपंच के कार्यकाल में 12वीं कक्षा के छात्र अश्वनी कुमार ने मनरेगा में कार्य किया है, मस्ट्रोल की रिपोर्ट के मुताबिक जिस समय यह छात्र मनरेगा के तहत काम कर रहा था, उसी वक्त यह छात्र अपने स्कूल में भी हाजिर था।
इसके अलावा दूसरी घटना में भी सरपंच के कार्यकाल में एक हरिजन चौपाल बनवाई गई। इस चौपाल के निर्माण के दौरान भी विभिन्न प्रकार की वित्तीय अनियमितताएं बरती गईं। काम में विभाग के नियमों का उल्लंघन किया गया।
इन मामलों में सरपंच को दोषी मानते हुए डीसी ने टपरियां की सरपंच को सस्पेंड कर दिया है। डीसी ने आदेश दिए कि महिला सरपंच को पंचायत की किसी भी गतिविधि में शामिल न किया जाए। साथ ही पंचायत का सारा रिकार्ड बहुमत वाले पंच को सौंपा जाए।
IAS समेत सौ कर्मचारी संदेह के घेरे में
जिले में मनरेगा के तहत 2006-07 से 2008-09 तक जो राशि खर्च की गई थी उसमें नियमों की अनदेखी की गई थी। नियमानुसार 50 फीसदी कार्य ग्राम पंचायतों और 50 फीसदी कार्य सरकारी विभागों एवं अधिकृत एजेंसियों के माध्यम से करवाया जाना था लेकिन कुल 30 करोड़ की राशि में से करीब 25 करोड़ का काम वन विभाग के माध्यम से ही करवा दिया गया था।
अंबाला के पूर्व एडीसी संजीव वर्मा और वजीर सिंह गोयत ने इस मामले में अलग-अलग जांच की जिसमें सनसनीखेज खुलासे हुए। दोनों की जांच में यह बात सामने आई कि इस परियोजना के तहत जो काम मजदूरों से करवाने का दावा जिला वन विभाग ने किया, इसमें अधिकतर जगह पाया गया कि वहां तो वे साइट ही मौजूद नहीं हैं, जहां विभाग ने काम कराया दिखाया है।
दूसरा जिन मजदूरों से काम करवाया दिखाया गया, वे मजदूर ही नहीं हैं और फर्जी मजदूरों को कागजों में ही मजदूरी बांट दी गई। तीसरा जब जिला वन विभाग से सारे काम की रिपोर्ट मांगी गई, तो जिला वन विभाग इस मामले में कोई जवाब नहीं दे पाया।
मामला जब काफी उछला तो इस घोटाले की रिपोर्ट हरियाणा सरकार के माध्यम से केंद्र सरकार को भेज दी गई। इसके बाद केंद्र सरकार की एक टीम अंबाला आकर इस मामले की जांच कर चुकी है जिसके बाद इस मामले की एक और जांच विजिलेंस अंबाला को सौंपी गई।
फाइलों में दफन रिपोर्ट
अंबाला विजिलेंस ने अपनी रिपोर्ट करीब डेढ़ साल में तैयार की। उसके बाद इस रिपोर्ट को आगे विजिलेंस हेड क्वार्टर भेज दिया गया। वहां भी कई महीनों तक यह रिपोर्ट इसीलिए पड़ी रही कि आला अफसर इस रिपोर्ट मंथन करेंगे और फिर टिप्पणी करेंगे।
सितंबर 2013 से पहले विजिलेंस ने अपनी रिपोर्ट टिप्पणी के साथ मुख्य सचिव को भेज दी थी। तभी से इस घोटाले की रिपोर्ट वहीं फाइलों में ही दफन है।
सूत्रों के अनुसार इस मामले में तीन आईएएस अफसरों समेत सौ कर्मचारियों और जनप्रतिनिधियों के शामिल होने का अंदेशा है। अब तक रिपोर्ट पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है।