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विस चुनावः नेताओं की जुबानी जंग और तू-तड़ाक में खोए अहम मुद्दे, विशेष रिपोर्ट

Tue, 24 Jan 2017 07:46 PM IST
निवेदिता ए. वर्मा/अमर उजाला, चंडीगढ़
निवेदिता ए. वर्मा/अमर उजाला, चंडीगढ़ Updated Tue, 24 Jan 2017 07:46 PM IST
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main issues missed in tounge war in between leaders during punjab assembly election campaigning
पंजाब विधानसभा चुनाव
विधानसभा चुनाव की तारीख तय होते ही नेताओं में जुबानी जंग इतनी तेज हो गई और इस तरह से हावी हुई कि अहम मुद्दे ही गौण हो गए। पंजाब में पिछले साल तीन मुद्दे खूब गरमाए। सीमा पार से आते नशे ने बदनाम किया। इस पर फिल्म तक बनी। नेताओं पर आरोप भी लगे। धार्मिक ग्रंथों की बेअदबी ने लोगों को आहत किया और इसके विरोध में आंदोलन भी हुए।
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सफेद मक्खी से बर्बाद किसानों की आत्महत्याओं ने मालवा को झकझोर दिया। 2016 में ये मुद्दे चुनाव का मुख्य हथियार नजर आ रहे थे, लेकिन जैसे ही चुनाव की तारीख तय हुई, ये मुद्दे गौण होने लगे। मतदान को मात्र 12 दिन बचे हैं और सभी दलों के बड़े नेता प्रचार में अपनी ताकत झोंक चुके हैं। हालांकि प्रचार तू तड़ाक पर ही टिक गया है और इन मुद्दों की गूंज अब सुनाई नहीं देती।
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अब कैप्टन और केजरीवाल में ट्विटर पर जंग होती है। सिद्धू की मां पार्टी कौन है, ये मामला किसानों की आत्महत्याओं से ज्यादा उठाया जा रहा है। बड़े बादल पर उन्हीं के क्षेत्र में जूता चला तो हरसिमरत कौर की जुबान फिसली। वहीं अकालियों ने सुखबीर के काफिले पर हमले का जिम्मेदार भगवंत मान के बयानों को बताया। अब इतने साल बाद कैप्टन लंबी लड़ने क्यों गए और दो सीटों पर एक साथ क्यों लड़ रहे हैं, ये मामला ज्यादा अहम है।
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संतुलित बयान देने वाले मुख्यमंत्री भी आपा खो बैठे

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सीएम बादल - फोटो : अमर उजाला
इस बार एक दूसरे पर कीचड़ उछालने की राजनीति ऐसी गरमाई कि हमेशा अपने बयानों में संतुलन बनाकर चलने वाले मुख्यमंत्री बादल भी आपा खो बैठे। वहीं अकाली दल के सबसे मुखर माने जाने वाले नेता बिक्रम सिंह मजीठिया इस बार चुप हैं। वे केवल अपने हलके तक सीमित हैं। लंबी में बादल-कैप्टन-जरनैल की जंग और जलालाबाद में सुखबीर-भगवंत-रवनीत का त्रिकोणीय मुकाबला इस बार का हॉट टापिक है।

इस बार असली मुद्दों से भटकाव सिर्फ पंजाब की राजनीति में नहीं, सभी जगह है। पार्टियां लोगों से जुड़े मुद्दों पर नहीं पर्सनैलिटीज पर फोकस कर रही हैं। सभी का मेनिफेस्टो भी एक जैसा ही है। समस्याओं का समाधान प्रचार से नहीं हो सकता। असल मुद्दों पर बहस होनी चाहिए, लेकिन इसके लिए वोटर को सही सवाल पूछने होंगे।
- प्रो. भूपिंदर सिंह बरार, प्रोफेसर, राजनीति विज्ञान, पंजाब यूनिवर्सिटी, चंडीगढ़
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