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हरियाणाः मुख्यमंत्री सौर योजना में 2000 करोड़ लगा चुके निवेशकों को झटका, पक्ष भी नहीं रख पाए

Tue, 11 Feb 2020 10:59 AM IST
खुशबू गोयल यशपाल शर्मा, चंडीगढ़
यशपाल शर्मा, चंडीगढ़ Published by: खुशबू गोयल Updated Tue, 11 Feb 2020 10:59 AM IST
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Loss of 2000 Crore Rupees Invested in Chief Minister Solar Scheme
सांकेतिक तस्वीर
हरियाणा में सीएम सौर ऊर्जा योजना में दो हजार करोड़ रुपये से अधिक लगा चुके निवेशकों को एक बार फिर झटका लगा है। दिसंबर 2018 में इस योजना को रद्द कर चुकी सरकार ने अब इसमें फिर बड़े बदलाव किए हैं। सरकार को ये बदलाव डिस्कॉम (उत्तर व दक्षिण हरियाणा बिजली वितरण निगम) के दबाव में करने में पड़े हैं। मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में बीते शनिवार को हुई बैठक में डिस्कॉम अपनी शंकाओं के बूते योजना के नियम व शर्तें बदलवाने में कामयाब रहे हैं। जिससे निवेशकों के हाथ निराशा से ज्यादा कुछ नहीं लगा है।
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सूत्रों के अनुसार, बैठक में यह सहमति बनी कि जिन निवेशकों को सौर ऊर्जा उत्पादन के लिए 358 मेगावाट की फाइनल कनेक्टिविटी मिल गई है, डिस्कॉम उनके साथ भी किसी अनुबंध पर हस्ताक्षर नहीं करेंगे। फाइनल कनेक्टिवटी पाने वालों में से भी वही निवेशक सौर ऊर्जा उत्पादन कर पाएंगे, जो आवेदन करने की तिथि से डिस्कॉम के उपभोक्ता हैं। बावजूद इसके अगर कोई निवेशक सौर ऊर्जा उत्पादन योजना के तहत करना चाहता है तो सरकार उससे मात्र 2.53 रुपये प्रति यूनिट के हिसाब से बिजली खरीदेगी।
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इस रेट पर सरकार वर्तमान में सोलर एनर्जी कारपोरेशन ऑफ इंडिया राजस्थान से बिजली खरीद रही है। जिन आवेदकों को फाइनल कनेक्टिविटी नहीं मिली है, उनके आवेदनों को रद किया जाएगा। जिन निवेशकों ने योजना में एसवीपी (स्पेशल पर्पज व्हीकल्स) के तहत अपनी इक्विेटी निश्चित कर दी है, उनके आवेदनों की दोबारा छंटनी होगी। उसके बाद सरकार निर्णय लेगी कि इनके आवेदन रद करने हैं या इन्हें फाइनल कनेक्टिविटी देनी है। जिन निवेशकों की इक्विटी निश्चित नहीं हुई है, उनके आवेदनों को भी रद किया जाएगा। बैठक में हुए निर्णयों के बारे में सरकार स्तर पर और संबंधित विभागों का कोई भी अधिकारी कुछ बोलने को तैयार नहीं है।
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चार रुपये प्रति यूनिट से कम में निवेशकों को नुकसान

निवेशकों को 2.53 रुपये प्रति यूनिट का रेट किसी सूरत में सही नहीं बैठता। इसमें उनकी निवेश की गई राशि भी पूरी नहीं होती। 4, 4.10 रुपये तक रेट को निवेशक उचित मानते हैं, चूंकि सरकार से ऊर्जा खरीद का भुगतान कम से कम 18 महीने बाद होता है। जिससे उन्हें वित्तीय नुकसान उठाना पड़ता है। महंगी जमीन व कम जनरेशन के कारण 3, 3.50 रुपये प्रति यूनिट रेट से भी निवेशकों को घाटा उठाना पड़ता है।

निवेशकों को पक्ष रखने का एक भी मौका नहीं
सरकार ने दिसंबर 2018 में भी योजना को बिना निवेशकों का पक्ष सुने ही रद कर दिया था और इस बार भी कोई वार्ता नहीं की गई। जबकि फाइनल कनेक्टिविटी के अलावा 1053 मेगावाट उत्पादन की सैद्घांतिक सहमति दी जा चुकी है और 2000 मेगावाट उत्पादन के आवेदन लंबित हैं। निवेशकों को इस बात पर भी आपत्ति है कि उनकी सुने बिना ही निर्णय लेकर फैसला सुना दिया जाता है। जिससे उनके हाथ कुछ नहीं लगता। बिना किसी दस्तावेज के वे हाईकोर्ट का दरवाजा भी नहीं खटखटा सकते।

ये जानना चाह रहे निवेशक
. योजना को लेकर निवेशकों की ओर से लिखे पत्रों का जवाब दिया जाए
. बैठकों में हुए निर्णयों की जानकारी लिखित में निवेशकों को मिले
. 12 महीने की डेडलाइन अनुसार प्लांट लगा रहे निवेशक क्या करें
. जिन्हें करोड़ों रुपये का नुकसान होगा, उसकी भरपाई कौन करेगा
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