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Lok Sabha Election: शिअद-भाजपा के रास्ते अलग, पंजाब में बदली सियासी बिसात; इन कड़ी शर्तों के कारण न बन पाई बात
Wed, 27 Mar 2024 08:54 AM IST
शाहरुख खान
सुरिंदर पाल, अमर उजाला, जालंधर
सुरिंदर पाल, अमर उजाला, जालंधर
Published by: शाहरुख खान
Updated Wed, 27 Mar 2024 08:54 AM IST
सार
भाजपा और शिअद के बीच लंबे समय से चल रही गठबंधन की अटकलों पर मंगलवार को पूरी तरह विराम लग गया। पंजाब में भाजपा अब अकेले दम पर ही लोकसभा चुनाव लड़ेगी।
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Lok Sabha Elections 2024
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
शिरोमणि अकाली दल और भाजपा पंजाब में अलग-अलग लोकसभा चुनाव लड़ने जा रहे हैं, जिससे पंजाब में सियासी तस्वीर पूरी तरह बदल जाएगी। दोनों दलों में गठबंधन की प्रबल संभावना थी, लेकिन अकाली दल की कोर कमेटी की बैठक में कड़े प्रस्ताव पास होने से तस्वीर साफ होने लगी थी कि शिअद ने जो शर्तें रखी हैं, उनको भाजपा किसी सूरत में मान नहीं सकती।
अभी तक अकाली दल भाजपा को बिना शर्त समर्थन देता आया था, लेकिन 27 साल बाद अकाली दल ने शर्त के साथ ही समझौता करने का फैसला लिया है। 1992 तक भाजपा और अकाली दल अलग-अलग चुनाव लड़ते थे और चुनाव के बाद साथ आते थे, लेकिन 1996 में अकाली दल ने 'मोगा डेक्लरेशन' पर साइन किया और 1997 में पहली बार साथ में चुनाव लड़ा।
तब से इनका साथ बरकरार था। अकाली दल के सुप्रीमो प्रकाश सिंह बादल का कहना था कि यह समझौता हिंदू-सिख भाईचारा बनाए रखने के लिए है। मोगा डेक्लरेशन में भी तीन बातों पर ज़ोर दिया गया था कि पंजाबी पहचान, आपसी सौहार्द और राष्ट्रीय सुरक्षा।
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1984 के दंगों के बाद इस आपसी सौहार्द का माहौल काफी खराब हो गया था और इसलिए दोनों पार्टियां साथ आईं। दरअसल, अकाली दल अपने सिख वोट बैंक के साथ अकेले सत्ता में आने की स्थिति में नहीं था। अकाली दल को तमाम ग्रामीण एकजुट होकर वोट नहीं करते थे, तो उन्हें एक ऐसी पार्टी की तलाश थी जो उनके वोट बैंक को छीनता नहीं बल्कि बढ़ाता।
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अभी तक अकाली दल भाजपा को बिना शर्त समर्थन देता आया था, लेकिन 27 साल बाद अकाली दल ने शर्त के साथ ही समझौता करने का फैसला लिया है। 1992 तक भाजपा और अकाली दल अलग-अलग चुनाव लड़ते थे और चुनाव के बाद साथ आते थे, लेकिन 1996 में अकाली दल ने 'मोगा डेक्लरेशन' पर साइन किया और 1997 में पहली बार साथ में चुनाव लड़ा।
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तब से इनका साथ बरकरार था। अकाली दल के सुप्रीमो प्रकाश सिंह बादल का कहना था कि यह समझौता हिंदू-सिख भाईचारा बनाए रखने के लिए है। मोगा डेक्लरेशन में भी तीन बातों पर ज़ोर दिया गया था कि पंजाबी पहचान, आपसी सौहार्द और राष्ट्रीय सुरक्षा।
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1984 के दंगों के बाद इस आपसी सौहार्द का माहौल काफी खराब हो गया था और इसलिए दोनों पार्टियां साथ आईं। दरअसल, अकाली दल अपने सिख वोट बैंक के साथ अकेले सत्ता में आने की स्थिति में नहीं था। अकाली दल को तमाम ग्रामीण एकजुट होकर वोट नहीं करते थे, तो उन्हें एक ऐसी पार्टी की तलाश थी जो उनके वोट बैंक को छीनता नहीं बल्कि बढ़ाता।
ऐसे में भाजपा ही उनके पास एकमात्र विकल्प था। कांग्रेस उनके लिए गठबंधन का विकल्प नहीं हो सकती थी। यही वजह रही कि शहरी व ग्रामीण वोटरों का ऐसा तालमेल बना कि 1997, 2007, 2012 में अकाली दल भाजपा की पंजाब में सत्ता आई।
कृषि कानूनों के कारण टूटा था 24 साल पुराना गठबंधन
कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों के आंदोलन के बाद अकाली दल ने 2020 में भाजपा के साथ अपना 24 साल पुराना गठबंधन तोड़ दिया। इसके बाद जब पंजाब में विधानसभा चुनाव हुए, तो अकाली दल और भाजपा दो-दो सीटों पर सिमट गईं। इसके बाद संगरूर और जालंधर लोकसभा उपचुनाव में भी दोनों पार्टियां कुछ खास नहीं कर पाईं।
कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों के आंदोलन के बाद अकाली दल ने 2020 में भाजपा के साथ अपना 24 साल पुराना गठबंधन तोड़ दिया। इसके बाद जब पंजाब में विधानसभा चुनाव हुए, तो अकाली दल और भाजपा दो-दो सीटों पर सिमट गईं। इसके बाद संगरूर और जालंधर लोकसभा उपचुनाव में भी दोनों पार्टियां कुछ खास नहीं कर पाईं।
अकाली दल पंजाब में अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है, तो दूसरी ओर भाजपा पंजाब में मजबूत होने के लिए संघर्ष कर रही है। अब 2024 के लोकसभा चुनाव एक साथ लड़ने के लिए अकाली दल व भाजपा में बातचीत चल रही थी, लेकिन अकाली दल के समक्ष 2017 के विधानसभा चुनाव के बाद एक सर्वे भी जेहन में था, जिसमें था कि अकाली दल का जट सिख वोट बैंक भी खिसक गया है।
जट सिख ही पंजाब में ज्यादा संख्या में खेती करते हैं। किसान आंदोलन चल रहा है और ऐसे में इस मुद्दे पर किसानों का विरोध करके वो अपने रहे सहे वोट बैंक से भी हाथ न धो बैठें। राज्य में आम आदमी पार्टी की एंट्री ने उनके लिए पहले से ही मुश्किलें खड़ी कर रखी हैं।
जब अकाली दल-भाजपा का गठबंधन था
1997 विधानसभा चुनाव
1999 लोकसभा चुनाव
2002 विधानसभा चुनाव
2004 लोकसभा चुनाव
2007 विधानसभा चुनाव
2009 लोकसभा चुनाव
2012 विधानसभा चुनाव
2014 लोकसभा चुनाव
2017 विधानसभा चुनाव
2019 लोकसभा
| पार्टी | मत प्रतिशत | सीटें |
| शिअद | 37.6 | 75 |
| भाजपा | 8.3 | 18 |
1999 लोकसभा चुनाव
| पार्टी | मत प्रतिशत | सीटें |
| शिअद | 28.6 | 2 |
| भाजपा | 8.6 | 1 |
2002 विधानसभा चुनाव
| पार्टी | मत प्रतिशत | सीटें |
| शिअद | 31.1 | 41 |
| भाजपा | 5.3 | 3 |
2004 लोकसभा चुनाव
| पार्टी | मत प्रतिशत | सीटें |
| शिअद | 34.3 | 8 |
| भाजपा | 10.5 | 3 |
2007 विधानसभा चुनाव
| पार्टी | मत प्रतिशत | सीटें |
| शिअद | 40.9 | 44 |
| भाजपा | 8.3 | 19 |
2009 लोकसभा चुनाव
| पार्टी | मत प्रतिशत | सीटें |
| शिअद | 33.9 | 4 |
| भाजपा | 10.1 | 1 |
2012 विधानसभा चुनाव
| पार्टी | मत प्रतिशत | सीटें |
| शिअद | 34.7 | 56 |
| भाजपा | 7.2 | 12 |
2014 लोकसभा चुनाव
| पार्टी | मत प्रतिशत | सीटें |
| शिअद | 26.4 | 4 |
| भाजपा | 8.8 | 2 |
2017 विधानसभा चुनाव
| पार्टी | मत प्रतिशत | सीटें |
| शिअद | 25.4 | 15 |
| भाजपा | 5.4 | 3 |
2019 लोकसभा
| पार्टी | मत प्रतिशत | सीटें |
| शिअद | 27.8 | 2 |
| भाजपा | 9.7 | 2 |
गठबंधन टूटने के बाद
2022 विधानसभा चुनाव
जालंधर लोकसभा उपचुनाव-2023
| पार्टी | मत प्रतिशत | सीटें |
| शिअद | 18.5 | 3 |
| भाजपा | 6.6 | 2 |
जालंधर लोकसभा उपचुनाव-2023
| पार्टी | मत प्रतिशत | सीटें |
| शिअद | 17.85 | 0 |
| भाजपा | 15.19 | 0 |