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हरियाणाः अस्तित्व में आने के बाद पहली बार हाशिए पर इनेलो, 5 चुनाव में इस बार सबसे कम वोट
Mon, 27 May 2019 11:53 AM IST
खुशबू गोयल
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
Published by: खुशबू गोयल
Updated Mon, 27 May 2019 11:53 AM IST
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इनेलो के सदस्य
- फोटो : फाइल फोटो
हरियाणा में अस्तित्व में आने के बाद इनेलो अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रहा है। अब तक लड़े पांच लोकसभा चुनाव में इस बार पार्टी को सबसे कम वोट मिले। इंडियन नेशनल लोकदल ने चुनाव चिन्ह चश्मे पर पहली बार 1999 में चुनाव लड़ा था। यह चुनाव इनेलो ने भाजपा के साथ मिलकर लड़ा। दोनों दलों ने पांच-पांच सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारे थे और सभी दस सीटें जीती थी। हालांकि, इसके बाद इनेलो और भाजपा की राहें जुदा-जुदा हो गई और 2004 में दोनों दलों ने अलग-अलग ताल चुनावी दंगल में ठोकी।
भाजपा तो सोनीपत लोकसभा सीट जीतने में कामयाब हो गई, लेकिन इनेलो का खाता नहीं खुल पाया। इससे सबक लेते हुए 2009 में दोनों दल फिर साथ आए और लोकसभा चुनाव पांच-पांच सीटों पर मिलकर लड़ा। मगर, जनता ने भाजपा-इनेलो गठबंधन को नकारते हुए नौ सीटें कांग्रेस और एक सीट हिसार हजकां बीएल की झोली में डाल दीं। 2014 में मोदी लहर में भाजपा-इनेलो फिर अलग-अलग चुनाव लड़े। भाजपा का समझौता हजकां बीएल के साथ था। भाजपा ने अपने हिस्से की आठ सीटों में से सात जीत ली।
इनेलो ने इस चुनाव में हिसार व सिरसा सीट जीतकर अपनी लाज बचाई। 2019 का लोकसभा चुनाव इनेलो के लिए सबसे मुश्किल रहा। 2018 में पार्टी ही नहीं चौटाला परिवार भी टूटा। इनेलो से टूटकर दुष्यंत चौटाला ने अपनी पार्टी जजपा बना ली। न तो इनेलो न ही जजपा इस चुनाव में कोई सीट जीत पाई। इनेलो को सबसे ज्यादा नुकसान हुआ। उसके वोट प्रतिशत में बीते बीस साल में सबसे अधिक गिरावट दर्ज की गई।
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भाजपा तो सोनीपत लोकसभा सीट जीतने में कामयाब हो गई, लेकिन इनेलो का खाता नहीं खुल पाया। इससे सबक लेते हुए 2009 में दोनों दल फिर साथ आए और लोकसभा चुनाव पांच-पांच सीटों पर मिलकर लड़ा। मगर, जनता ने भाजपा-इनेलो गठबंधन को नकारते हुए नौ सीटें कांग्रेस और एक सीट हिसार हजकां बीएल की झोली में डाल दीं। 2014 में मोदी लहर में भाजपा-इनेलो फिर अलग-अलग चुनाव लड़े। भाजपा का समझौता हजकां बीएल के साथ था। भाजपा ने अपने हिस्से की आठ सीटों में से सात जीत ली।
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इनेलो ने इस चुनाव में हिसार व सिरसा सीट जीतकर अपनी लाज बचाई। 2019 का लोकसभा चुनाव इनेलो के लिए सबसे मुश्किल रहा। 2018 में पार्टी ही नहीं चौटाला परिवार भी टूटा। इनेलो से टूटकर दुष्यंत चौटाला ने अपनी पार्टी जजपा बना ली। न तो इनेलो न ही जजपा इस चुनाव में कोई सीट जीत पाई। इनेलो को सबसे ज्यादा नुकसान हुआ। उसके वोट प्रतिशत में बीते बीस साल में सबसे अधिक गिरावट दर्ज की गई।
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24.43 से 1.89 प्रतिशत पर लुढ़के
इस बार इनेलो को 1.89 फीसदी यानि 240258 वोट मिले। 2014 में इनेलो को 24.43 प्रतिशत यानि 2799899 वोट मिले थे। 2009 में इनेलो को 15.78 फीसदी यानि 1286573 मत मिले थे। 2004 के लोकसभा चुनाव में इनेलो 22.43 प्रतिशत यानि 1815683 वोट लेने में सफल रहा था। 1999 में इनेलो को 28.72 प्रतिशत यानि 2002700 वोट मिले थे। इससे पहले ताऊ देवीलाल परिवार अलग-अलग दलों से चुनाव लड़ता रहा।
विस चुनाव में अच्छे प्रदर्शन की चुनौती
लोकसभा चुनाव, जींद उपचुनाव व नगर निगम चुनाव में करारी हार झेल चुके इनेलो के सामने अब अक्टूबर में होने वाले विधानसभा चुनाव में अच्छे प्रदर्शन की चुनौती है। चूंकि, जजपा के गठन के बाद इनेलो का वोट बैंक व कॉडर खिसका है। ऐसे में इनेलो को नए सिरे पर धरातल से खुद को खड़ा कर चुनाव में बेहतर प्रदर्शन करना होगा। चुनाव से पहले इनेलो नेताओं में एक बार फिर भगदड़ मच सकती है। इनेलो सुप्रीमो ओपी चौटाला सोमवार से पैरोल पर आ रहे हैं। उनका हरियाणा दौरा इनेलो में कितनी जान फूंक पाता है, उस पर भी निगाह रहेगी।
विस चुनाव में अच्छे प्रदर्शन की चुनौती
लोकसभा चुनाव, जींद उपचुनाव व नगर निगम चुनाव में करारी हार झेल चुके इनेलो के सामने अब अक्टूबर में होने वाले विधानसभा चुनाव में अच्छे प्रदर्शन की चुनौती है। चूंकि, जजपा के गठन के बाद इनेलो का वोट बैंक व कॉडर खिसका है। ऐसे में इनेलो को नए सिरे पर धरातल से खुद को खड़ा कर चुनाव में बेहतर प्रदर्शन करना होगा। चुनाव से पहले इनेलो नेताओं में एक बार फिर भगदड़ मच सकती है। इनेलो सुप्रीमो ओपी चौटाला सोमवार से पैरोल पर आ रहे हैं। उनका हरियाणा दौरा इनेलो में कितनी जान फूंक पाता है, उस पर भी निगाह रहेगी।