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लोकसभा 2019: देश की सियासी हवा के साथ बदलता है हरियाणा का मिजाज, अब तक ऐसे रहे समीकरण

Wed, 10 Apr 2019 02:48 PM IST
खुशबू गोयल मोहित धुपड़, अमर उजाला, चंडीगढ़
मोहित धुपड़, अमर उजाला, चंडीगढ़ Published by: खुशबू गोयल Updated Wed, 10 Apr 2019 02:48 PM IST
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Lok Sabha Elections 2019, Haryana Political History Ground Report
हरियाणा के राजनीतिक दिग्गज - फोटो : File Photo
केंद्रीय राजनीति में अपना दखल रखने वाले हरियाणा की राजनीति का मिजाज अब तक देश की सियासी हवा के साथ ही बदलता रहा है। राजधानी दिल्ली के साथ सटे होने की वजह से इस सूबे के मतदाताओं को हमेशा केंद्र की सियासत ने प्रभावित किया है। जैसे-जैसे केंद्र में सियासत करवट लेती रही, वैसे ही हरियाणा की राजनीति में भी उतार-चढ़ाव आते गए। संयुक्त पंजाब से लेकर हरियाणा के गठन (1 नवंबर 1966) के बाद से अब तक प्रदेश में जितने भी लोकसभा चुनाव हुए मतदाताओं का मिजाज देश के सियासी हवा के साथ बदलता ही दिखाई दिया।
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अब हरियाणा में 12 मई को होने वाले लोकसभा चुनाव में प्रदेश के मतदाता का रुख किस ओर रहेगा, इस पर अभी वोटर चुप हैं। दूसरी ओर, प्रदेश में सक्रिय सभी राजनीतिक पार्टियां कांग्रेस, भाजपा, इंडियन नेशनल लोकदल, जननायक जनता पार्टी (जजपा), आम आदमी पार्टी (आप), बहुजन समाज पार्टी (बसपा), लोकतंत्र सुरक्षा पार्टी (लोसुपा), राष्ट्रीय लोकस्वराज पार्टी, शिव सेना हरियाणा इत्यादि ने अभी तक अपने पत्ते नहीं खोले हैं। हरियाणा की 10 लोकसभा सीटों में से भाजपा ने अभी सिर्फ 8 सीटों पर प्रत्याशी घोषित किए हैं।
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टिकटों पर कांग्रेस का अभी मंथन कर रही है। विघटन झेल चुका ताऊ देवीलाल का इंडियन नेशनल लोकदल और इनेलो से अलग हुई नई जननायक जनता पार्टी भी दमदार चेहरों की तलाश में है। बसपा-लोसुपा गठबंधन और राष्ट्रीय लोक स्वराज पार्टी ने अभी तक अपने 6-6 प्रत्याशियों की ही घोषणा की है। आप और जजपा भी विरोधियों को टक्कर देने वाले दमदार चेहरों को ढूंढ रही है। आम आदमी पार्टी जजपा और कांग्रेस को लेकर प्रदेश में ‘महागठबंधन’ बनाने को भी प्रयासरत है। इसलिए प्रत्याशियों की घोषणा लटकी हुई है।
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बहरहाल, इन सभी सियासी परिस्थितियों को देखते हुए हरियाणा के मतदाता फिलहाल सभी राजनीतिक दलों द्वारा अपने प्रत्याशी घोषित करने का इंतजार कर रहे हैं। उसके बाद ये मतदाता केंद्र और प्रदेश में पूरे सियासी माहौल का आकलन करते हुए अपना जनादेश देंगे।

सियासी हवा में इस तरह बहता है हरियाणा का मतदाता

- वर्ष 1952 में पहले लोकसभा चुनाव में  संयुक्त पंजाब (हरियाणा शामिल) का हिस्सा था। देश में प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू बने और हरियाणा के हिस्से वाली पांचों सीटें पर कांग्रेस जीती।
- वर्ष 1957 के लोकसभा चुनाव में फिर कांग्रेस सत्ता में आई और नेहरू प्रधानमंत्री बने। इस बार संयुक्त पंजाब की हरियाणा के हिस्से वाली सभी छह सीटें कांग्रेस ने जीती। गुड़गांव सीट पर उपचुनाव हुआ और ये सीट आजाद प्रत्याशी को गई।
- वर्ष 1962 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के ही नेहरू प्रधानमंत्री बने और इस बार संयुक्त पंजाब में हरियाणा हिस्से की 4 सीट कांग्रेस, 2 सीटे जनसंघ व 1 सीट सोशलिस्ट पार्टी ने जीती।
-  वर्ष 1967 के लोकसभा चुनाव के दौरान हरियाणा पंजाब से अलग हो चुका था और अलग हरियाणा राज्य का पहला चुनाव था। कांग्रेस नेत्री इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री बनी और हरियाणा में 9 सीट में से 7 सीट कांग्रेस, 1 भारतीय जनसंघ, 1 आजाद प्रत्याशी ने जीती।
- वर्ष 1971 के लोकसभा चुनाव में फिर इंदिरा प्रधानमंत्री बनीं। इस बार हरियाणा की 8 सीटों में से 6 कांग्रेस, 1 जनसंघ, 1 विशाल हरियाणा पार्टी ने जीती।

- वर्ष 1977 में इमरजेंसी के बाद चुनाव में देश में सियासी माहौल बदला। मोरार जी देसाई प्रधानमंत्री बने। इधर हरियाणा में भी तख्ता पलट हो गया। प्रदेश में कांग्रेस का खाता ही नहीं खुला। सभी सीटें जनता पार्टी और भारतीय लोकदल गठबंधन के हिस्से में चली गई।
- 1980 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस से इंदिरा गांधी फिर प्रधानमंत्री बनीं। हरियाणा में भी माहौल बदला। इस बार 10 सीटों में से 5 कांग्रेस, 5 जनता पार्टी (एस) के खाते में गई।
- वर्ष 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद देश में सियासी माहौल बदला। कांग्रेस भारी बहुमत से सता में आई और राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने। हरियाणा की सियासत ने भी करवट ली और सभी 10 सीटें इस बार कांग्रेस के खाते में चली गई।
- 1989 के लोकसभा चुनाव में बोफोर्स घोटाले, लिट्टे और अन्य मुद्दों पर उलझ गई। जनता दल, भाजपा और वामपंथ ने मिलकर चुनाव लड़ा और जनता दल से वीपी सिंह प्रधानमंत्री बने। हरियाणा के मतदाताओं का भी रुख बदला और इस बार 10 सीटों में से जनता दल गठबंधन ने 6 सीटें जीती, सिर्फ 4 कांग्रेस के खाते में गई।
1991 के चुनाव में कांग्रेस के नरसिंहा राव प्रधानमंत्री बने। इस बार हरियाणा में सिर्फ 1 सीट हरियाणा विकास पार्टी (हविपा) को मिली। 9 सीटें कांग्रेस को गई।
 

- 1996 में कई क्षेत्रीय दलों का दबदबा रहा। कम समय में तीन प्रधानमंत्री बने। इनमें कांग्रेस से कोई नहीं था। इसी उठापटक के दौरान हरियाणा में भी भाजपा ने 4, कांग्रेस ने 2, हविपा ने 3 और आजाद प्रत्याशी ने 1 सीट जीती।
- 1998 में एनडीए के नेता अटल बिहारी प्रधानमंत्री बने। हरियाणा में भाजपा ने 1, कांग्रेस ने 3, इनेलो ने 3 व हविपा,  बसपा, हरियाणा राष्ट्रीय लोकदल ने 1-1 सीट जीती।
- 1999 में फिर एनडीए से अटल प्रधानमंत्री बने। हरियाणा में भाजपा-इनेलो ने मिलकर चुनाव लड़ा और 5-5 सीटें जीती। कांग्रेस के खाते में कोई सीट नहीं आई।
- 2004 में सियासी हवा बदली और यूपीए नेता मनमोहन सिंह पीएम बने। हरियाणा में भी इस दौरान भाजपा को 1 सीट मिली। 9 सीटें कांग्रेस ने जीतीं।
- 2009 में फिर यूपीए सत्ता में आई। हरियाणा में 9 सीटें कांग्रेस ने जीती। 1 सीट पर कांग्रेस से बागी होकर गठित पार्टी हरियाणा जनहित कांग्रेस के हिस्से में गई। भाजपा का खाता नहीं खुला।
- 2014 में देश की सियासी हवा का रुख फिर बदला, नरेंद्र मोदी बने प्रधानमंत्री।हरियाणा में भी भाजपा 7 सीटों पर काबिज हुई। कांग्रेस को 1 और इनेलो को 2 सीट मिली।
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