चुनावी बिसात पर उलझे सभी सियासी दल, आखिरी चरण आते-आते बदले कई समीकरण
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पंजाब की चुनावी बिसात पर सभी पार्टियां उलझती नजर आ रही हैं। शुरुआत में बड़े-बड़े दावों के साथ दलों ने अपना प्रचार शुरू किया था लेकिन अंतिम चरण आते-आते सारे समीकरण बदलते नजर आ रहे हैं। कांग्रेस और सीएम कैप्टन अमरिंदर सिंह मिशन 13 लेकर चले थे लेकिन अब ऐसा संभव नजर नहीं आ रहा है। तीनों सीटें जीतने के दावे के साथ चुनाव में उतरी भाजपा अब तक गुटबाजी से ही नहीं उबर सकी है।
दो हलकों में तो गुटबाजी ही पार्टी के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनती नजर आ रही है। शिरोमणि अकाली दल का अब तक बेअदबी का मुद्दा पीछा नहीं छोड़ सका है। पिछले चुनाव में चार सीटें जीतने वाली आम आदमी पार्टी ने बिखराव के बाद पूरा जोर लगाने की कोशिश की लेकिन एक हलके को छोड़कर कहीं भी उसकी मजबूत उपस्थिति नहीं है।
सुखपाल खैरा की अगुवाई में बना पंजाब डेमोक्रेटिक अलांयस तीन सीटों पर लड़ाई में दिख रहा है। बड़ी पार्टियों की नजरें इस पर टिकी हैं कि छोटी पार्टियां किस के वोट बैंक में सेंध लगाती हैं।
कांग्रेस का मिशन 13 मुश्किल में
कांग्रेस ने इस बार पंजाब की सभी 13 सीटें जीतने का दावा किया था पर मौजूदा हालात में कांग्रेस का सपना पूरा होता नजर नहीं आ रहा। पहले तो कांग्रेस ने टिकट वितरण में गलतियां कीं। पार्टी के नेता खुद मान रहे हैं कि कुछ टिकट बिल्कुल गलत दिए गए जिसके चलते जीती दिखने वाली सीटें भी फंस गई हैं। कई सीटों पर कांग्रेस को गुटबाजी का सामना करना पड़ रहा है।
अमृतसर, जालंधर, फिरोजपुर, संगरूर में पार्टी अब भी पूरी तरह एकजुट नहीं हो सकी है। प्रदेश कांग्रेस प्रधान सुनील जाखड़ गुरदासपुर में सनी देओल के सामने फंसे हुए हैं तो कैप्टन अमरिंदर के गढ़ पटियाला में परनीत कौर की राह आसान नजर नहीं आ रही है।
पार्टी ने अपने दो सालों के कार्यकाल से चुनावी कैंपेन की शुरुआत की थी। जिसमें किसानों की कर्ज माफी, युवाओं को रोजगार जैसे मुद्दे थे। लेकिन आखिरी चरण में कांग्रेस के थिंक टैंक को समझ आ गया कि ये काम नहीं कर रहा है।
लोगों में सरकार के कामकाज को लेकर नाराजगी है। कांग्रेस यह मान कर चल रही है कि यह नाराजगी उतनी नहीं है, जितनी बेअदबी को लेकर शिअद के प्रति है। इसलिए पार्टी ने अपनी रणनीति बदलते हुए सारा फोकस बेअदबी पर कर दिया है। पंजाब के नेता जोर-शोर से इसे उठा रहे हैं। प्रियंका गांधी ने बठिंडा रैली में इस पर शिअद को घेरा। इसी रणनीति के तहत कांग्रेस ने बरगाड़ी में राहुल गांधी की रैली कराई, जहां से यह मुद्दा उठा था।
गुटबाजी खत्म नहीं कर पाई भाजपा
मतदान में एक दिन बचा है और भाजपा अब तक पंजाब में गुटबाजी पर लगाम नहीं लगा सकी है। कम से कम अमृतसर और गुरदासपुर में गुटबाजी के चलते पार्टी को नुकसान होने की आशंका है। गुरदासपुर में सनी देओल के स्टारडम से पार्टी राहत में है।
अमृतसर में गुटबाजी सबसे बड़ा मुद्दा है। यहां पार्टी प्रदेश प्रधान श्वेत मलिक और पूर्व मंत्री अनिल जोशी के खेमों में बंटी है। दोनों के बीच सार्वजनिक तौर पर भी भिड़ंत हो चुकी है। मलिक गुट लगातार जोशी को दरकिनार कर रहा है। फिर जोशी ने खुद को अपने हलके तक सीमित कर लिया।
एक दिन पहले सनी देओल के रोड शो के दौरान जहां जोशी ने स्वागत करना था, उससे कुछ दूर पहले ही रोड शो खत्म कर दिया गया। हालांकि पार्टी ने दलील दी कि सनी को बठिंडा जाना था। यह धड़ेबंदी हरदीप पुरी के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकती है।
होशियारपुर में भी यही हाल है। मलिक गुट ने यहां से मौजूदा सांसद विजय सांपला का टिकट कटवा कर अपने गुट के सोमप्रकाश को दिला दिया। जिसके चलते सांपला समर्थक चुनाव में नजर ही नहीं आ रहे हैं। सांपला की नाराजगी का खामियाजा जालंधर के शिअद उम्मीदवार चरणजीत सिंह अटवाल को भी भुगतना पड़ रहा है।
शिअद का बेअदबी ने नहीं छोड़ा पीछा
2015 में पंजाब में हुई श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी की बेअदबी के मुद्दे ने अब तक शिअद का पीछा नहीं छोड़ा है। इससे नाराज लोगों ने 2017 विधानसभा चुनाव में पार्टी को सत्ता से हटा दिया था। पंजाब के इतिहास में यह पहला मौका था जब शिअद को मुख्य विपक्षी दल का रुतबा भी नहीं मिल सका।
पार्टी को उम्मीद थी कि लोकसभा चुनाव तक माहौल बदल जाएगा लेकिन शिअद ने सेल्फ गोल करते हुए चुनाव से ऐन पहले एसआईटी के आईजी कुंवर विजय प्रताप के खिलाफ चुनाव आयोग से शिकायत कर दी।
आईजी का तबादला हो गया। कट्टरपंथी इस मुद्दे को लेकर एक्टिव हो गए, कांग्रेस भी खुल कर इसे हवा दे रही है। इस मुद्दे का असर पार्टी को कई हलकों में झेलना पड़ रहा है। इसी मुद्दे की वजह से सभी दिग्गज फंस गए हैं। सुखबीर बादल और हरसिमरत कौर बादल की राह मुश्किल है। अपने सबसे मजबूत पंथक किले खडूर साहिब तक में पार्टी को बड़ी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है।
सिर्फ एक सीट पर सिमटी आप
पिछले लोकसभा चुनाव और 2017 के विधानसभा चुनाव में शानदार प्रदर्शन करने वाली आप इस बार सिर्फ एक सीट पर मुकाबले में है। सुखपाल खैरा की अगुवाई में एक गुट के अलग होने से पार्टी को झटका लगा। पार्टी के कई विधायक खैरा के लिए प्रचार कर रहे हैं तो दो कांग्रेस ज्वाइन कर चुके हैं।
संगरूर से भगवंत मान त्रिकोणीय लड़ाई में हैं, यहां कुछ भी हो सकता है। अरविंद केजरीवाल ने भी सारा फोकस इसी हलके पर रखा। इसके अलावा किसी भी हलके में आप की मजबूत उपस्थिति नजर नहीं आ रही है। पर सियासी विश्लेषक और पार्टियां इसी मंथन में लगी हैं कि आप को सभी हलकों में जाने वाला वोट किसे नुकसान पहुंचाएगा।
तीन सीटों पर लड़ाई में पीडीए
सुखपाल खैरा की अगुवाई में बना कई पार्टियों का पंजाब डेमोक्रेटिक अलांयस तीन सीटों पर मुकाबले में है। पटियाला से डॉ. धर्मवीर गांधी, खडूर साहिब से परमजीत कौर खालड़ा और लुधियाना से सिमरजीत बैंस ने लड़ाई को त्रिकोणीय बनाया है। पटियाला की जंग बेहद कांटे की हो गई है। खैरा को खुद बठिंडा से उतना समर्थन नहीं मिल रहा पर कभी आप की सबसे बड़ी ताकत रहे एनआरआईज का उन्हें जबरदस्त सपोर्ट है।
इसका फायदा दूसरे हलकों में पार्टी उम्मीदवारों को मिल रहा है, जिनमें खालड़ा भी शामिल हैं। साथ ही जालंधर, होशियारपुर और आनंदपुर साहिब में पीडीए में शामिल बसपा को भी एनआरआई का समर्थन मिल रहा है, जिससे बसपा प्रत्याशियों की कैंपेन को बल मिला है। इन सीटों पर बसपा किसे नुकसान पहुंचाएगी, सबकी निगाहें इस पर हैं।