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'मतलबी दुनिया, काम करवा लिया, पैसे दिए नहीं'...आंखों में आंसू लिए तीन बहनें लौटीं अपने घर
Thu, 21 May 2020 01:50 PM IST
खुशबू गोयल
अमर उजाला, जीरकपुर
अमर उजाला, जीरकपुर
Published by: खुशबू गोयल
Updated Thu, 21 May 2020 01:50 PM IST
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अपने घर के लिए निकली तीन बहनें
- फोटो : अमर उजाला
आंखें भरी हुई थी, मन में कई सवाल थे... आखिर हमारा कसूर क्या है। क्यों नहीं मिला हमारा मेहनताना। इतना कहते ही फूलजहां, (18) नूरजहां (14) और रुबीना (12) तीनों बहनों की आंखों में आंसू आ गए। क्योंकि लॉकडाउन में इन तीन बहनों के साथ उनके माता-पिता नहीं थे। वे लॉकडाउन से पहले ही अपने गांव चले गए थे और फिर ऐसे में वे लौट नहीं पाए।
फूलजहां ने बताया कि यहां बड़ी-बड़ी कोठियों में रहने वाले लोगों का दिल बहुत छोटा है। दो महीने तक काम करवा लिया और जब पैसे देने की बारी आई तो कोरोना का बहाना बनाकर बाद में पैसे लेने आने के लिए कह दिया है। इससे मन बहुत दुखी हुआ है।
इस बीच उन्होंने ये नहीं सोचा था कि इतने लंबे समय तक बिना पैसों के खाली रहकर उनका घर कैसे चलेगा। उन्हें दो वक्त निवाला मिलेगा भी या नहीं। इधर दो महीने कोरोना काल का समय हम तीन बहनों ने मिलकर कैसे काटा है, ये जिंदगी भर याद रहेगा। जो यहां खाया अपनी मेहनत का खाया।
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यहां से बड़े निराश होकर अपने घर जा रहे हैं। क्योंकि जितना यहां का नाम सुना था, मन में तस्वीर उतनी ही धुंधली हो गई है। क्या करें... कई रातें तो बिना कुछ खाए ही बिताई हैं। मांग कर खाने की हमारी फितरत नहीं है। इसलिए पैदल ही घर निकल ली हैं और हमें उत्तर प्रदेश के हरदोई तक जाना है।
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फूलजहां ने बताया कि यहां बड़ी-बड़ी कोठियों में रहने वाले लोगों का दिल बहुत छोटा है। दो महीने तक काम करवा लिया और जब पैसे देने की बारी आई तो कोरोना का बहाना बनाकर बाद में पैसे लेने आने के लिए कह दिया है। इससे मन बहुत दुखी हुआ है।
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इस बीच उन्होंने ये नहीं सोचा था कि इतने लंबे समय तक बिना पैसों के खाली रहकर उनका घर कैसे चलेगा। उन्हें दो वक्त निवाला मिलेगा भी या नहीं। इधर दो महीने कोरोना काल का समय हम तीन बहनों ने मिलकर कैसे काटा है, ये जिंदगी भर याद रहेगा। जो यहां खाया अपनी मेहनत का खाया।
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यहां से बड़े निराश होकर अपने घर जा रहे हैं। क्योंकि जितना यहां का नाम सुना था, मन में तस्वीर उतनी ही धुंधली हो गई है। क्या करें... कई रातें तो बिना कुछ खाए ही बिताई हैं। मांग कर खाने की हमारी फितरत नहीं है। इसलिए पैदल ही घर निकल ली हैं और हमें उत्तर प्रदेश के हरदोई तक जाना है।
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अब उधार की रेहड़ी पहुंचाएगी हमें अपने घर हरदोई
उधार की रेहड़ी ही बच्चों का सहारा है। घर अभी सैकड़ों मील दूर है। हम तो पैदल चल लेंगे, लेकिन इन बच्चों को कैसे इतनी दूर उत्तर प्रदेश तक लेकर जाते। इसलिए उधार की रेहड़ी लेकर निकले हैं। ये दुखड़ा सुनाते हुए तीनों लड़कियों के दूर के रिश्तेदार मजदूर मुनीर ने कहा कि... उसके सिर पर अपने परिवार के साथ दो अन्य परिवारों के बच्चों को भी घर तक पहुंचाने की जिम्मेदारी है।
क्योंकि इनके परिवार के सदस्य यूपी में लॉकडाउन में फंस गए थे। इसमें फूलजहां और परिवार के अन्य सदस्य शामिल थे। मुनीर के परिवार के साथ करीब 12 लोग थे, जिनमें ज्यादातर बच्चे शामिल हैं। जिन्हें यूपी के हरदोई तक जाना है। मुनीर लोगों के घरों में गाड़ी धोने का काम करता था। उसे भी एक महीने के मेहनताने का पैसा नहीं मिला है।
पत्नी की सोने की अंगूठी बेचकर बच्चों का दो महीने तक पेट पाला है। अब इतने पैसे नहीं बचे थे कि आगे का खर्च चल सके। इसलिए एक जानकार से उधार की रेहड़ी लेकर और बच्चों को उसमें बैठाकर निकल पड़ा और बहुत दूर तक जाना है।
क्योंकि इनके परिवार के सदस्य यूपी में लॉकडाउन में फंस गए थे। इसमें फूलजहां और परिवार के अन्य सदस्य शामिल थे। मुनीर के परिवार के साथ करीब 12 लोग थे, जिनमें ज्यादातर बच्चे शामिल हैं। जिन्हें यूपी के हरदोई तक जाना है। मुनीर लोगों के घरों में गाड़ी धोने का काम करता था। उसे भी एक महीने के मेहनताने का पैसा नहीं मिला है।
पत्नी की सोने की अंगूठी बेचकर बच्चों का दो महीने तक पेट पाला है। अब इतने पैसे नहीं बचे थे कि आगे का खर्च चल सके। इसलिए एक जानकार से उधार की रेहड़ी लेकर और बच्चों को उसमें बैठाकर निकल पड़ा और बहुत दूर तक जाना है।