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प्रवासी मजदूर बोले- तीन दिन से बिस्कुट और पानी के सहारे बिहार जाने को हम खा रहे हैं धक्के
Thu, 21 May 2020 01:59 PM IST
खुशबू गोयल
नगमा सिंह, मोहाली
नगमा सिंह, मोहाली
Published by: खुशबू गोयल
Updated Thu, 21 May 2020 01:59 PM IST
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पैदल चलते-चलते थक गई, प्यार बुझाती मासूम बच्ची
- फोटो : अमर उजाला
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दुनिया भर में फैली जानलेवा कोरोना महामारी ने हमारे जीवन पर कहर ढहाया है... इस शहर में हमने जो सपने अपने परिवार और जिंदगी को बेहतर बनाने को लेकर देखे थे वो सब मिट्टी में मिल गए हैं। पिछले तीन दिन से बिस्कुट और पानी के सहारे जिंदगी चल रही है। वहीं, अब इसी जुगाड़ में लगे हैं कि किसी तरह अपने घर बिहार जाने का इंतजाम हो जाए, लेकिन दूर तरह कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा है।
ट्रेन से घर जाने की चाह में मोहाली से लेकर चंडीगढ़ रेलवे स्टेशन तक गए। लेकिन पुलिस के डंडों के सिवाए कुछ नहीं मिला। गांव में मां की हालत गंभीर है। एक भाई परिवार सहित पहले गांव गया था वह अभी तक क्वारंटीन केंद्र में फंसा हुआ है। हमारे जीवन में अब आंसू और दर्द ही रह गया है। यह कहते ही उसकी आंखों से आंसू बहने लगे। जबकि उसके साथी उसे गले लगाकर संभाल रहे थे।
उनका कहना था कि अब हम जल्दी ही गांव पहुंच जाएंगे। सब कुछ ठीक हो जाएगा। यह आपबीती डेराबस्सी-दिल्ली हाईवे पर तपती धूप में अपने साथियों सहित पैदल ही बिहार के मोतीहारी जा रहे हीरा पासवान ने सुनाई। हीरा ने कहा कि हमारा 25 लोगों का ग्रुप हैं, जो तीन दिन से अपने घर जाने की मशक्कत में जुटे हुए हैं। उन्होंने कहा कि बस अब एक ही सपना है कि अपने गांव पहुंच जाएं। दोबारा काम के लिए यहां नहीं आएंगे।
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ट्रेन से घर जाने की चाह में मोहाली से लेकर चंडीगढ़ रेलवे स्टेशन तक गए। लेकिन पुलिस के डंडों के सिवाए कुछ नहीं मिला। गांव में मां की हालत गंभीर है। एक भाई परिवार सहित पहले गांव गया था वह अभी तक क्वारंटीन केंद्र में फंसा हुआ है। हमारे जीवन में अब आंसू और दर्द ही रह गया है। यह कहते ही उसकी आंखों से आंसू बहने लगे। जबकि उसके साथी उसे गले लगाकर संभाल रहे थे।
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उनका कहना था कि अब हम जल्दी ही गांव पहुंच जाएंगे। सब कुछ ठीक हो जाएगा। यह आपबीती डेराबस्सी-दिल्ली हाईवे पर तपती धूप में अपने साथियों सहित पैदल ही बिहार के मोतीहारी जा रहे हीरा पासवान ने सुनाई। हीरा ने कहा कि हमारा 25 लोगों का ग्रुप हैं, जो तीन दिन से अपने घर जाने की मशक्कत में जुटे हुए हैं। उन्होंने कहा कि बस अब एक ही सपना है कि अपने गांव पहुंच जाएं। दोबारा काम के लिए यहां नहीं आएंगे।
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अब तो किराया भी नहीं बचा
हीरा पासवान ने बताया कि वह कंस्ट्रक्शन का काम करते हैं। बिहार से आकर पिछले 6 साल से जीरकपुर में रह रहे थे। कोरोना महामारी से पहले सब कुछ ठीक था। ठेकेदार समय से पेमेंट कर रहा था। हर महीने सारे खर्च निकालकर पैसे घर भेजते थे। लेकिन लॉकडाउन में एक नया पैसा नहीं कमाया। जो पैसे बचा कर रखे थे। वह भी इस दौरान खर्च हो गए।
कमरे का किराया दिया और बिजली का बिल भी भरा। ठेकेदार ने मेहनत की कुछ पेमेंट मार ली है। काफी समय तक हीरा ने लॉकडाउन खुलने का इंतजार किया, लेकिन काम शुरू नहीं हुआ। फिर उन्होंने मोहाली से जा रही ट्रेनों के लिए रजिस्ट्रेेशन किया। लेकिन कुुछ फायदा नहीं हुआ। चंडीगढ़ में तीन बार कोशिश की लेकिन वहां भी बात सिरे नहीं चढ़ी।
चंडीगढ़ वालों ने हमारे साथ धक्केशाही की, जिसमें एक दिन कहा कि सभी बस में बैठ जाओ आपको रेलवे स्टेशन छोड़ने जा रहे हैं। जब सभी बैठ गए तो रामदरबार के पास उतारकर चले गए। जिसके बाद अब पैदल ही घर जाने का फैसला लिया है। जेब में साढ़े तीन सौ रुपये हैं। यह पैसे किराए से भी कम हैं।
ऐसे में अब कोशिश यहीं है कि जो पैसे बचे हैं, उनसे रास्ते में कुछ खाने के लिए खरीदकर रखे लें और किसी तरह अपने घर पहुंच जाएं।
कमरे का किराया दिया और बिजली का बिल भी भरा। ठेकेदार ने मेहनत की कुछ पेमेंट मार ली है। काफी समय तक हीरा ने लॉकडाउन खुलने का इंतजार किया, लेकिन काम शुरू नहीं हुआ। फिर उन्होंने मोहाली से जा रही ट्रेनों के लिए रजिस्ट्रेेशन किया। लेकिन कुुछ फायदा नहीं हुआ। चंडीगढ़ में तीन बार कोशिश की लेकिन वहां भी बात सिरे नहीं चढ़ी।
चंडीगढ़ वालों ने हमारे साथ धक्केशाही की, जिसमें एक दिन कहा कि सभी बस में बैठ जाओ आपको रेलवे स्टेशन छोड़ने जा रहे हैं। जब सभी बैठ गए तो रामदरबार के पास उतारकर चले गए। जिसके बाद अब पैदल ही घर जाने का फैसला लिया है। जेब में साढ़े तीन सौ रुपये हैं। यह पैसे किराए से भी कम हैं।
ऐसे में अब कोशिश यहीं है कि जो पैसे बचे हैं, उनसे रास्ते में कुछ खाने के लिए खरीदकर रखे लें और किसी तरह अपने घर पहुंच जाएं।
जीरकपुर में दुबई की तरह काम मिलता है
इस तरह कंस्ट्रक्शन का काम करने वाले रूपेश ने बताया कि वह पढ़े लिखे हैं और वह भी 6 महीने पहले ही बिहार से यहां जीकरपुर आए थे। उन्हें पता चला था कि चंडीगढ़ के साथ लगते एरिया में दुबई की तरह बहुत काम मिल जाता है। यह बात यहां आकर हकीकत में भी साबित हुई। मेहनत का पूरा फल भी मिला और लाइफ काफी बढ़िया चल रही थी। लेकिन इसी बीच कोरोना ने दस्तक दी और इसके बाद हमारे हालात बिगड़ते ही चले गए।
ऐसा नहीं है कि यहां काम नहीं है, काम शुरू भी हो गया है, लेकिन स्थिति सामान्य होने में थोड़ा समय लगेेगा। जबकि घर का किराया और अन्य खर्च बढ़ते जा रहे हैं। परिवार वालों का भी वहीं सहारा है। ऐसे में उन्होंने अब वापस बिहार जाने का फैसला किया है, ताकि गांव में ही जाकर कोई काम कर सकें। रूपेश को उम्मीद है कि जल्दी ही हालात बदलेंगे। सब कुछ ठीक हो जाएगा।
ऐसा नहीं है कि यहां काम नहीं है, काम शुरू भी हो गया है, लेकिन स्थिति सामान्य होने में थोड़ा समय लगेेगा। जबकि घर का किराया और अन्य खर्च बढ़ते जा रहे हैं। परिवार वालों का भी वहीं सहारा है। ऐसे में उन्होंने अब वापस बिहार जाने का फैसला किया है, ताकि गांव में ही जाकर कोई काम कर सकें। रूपेश को उम्मीद है कि जल्दी ही हालात बदलेंगे। सब कुछ ठीक हो जाएगा।
बड़े लोगों की बीमारी ने तबाह किए हमारे घर
सुदामा ठाकुर जो बिहार से जीरकपुर में आकर मजदूरी कर रहे थे, उन्होंने बताया कि वह तीन साल से जीरकपुर में रह रहे थे और अच्छी मजदूरी भी मिल रही थी। लेकिन आजकल कोरोना के चलते काम बंद है। वैसे भी कोई व्यक्ति काम पर नहीं रख रहा है। ऐसे में पराए प्रदेश में भूखे मरने से बेहतर है कि अपने घरवालों के साथ ही रहें। जहां 4 लोगों का खाना बनता है, वहां उनके साथ एक और खा लेगा। कौन सा वहां पर जाकर कमरे और बिजली का बिल देना पड़ेगा।
वहीं, एक खुशी तो होगी ही कि अपना परिवार साथ होगा। यह कहते ही सुदामा की आंखों में आंसू आ गए। सुदामा बोले कि उन्होंने सुना है कि चीन और अमेरिका गए बड़े घरों के लोग इस बीमारी को देश में लेकर आए हैं। लेकिन इस बीमारी ने घर तो हमारे तबाह कर दिए हैं। पता नहीं कब हालात सुधरेंगे, अभी जेब में करीब तीन सौ रुपये हैं, इसी के सहारे बिहार पैदल पहुंच जाएंगे।
वहीं, एक खुशी तो होगी ही कि अपना परिवार साथ होगा। यह कहते ही सुदामा की आंखों में आंसू आ गए। सुदामा बोले कि उन्होंने सुना है कि चीन और अमेरिका गए बड़े घरों के लोग इस बीमारी को देश में लेकर आए हैं। लेकिन इस बीमारी ने घर तो हमारे तबाह कर दिए हैं। पता नहीं कब हालात सुधरेंगे, अभी जेब में करीब तीन सौ रुपये हैं, इसी के सहारे बिहार पैदल पहुंच जाएंगे।