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खुड्डा अलीशेर: इसे कहते थे पठानों का गांव
नीरज कुमार/अमर उजाला, चंडीगढ़
Updated Wed, 06 Aug 2014 04:21 PM IST
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गांव का धान का कटोरा कहे जाने वाली जगह पर आज चंडीगढ़ क्लब और राजेंद्रा गार्डन बना है। यूटी चंडीगढ़ में शिवालिक की पहाडि़यों के नीचे बसे गांव खुड्डा अलीशेर को धौल तपा (मानसा) की पृष्ठभूमि वाली एक ढाहणी ने बसाया था।
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इससे पहले इस गांव को पठानों के गांव के रूप में भी जाना जाता था। बाद में यहां मान आकर बस गए। गांव के 80 वर्ष के बुजुर्ग केहर सिंह ने बताया कि मान का भी यहां से खात्मा हो गया। उसके बाद मानों के भांजे धालीवाल यहां पर आ बसे।
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गांव के लोग यह भी बताते हैं कि यह गांव खुदा अलीशेर नाम के व्यक्ति के नाम पर रखा गया है। जबकि कुछ लोगों का यह भी कहना है कि तपा मानसा के गांव अलीशेर के एक व्यक्ति ने इस गांव को बसाया था और उसके नाम पर ही गांव का नाम रख दिया। शुरूआती दौर में गांव सात या आठ एकड़ में फैला। 60 घर जाटों के थे तो 40 घर दलितों के।
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1962 में बनी थी पहली पंचायत
गांव की पहली पंचायत वर्ष 1962 में बनी थी। इसका पहला सरपंच मंगु सिंह थे। 1972 में बने गुरुद्वारा साहिब के सामने 200 साल पुराना कुआं गांव बनने के बाद अब भी बरकरार है। चंडीगढ़ क्लब और राजेंद्रा गार्डन इसी गांव की जमीन पर बना है। कभी इस जमीन पर धान की उपज होती थी। गांव के लोगों ने खूब संघर्ष किया।
सेक्टर-8 तक बैल गाडि़यों में बैठकर नारे लगाते थे कि राजधानी बनने नहीं देंगे। ये नारे उजाड़े से बचाने के लिए लगाए जाते थे। यहां बौद्ध मंदिर स्थापित है। पहाड़ काटकर भवानी मंदिर का निर्माण हुआ। आज भी यहां पर दूर दूर से वार्षिक भंडारे के लिए लोग पहुंचते हैं। यहां पर गुग्गामाड़ी एकता का प्रतीक है।
गांव के लोगों में गुलजार सिंह चौकीदार, डिप्टीचंद वर्मा, केहर सिंह, फूलदास, जुझार सिंह, जंग सिंह, शीतल सिंह, फकीर सिंह ने संयुक्त रूप में बताया कि इस गांव में फिल्मों और टीवी सीरियलों की सूटिंग भी होती रहती है।
गांव के सरपंच डॉ हुकुम चंद का कहना है कि 112 वर्षों से कुश्ती मेला गांव में चला आ रहा है। दूर-दूर से पहलवान इस गांव में कुश्ती मेले में शामिल होने के लिए आते हैं। उन्हें भरपूर प्यार और इनाम दिया जाता है।
गांव एक नजर
आबादी 10000
घर 1000
मतदाता 4500
गेहूं, मक्की की खेती अभी भी होती है।
गांव में पंचायत घर, संपर्क सेंटर, यातायात के लिए सीटीयू की ट्रांसपोर्ट व्यवस्था है। जीविका चलाने के लिए आसपास के जगहों पर प्राइवेट नौकरी ही गांव के लोगों को नसीब है।
ये हैं मांगें
स्कूल को अपग्रेड किया जाए और माडल स्कूल बनाया जाए। तालाब का सौंदर्यीकरण हो और सड़क बने। गांव के युवकों को नौकरी में प्राथमिकता मिले।
कुआं गांव की विरासत
गांव के गुरुद्वारा के पास दो सौ वर्ष पुराना कुआं है। इसमें पानी तो नहीं है, लेकिन गांव के लोग इसे यादगार के रूप में संजोए हैं। इसे रंग पेंट कराकर रखा गया है। दो सौ वर्ष से भी अधिक पुराना पीपल और बरगद का पेड़ इस बात का गवाह है कि इसकी छाया में गांव के मसले सुलझाए जाते रहे होंगे।