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कारगिल युद्ध में शहीद लांस नायक के इस परिवार के लिए 'विजय दिवस' के कोई मायने नहीं, जानिए क्यों
Fri, 26 Jul 2019 11:00 AM IST
खुशबू गोयल
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, पठानकोट(पंजाब)
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, पठानकोट(पंजाब)
Published by: खुशबू गोयल
Updated Fri, 26 Jul 2019 11:00 AM IST
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शहीद जवान के परिजन
- फोटो : अमर उजाला
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कारगिल युद्ध में 13 जैक राइफल यूनिट के लांस नायक हरीश पाल शर्मा शहीद हो गए थे, लेकिन उनके परिवार के लिए 'विजय दिवस' का कोई मतलब नहीं हैं। क्योंकि उन्हें एक ऐसा जख्म मिला है, जिससे उभर पाना उनके लिए मुश्किल है। पंजाब के पठानकोट जिला निवासी शहीद हरीश की मां राज दुलारी की आंखें हर साल विजय दिवस पर छलक उठती हैं।
उनका कहना है कि बेशक सरकार कारगिल युद्ध की जीत के 20 वर्ष पूरे होने का जश्न मना रही है, मगर इस जश्न के पीछे घना अंधेरा छाया है। इसमें सिसकियां शामिल हैं, उन परिवारों की जिन्होंने उस युद्ध में अपने जिगर के टुकड़ों को कुर्बान कर दिया तथा अब सरकारों की उपेक्षा के चलते वह गुमनामी का जीवन व्यतीत कर रहे हैं।
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उनका कहना है कि बेशक सरकार कारगिल युद्ध की जीत के 20 वर्ष पूरे होने का जश्न मना रही है, मगर इस जश्न के पीछे घना अंधेरा छाया है। इसमें सिसकियां शामिल हैं, उन परिवारों की जिन्होंने उस युद्ध में अपने जिगर के टुकड़ों को कुर्बान कर दिया तथा अब सरकारों की उपेक्षा के चलते वह गुमनामी का जीवन व्यतीत कर रहे हैं।
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पठानकोट में सरहद से सटे गांव झरौली निवासी लांस नायक हरीश पाल शर्मा 15 जून 1999 को अपनी सैन्य टुकड़ी के साथ टाइगर हिल फतेह करते हुए शहीद हो गए थे। उनके शौर्य और अदम्य साहस के लिए सरकार ने उन्हें मरणोपरांत सैन्य पदक देने की घोषणा की थी, लेकिन 20 वर्ष बीत जाने के बावजूद शहीद की मां बहादुरी का वो मेडल मिलने का इंतजार कर रही है।
शहीद की मां ने बताया कि उनकी मुश्किलों का दौर यहीं समाप्त नहीं हुआ। बल्कि 20 वर्ष बीत जाने के बाद भी गांव के सरकारी स्कूल का नाम उनके शहीद बेटे के नाम पर नहीं हो सका। ग्राम पंचायत द्वारा जो यादगारी गेट बनाया गया है, उसकी हालत भी जर्जर हो चुकी है। अगर शहीद जवानों के परिवार इसी तरह उपेक्षित होते रहे तो भविष्य में कोई भी मां अपने बच्चों को सेना में भेजने से पहले कई बार सोचेगी।
शहीद की मां ने बताया कि उनकी मुश्किलों का दौर यहीं समाप्त नहीं हुआ। बल्कि 20 वर्ष बीत जाने के बाद भी गांव के सरकारी स्कूल का नाम उनके शहीद बेटे के नाम पर नहीं हो सका। ग्राम पंचायत द्वारा जो यादगारी गेट बनाया गया है, उसकी हालत भी जर्जर हो चुकी है। अगर शहीद जवानों के परिवार इसी तरह उपेक्षित होते रहे तो भविष्य में कोई भी मां अपने बच्चों को सेना में भेजने से पहले कई बार सोचेगी।