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40 साल बाद भारतीय सेना के इस जवान को मिला इंसाफ, तो छलक पड़े आंसू
ब्यूरो/अमर उजाला, मोहाली
Updated Thu, 21 Dec 2017 09:32 AM IST
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सेना के जवान को मिला इंसाफ
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भारतीय सेना के जवान को 40 साल धक्के खाने के बाद इंसाफ मिला तो उसकी आंखों से आंसू छलक पड़े। कहानी पढ़कर आप भी भावुक हो जाएंगे। मामला मोहाली का है। चालीस साल पहले सिक्किम बार्डर पर ड्यूटी के दौरान हुए माइन ब्लास्ट में दिव्यांग हुए पूर्व सैनिक चित्तर सिंह को सेना ने वार कैजुल्टी मान लिया है। साथ ही उन्हें दी जाने वाली 11 हजार 500 पेंशन अब बढ़ाकर करीब चालीस हजार रुपये कर दी है। इस संबंधी आदेश भी जारी कर दिए गए हैं।
वहीं, यह लाभ जब से वह घायल हुए हैं, तब से मिलेगा। यह मामला सर्विस मैन ग्रीवांस सेल पंजाब के प्रमुख कर्नल एसएस सोही की तरफ से उठाया गया था। उन्होंने इसके लिए लंबी लड़ाई लड़ी, उसके बाद यह परिणाम सामने आया है। जानकारी के मुताबिक, चित्तर सिंह उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद जिले में स्थित गांव मौधा के रहने वाले हैं। वह चालीस साल पहले बार्डर पर माइन ब्लास्ट के दौरान दिव्यांग हो गए थे। वह चलने फिरने में असमर्थ हो गए थे। उन्होंने अपनी टांगें खो दी थी और उनकी आंखों की रोशनी भी चली गई थी।
अब वह गरीबी में अपना जीवन गुजार रहे हैं। इसी बीच यह मामला एक्स सर्विस मैन ग्रीवांस सेल के ध्यान में आया। 2013 में संस्था की तरफ से आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल में केस लगाया गया। इसका फैसला चित्तर सिंह के पक्ष में आया। इस दौरान कोर्ट ने चित्तर सिंह को युद्ध विकलांग माना। साथ ही तीस हजार रुपये वेतन देने के आदेश दिए। फरवरी 2017 में फैसला आने के बाद भी रक्षा मंत्रालय द्वारा इसे लागू नहीं किया गया। वहीं, अमर उजाला में दो सितंबर 2017 के अंक में ‘वर्षों बाद मिला सैनिक को इंसाफ, लेकिन सरकार नहीं ले रही सुध’ शीर्षक से पूर्व फौजी का दर्द छापा था।
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वहीं, यह लाभ जब से वह घायल हुए हैं, तब से मिलेगा। यह मामला सर्विस मैन ग्रीवांस सेल पंजाब के प्रमुख कर्नल एसएस सोही की तरफ से उठाया गया था। उन्होंने इसके लिए लंबी लड़ाई लड़ी, उसके बाद यह परिणाम सामने आया है। जानकारी के मुताबिक, चित्तर सिंह उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद जिले में स्थित गांव मौधा के रहने वाले हैं। वह चालीस साल पहले बार्डर पर माइन ब्लास्ट के दौरान दिव्यांग हो गए थे। वह चलने फिरने में असमर्थ हो गए थे। उन्होंने अपनी टांगें खो दी थी और उनकी आंखों की रोशनी भी चली गई थी।
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अब वह गरीबी में अपना जीवन गुजार रहे हैं। इसी बीच यह मामला एक्स सर्विस मैन ग्रीवांस सेल के ध्यान में आया। 2013 में संस्था की तरफ से आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल में केस लगाया गया। इसका फैसला चित्तर सिंह के पक्ष में आया। इस दौरान कोर्ट ने चित्तर सिंह को युद्ध विकलांग माना। साथ ही तीस हजार रुपये वेतन देने के आदेश दिए। फरवरी 2017 में फैसला आने के बाद भी रक्षा मंत्रालय द्वारा इसे लागू नहीं किया गया। वहीं, अमर उजाला में दो सितंबर 2017 के अंक में ‘वर्षों बाद मिला सैनिक को इंसाफ, लेकिन सरकार नहीं ले रही सुध’ शीर्षक से पूर्व फौजी का दर्द छापा था।
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संस्था के यूपी प्रमुख की गई थी नजर
सेना के जवान को मिला इंसाफ
एक्स सर्विस मैन ग्रीवांस सेल पंजाब के प्रधान कर्नल एसएस सोही ने बताया कि उत्तर प्रदेश में उनकी संस्था काम कर रही है। संस्था के यूपी प्रमुख डीएस यादव उक्त गांव में गए तो उनकी नजर चित्तर सिंह पर पड़ी। उन्होंने बताया कि चित्तर सिंह ने 22 सितंबर को 1965 को सेना ज्वाइन की थी।
वह 19 राजपूत बटालियन में थे। 1968 में जब वह सिक्किम बार्डर पर थे तो माइन ब्लास्ट हो गया था। इसके बाद वह दिव्यांग हो गए थे। उनकी आंखों की रोशनी चली गई थी। जबकि बाजू शेष रह गई थी। इसके बाद सेना ने उन्हें सौ फीसदी नार्मल डिसेबिलिटी बताया। साथ ही इसे युद्ध विकलांगता का दर्जा नहीं दिया गया।
पहले इतनी कर दी थी पेंशन
चित्तर सिंह की पेंशन 11500 से बढ़ाकर पहले तीस हजार कर दी थी। ताकि उनकी देखभाल बढ़िया तरीके से हो सके, लेकिन फरवरी में फैसला आने के बाद भी वह लागू नहीं हुआ।
वह 19 राजपूत बटालियन में थे। 1968 में जब वह सिक्किम बार्डर पर थे तो माइन ब्लास्ट हो गया था। इसके बाद वह दिव्यांग हो गए थे। उनकी आंखों की रोशनी चली गई थी। जबकि बाजू शेष रह गई थी। इसके बाद सेना ने उन्हें सौ फीसदी नार्मल डिसेबिलिटी बताया। साथ ही इसे युद्ध विकलांगता का दर्जा नहीं दिया गया।
पहले इतनी कर दी थी पेंशन
चित्तर सिंह की पेंशन 11500 से बढ़ाकर पहले तीस हजार कर दी थी। ताकि उनकी देखभाल बढ़िया तरीके से हो सके, लेकिन फरवरी में फैसला आने के बाद भी वह लागू नहीं हुआ।