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Punjab election 2022: पंजाब चुनाव में किसान मुद्दा नहीं, सियासत में उतरे लेकिन आंदोलन जितनी चर्चा नहीं

Sun, 20 Feb 2022 10:53 PM IST
ajay kumar अभिषेक वाजपेयी, अमर उजाला, चंडीगढ़
अभिषेक वाजपेयी, अमर उजाला, चंडीगढ़ Published by: ajay kumar Updated Sun, 20 Feb 2022 10:53 PM IST
सार

कृषि कानूनों के खिलाफ आंदोलन के दौरान किसानों की जितनी चर्चा थी उतनी पंजाब चुनाव में नहीं रही। किसान नेता चुनाव मैदान में उतरे लेकिन कृषि से जुड़े मुद्दे इस बार गायब रहे। 

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Issues related to agriculture remained missing in Punjab assembly elections 2022
किसान आंदोलन की फाइल फोटो

विस्तार

पंजाब में 75 प्रतिशत आबादी के खेती किसानी से जुड़े होने के बावजूद विधानसभा चुनाव से किसानी का मुद्दा गायब रहा। किसान आंदोलन के कारण यह कयास लगाए जा रहे थे कि 2022 का चुनाव खेती-किसानी के मुद्दे इर्द-गिर्द ही लड़ा जाएगा। उस समय सूबे के सभी सियासतदान कृषि कानूनों के विरोध में आंदोलनरत किसानों के हमदर्द बने हुए थे। चुनाव में इन्हीं सियासतदानों ने प्रचार के दौरान किसानों की समस्याओं से मुंह फेर लिया।

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पंजाब में दूसरे राज्यों के मुकाबले गेहूं और धान की सर्वाधिक पैदावार होती है। कहा तो यह भी जाता है कि जितना गेहूं अमेरिका में पैदा होता है उससे ज्यादा पंजाब में गेहूं की पैदावार है। यही कारण है कि यहां के 75 प्रतिशत लोग प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप में कृषि से जुड़े हैं। केंद्र के तीनों कृषि कानूनों के विरोध में लगभग 14 महीने तक चलने वाले किसान आंदोलन के कारण राजनीतिक विश्लेषक यह मानकर चल रहे थे कि आने वाले विधानसभा चुनाव में खेती-किसानी बड़ा मुद्दा बनेगा। 
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किसान आंदोलन में 700 से अधिक किसानों की मौत भी हो गई। जिसको लेकर राजनीतिक दलों ने केंद्र सरकार पर जमकर निशाना साधा और किसानों की हमदर्दी हासिल की। वहीं 4 महीने के बाद हो रहे विधानसभा चुनाव में हालात यह रहे कि कृषि कानून रद्द होते ही किसानों को एक तरह से भुला दिया गया। इस बार चुनाव में किसान कोई मुद्दा नहीं रहा

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98 प्रतिशत किसान कर्जदार
 एक रिपोर्ट के अनुसार पंजाब में खेती किसानी से जुड़े 98 प्रतिशत परिवार कर्जदार हैं। जिसके कारण सूबे के किसान लगातार आत्महत्या कर रहे हैं। एक आंकड़ों के अनुसार हर साल 600 से 700 किसान पंजाब में कर्ज के कारण आत्महत्या कर रहे हैं। पंजाब के इस मुद्दे को लेकर हमेशा सियासतदान अपनी राजनीतिक स्वार्थों को सिद्ध करते रहे हैं।

35 हजार करोड़ है कर्ज
 पंजाब के किसानों की आत्महत्या की एक बड़ी वजह राज्य के किसानों पर लगभग 35 हजार करोड़ रुपये कर्ज है। इस कर्ज का अधिकांश हिस्सा आढ़तियों का है। एक रिपोर्ट के अनुसार आढ़तियों के कर्ज के कारण ही किसान आत्महत्या करने को मजबूर हो रहे हैं।

किसान बन गए सियासतदान
कृषि कानूनों के विरोध में शुरू हुआ किसान आंदोलन का जनक पंजाब रहा। इसको खड़ा करने में राज्य की 32 किसान संगठनों ने अहम भूमिका निभाई। आंदोलन फतेह करने के बाद सूबे के किसान सियासतदान बन गए। हालांकि 32 में से सिर्फ 22 संगठनों ने ही चुनाव लड़ने का फैसला किया। अन्य किसान संगठनों ने चुनाव से दूरी बना ली।

77 सीटों पर किसानों का प्रभाव
पंजाब की कुल 117 विधानसभा सीटों में से 77 सीटें ऐसी हैं जिन पर किसानों का प्रभाव है। यह भी कह सकते हैं कि पंजाब की सत्ता की चाबी किसानों के पास ही है। यही कारण रहा कि अभी तक पंजाब के सभी सियासी दल किसानों का समर्थन हासिल करने की जुगत में रहते रहे हैं।

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