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सांसद मनीष तिवारी से बातचीत: चंडीगढ़ के हर मुद्दे पर दी बेबाक राय, प्रशासनिक ढांचे में बदलाव की पुरजोर वकालत
Mon, 14 Jul 2025 08:55 AM IST
निवेदिता वर्मा
रिशु राज सिंह, अमर उजाला, चंडीगढ़
रिशु राज सिंह, अमर उजाला, चंडीगढ़
Published by: निवेदिता वर्मा
Updated Mon, 14 Jul 2025 08:55 AM IST
सार
बतौर सांसद एक साल पूरा होने पर मनीष तिवारी चंडीगढ़ अमर उजाला कार्यालय पहुंचे और विभिन्न मुद्दों पर बेबाकी से अपनी बात रखी।
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सांसद मनीष तिवारी
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
पूर्व केंद्रीय मंत्री व चंडीगढ़ के सांसद मनीष तिवारी ने चंडीगढ़ के प्रशासनिक ढांचे पर गंभीर सवाल उठाए हैं। कहा कि अब समय आ गया है कि इस शहर के राजनीतिक भविष्य और प्रशासनिक व्यवस्था पर ठोस फैसले लिए जाएं। उन्होंने कहा कि शहर के प्रशासनिक ढांचे पर पुनर्विचार होना चाहिए क्योंकि मौजूदा व्यवस्था न तो संवेदनशील है और न ही जवाबदेह।
तिवारी ने उदाहरण देते हुए कहा कि मोहाली जैसे जिले में जहां तीन विधानसभा क्षेत्र आते हैं, वहां एक डीसी और एक एसएसपी काम संभालते हैं। इसी तरह पंचकूला, जो यमुनानगर तक फैला है, वहां भी प्रशासनिक व्यवस्था बेहद सरल और स्पष्ट है। एक डीसी और एक एसएसपी ही शहर को संभाल रहे हैं लेकिन चंडीगढ़ की स्थिति बिल्कुल उलट है। यहां डीसी, गृह सचिव, मुख्य सचिव और इन सबसे ऊपर गवर्नर तक एक हैवी ब्यूरोक्रेटिक स्ट्रक्चर खड़ा कर दिया गया है।
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उन्होंने आरोप लगाया कि इस जटिल ढांचे के चलते कोई भी निर्णय समय पर नहीं हो पाता और यही कारण है कि पिछले 20-25 वर्षों से कई महत्वपूर्ण मुद्दे लंबित पड़े हैं। उन्होंने आंकड़े देते हुए बताया कि केंद्र से चंडीगढ़ को करीब 20 हजार करोड़ मिलते हैं। करीब 6,000 करोड़ सीधे बजट में, 1,000 करोड़ पीजीआई को, 450 करोड़ पंजाब यूनिवर्सिटी व अन्य बाकी केंद्रीय संस्थानों को हर साल मिलते हैं। जब 11 बाय 11 किलोमीटर के शहर को इतनी बड़ी राशि मिल रही है, तो फिर बुनियादी समस्याएं जस की तस क्यों बनी हुई हैं।
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तिवारी ने उदाहरण देते हुए कहा कि मोहाली जैसे जिले में जहां तीन विधानसभा क्षेत्र आते हैं, वहां एक डीसी और एक एसएसपी काम संभालते हैं। इसी तरह पंचकूला, जो यमुनानगर तक फैला है, वहां भी प्रशासनिक व्यवस्था बेहद सरल और स्पष्ट है। एक डीसी और एक एसएसपी ही शहर को संभाल रहे हैं लेकिन चंडीगढ़ की स्थिति बिल्कुल उलट है। यहां डीसी, गृह सचिव, मुख्य सचिव और इन सबसे ऊपर गवर्नर तक एक हैवी ब्यूरोक्रेटिक स्ट्रक्चर खड़ा कर दिया गया है।
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उन्होंने आरोप लगाया कि इस जटिल ढांचे के चलते कोई भी निर्णय समय पर नहीं हो पाता और यही कारण है कि पिछले 20-25 वर्षों से कई महत्वपूर्ण मुद्दे लंबित पड़े हैं। उन्होंने आंकड़े देते हुए बताया कि केंद्र से चंडीगढ़ को करीब 20 हजार करोड़ मिलते हैं। करीब 6,000 करोड़ सीधे बजट में, 1,000 करोड़ पीजीआई को, 450 करोड़ पंजाब यूनिवर्सिटी व अन्य बाकी केंद्रीय संस्थानों को हर साल मिलते हैं। जब 11 बाय 11 किलोमीटर के शहर को इतनी बड़ी राशि मिल रही है, तो फिर बुनियादी समस्याएं जस की तस क्यों बनी हुई हैं।