{"_id":"17d1620284a5f00822074dfda69ed8b0","slug":"international-womens-day-special","type":"feature-story","status":"publish","title_hn":"वूमेन्स डेः महिलाओं के जज्बे की अनकही कहानियां","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
वूमेन्स डेः महिलाओं के जज्बे की अनकही कहानियां
खुशबू गोयल/अमर उजाला, चंडीगढ़
Updated Sat, 08 Mar 2014 12:24 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विकलांग थी पर हौंसला नहीं छोड़ा
एक पांव से विकलांग जरूर थी मगर हौसला कभी नहीं छोड़ा। मन में ठान लिया था कि जो काम सामान्य लोग कर सकते हैं तो मैं क्यो नहीं। पति से भी सहयोग मिला। पैरा ओलंपिक में देश के लिए टेबल टेनिस टीम में खेलने का मौका मिला। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का नेतृत्व करते हुए टेबल टेनिस में कई मेडल भी मिले। महिला दिवस पर वुमन कार रैली में खुद ड्राइव करूंगी। इच्छा बस इतनी है कि समाज में इस अवधारणा को मजबूत करूं कि महिलाएं किसी से कम नहीं हैं।
-पूनम, अंतरराष्ट्रीय टेबल टेनिस खिलाड़ी
मां की प्रेरणा को बेटी ने आगे बढ़ाया
मां शुभ मोदगिल अच्छी शूटर हैं। वही मेरी प्रेरणा बनीं। वह एनसीसी कैडेट्स को शूटिंग रेंज में सिखाती थीं। 13 साल की उम्र में उनके साथ ही शूटिंग रेंज में जाती थी। निशानेबाजी का शौक पैदा हुआ। पहले साल में ही चंडीगढ़ की टीम में सलेक्ट हो गईं। प्रतिभा निखरती गई और नेशनल और इंटरनेशनल पर खेलने का मौका मिला और मेडल जीते।
-अंजुम मोदगिल, शूटर
विज्ञापन
एक पांव से विकलांग जरूर थी मगर हौसला कभी नहीं छोड़ा। मन में ठान लिया था कि जो काम सामान्य लोग कर सकते हैं तो मैं क्यो नहीं। पति से भी सहयोग मिला। पैरा ओलंपिक में देश के लिए टेबल टेनिस टीम में खेलने का मौका मिला। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का नेतृत्व करते हुए टेबल टेनिस में कई मेडल भी मिले। महिला दिवस पर वुमन कार रैली में खुद ड्राइव करूंगी। इच्छा बस इतनी है कि समाज में इस अवधारणा को मजबूत करूं कि महिलाएं किसी से कम नहीं हैं।
-पूनम, अंतरराष्ट्रीय टेबल टेनिस खिलाड़ी
मां की प्रेरणा को बेटी ने आगे बढ़ाया
मां शुभ मोदगिल अच्छी शूटर हैं। वही मेरी प्रेरणा बनीं। वह एनसीसी कैडेट्स को शूटिंग रेंज में सिखाती थीं। 13 साल की उम्र में उनके साथ ही शूटिंग रेंज में जाती थी। निशानेबाजी का शौक पैदा हुआ। पहले साल में ही चंडीगढ़ की टीम में सलेक्ट हो गईं। प्रतिभा निखरती गई और नेशनल और इंटरनेशनल पर खेलने का मौका मिला और मेडल जीते।
विज्ञापन
-अंजुम मोदगिल, शूटर
मेहनत और लगन ने दिलाई सफलता
पहला एडवेंचर क्लब खोला
मेरी कंपनी नेचुरल स्टोन का कांसेप्ट लेकर आई थी। चंडीगढ़ में ग्यारह साल पहले यह काम शुरू किया तो 12 कर्मचारी थे। पूंजी कम लगी पर अब साल का टर्नओवर बेहतर है और सबसे अहम बात है कि मैं लोगों को जाब भी दे रही हूं। इसके अतिरिक्त चंडीगढ़ में सबसे पहला एडवेंचर क्लब खोलने का गौरव भी मुझको ही मिला।
सुप्रीत कौर, पार्टनर, बेस्टन एंड कंपनी
स्वस्थ जीवन की प्रेरणा मान कौर
98 साल की हो गई हूं। मेरी उम्र तक अधिकतर लोग जी ही नहीं पाते। जो हैं वे बीमारियों से ग्रस्त चारपाई पर लेटे होते हैं। खेल-कूद सबसे अच्छा व्यायाम है। इससे न आप सिर्फ फिट रहते हैं, बल्कि सम्मान भी बटोरते हैं। इस उम्र में एथलेटिक्स में जब मैं मेडल जीतती हूं तो अमेरिकन भी मेरी सेहत का राज पूछते हैं। इस साल ही अमेरिका और कनाडा में दस गोल्ड मेडल जीते। सुबह साढ़े तीन बजे उठकर रोज पहले सैर करती हूं। सादा खानपान ही लंबे स्वस्थ जीवन का राज है।
-मान कौर, वेटरन एथलीट
मेरी कंपनी नेचुरल स्टोन का कांसेप्ट लेकर आई थी। चंडीगढ़ में ग्यारह साल पहले यह काम शुरू किया तो 12 कर्मचारी थे। पूंजी कम लगी पर अब साल का टर्नओवर बेहतर है और सबसे अहम बात है कि मैं लोगों को जाब भी दे रही हूं। इसके अतिरिक्त चंडीगढ़ में सबसे पहला एडवेंचर क्लब खोलने का गौरव भी मुझको ही मिला।
सुप्रीत कौर, पार्टनर, बेस्टन एंड कंपनी
स्वस्थ जीवन की प्रेरणा मान कौर
98 साल की हो गई हूं। मेरी उम्र तक अधिकतर लोग जी ही नहीं पाते। जो हैं वे बीमारियों से ग्रस्त चारपाई पर लेटे होते हैं। खेल-कूद सबसे अच्छा व्यायाम है। इससे न आप सिर्फ फिट रहते हैं, बल्कि सम्मान भी बटोरते हैं। इस उम्र में एथलेटिक्स में जब मैं मेडल जीतती हूं तो अमेरिकन भी मेरी सेहत का राज पूछते हैं। इस साल ही अमेरिका और कनाडा में दस गोल्ड मेडल जीते। सुबह साढ़े तीन बजे उठकर रोज पहले सैर करती हूं। सादा खानपान ही लंबे स्वस्थ जीवन का राज है।
-मान कौर, वेटरन एथलीट
खुद को भी और दूसरों को भी सशक्त किया
25 हजार महिलाओं को सशक्त किया
जब से होश संभाला महिलाओं के उत्थान के लिए कुछ करने की तमन्ना थी। वन विभाग में नौकरी मिली और वही इसके लिए प्लेटफार्म बना। सरकार की ओर से चलाए गए साझा वन प्रबंधन कार्यक्रम के तहत ग्रामीण महिलाओं की समस्या को नजदीक से देखा। अंबाला और यमुनानगर के दस ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाओं की स्थिति पर शोध किया।
ग्रामीण महिलाओं के सशक्तीकरण के लिए काम शुरू किया। घर-घर जाकर महिलाओं से संपर्क किया। उनके उत्थान के लिए कार्यक्रम बनाए। दो लाख रुपये का रिवाविंग फंड तीन फीसदी की ब्याज पर महिलाओं को दिलवाया ताकि वे अपना बिजनस व अन्य कार्य कर सकें।
फुलकारी, फ्लोरमील कल्चर, जैविक खाद्य, जैविक खेती, शॉप, ब्यूटीपार्लर, डेरी, आदि कार्यों का प्रशिक्षण दिलवाया। इस तरह हरियाणा के ग्रामीण क्षेत्र की 25 महिलाओं को सशक्त कर समाज में सम्मान दिलवाया। ये वही महिलाएं हैं जो आज से पंद्रह साल पहले घरों से निकलकर बात करने से भी कतराती थीं।
-डॉ. अमरिंदर कौर, अतिरिक्त प्रधान मुख्य वन संरक्षण अधिकारी
जब से होश संभाला महिलाओं के उत्थान के लिए कुछ करने की तमन्ना थी। वन विभाग में नौकरी मिली और वही इसके लिए प्लेटफार्म बना। सरकार की ओर से चलाए गए साझा वन प्रबंधन कार्यक्रम के तहत ग्रामीण महिलाओं की समस्या को नजदीक से देखा। अंबाला और यमुनानगर के दस ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाओं की स्थिति पर शोध किया।
ग्रामीण महिलाओं के सशक्तीकरण के लिए काम शुरू किया। घर-घर जाकर महिलाओं से संपर्क किया। उनके उत्थान के लिए कार्यक्रम बनाए। दो लाख रुपये का रिवाविंग फंड तीन फीसदी की ब्याज पर महिलाओं को दिलवाया ताकि वे अपना बिजनस व अन्य कार्य कर सकें।
फुलकारी, फ्लोरमील कल्चर, जैविक खाद्य, जैविक खेती, शॉप, ब्यूटीपार्लर, डेरी, आदि कार्यों का प्रशिक्षण दिलवाया। इस तरह हरियाणा के ग्रामीण क्षेत्र की 25 महिलाओं को सशक्त कर समाज में सम्मान दिलवाया। ये वही महिलाएं हैं जो आज से पंद्रह साल पहले घरों से निकलकर बात करने से भी कतराती थीं।
-डॉ. अमरिंदर कौर, अतिरिक्त प्रधान मुख्य वन संरक्षण अधिकारी
हालातों के आगे कभी झुकी नहीं
नहीं था आसान थिएटर को चुनना
थिएटर मेरी जिंदगी में तब शुरू हुआ जब 1974-75 में दिल्ली के एनएसडी में एडमीशन लिया। घर छोड़ कर दिल्ली जाना आसान नहीं था। तब थिएटर को सिर्फ शौक की चीज मानी जाती थी लेकिन इन हालातों के आगे कभी झुकी नहीं।
एनएसडी के निर्देशक एब्राहम अलकाजी से थिएटर के गुर सीखें और फिर इसके बाद थिएटर में ही आगे बढ़ी। जिंदगी में कई मुकाम ऐसे आए जब थिएटर को लेकर बहुत दुविधा होती थी। इनमें शादी का समय भी था। एक लड़की को शादी के बाद बहुत बदलाव देखने को मिलते है लेकिन इसके लिए भी पहले से ही प्लानिंग कर ली थी।
शादी के बाद घर में ही अपना स्टूडियो खोल लिया, जिससे अपना खुद का ग्रुप बनाने में आसानी हुई। मेरा ग्रुप ‘द कंपनी’ 25 साल पहले ही शुरू हुआ और बहुत खुश हूं की इस ग्रुप के 20 लोग कई जगह काम करते है फिर भी अभी तक मेरी टीम में कोई बदलाव नहीं आया।
इन नामों में वंश भारदवाज, दीप ग्रेवाल, रमनजीत कौर ने बाहर भी काफी नाम कमाया है और ग्रुप से भी जुड़े हैं। अपने स्टूडेंट में माही गिल को भी बहुत याद करती हूं जो आजकल बॉलीवुड में शानदार अभिनय कर रही है।
-नीलम मान सिंह
थिएटर मेरी जिंदगी में तब शुरू हुआ जब 1974-75 में दिल्ली के एनएसडी में एडमीशन लिया। घर छोड़ कर दिल्ली जाना आसान नहीं था। तब थिएटर को सिर्फ शौक की चीज मानी जाती थी लेकिन इन हालातों के आगे कभी झुकी नहीं।
एनएसडी के निर्देशक एब्राहम अलकाजी से थिएटर के गुर सीखें और फिर इसके बाद थिएटर में ही आगे बढ़ी। जिंदगी में कई मुकाम ऐसे आए जब थिएटर को लेकर बहुत दुविधा होती थी। इनमें शादी का समय भी था। एक लड़की को शादी के बाद बहुत बदलाव देखने को मिलते है लेकिन इसके लिए भी पहले से ही प्लानिंग कर ली थी।
शादी के बाद घर में ही अपना स्टूडियो खोल लिया, जिससे अपना खुद का ग्रुप बनाने में आसानी हुई। मेरा ग्रुप ‘द कंपनी’ 25 साल पहले ही शुरू हुआ और बहुत खुश हूं की इस ग्रुप के 20 लोग कई जगह काम करते है फिर भी अभी तक मेरी टीम में कोई बदलाव नहीं आया।
इन नामों में वंश भारदवाज, दीप ग्रेवाल, रमनजीत कौर ने बाहर भी काफी नाम कमाया है और ग्रुप से भी जुड़े हैं। अपने स्टूडेंट में माही गिल को भी बहुत याद करती हूं जो आजकल बॉलीवुड में शानदार अभिनय कर रही है।
-नीलम मान सिंह
एजूकेशन में भी पीछे नहीं बेटियां
देश की बेटियां एजूकेशन के मामले में भी किसी से पीछे नहीं हैं। स्टेज पर बेटियों को पुरस्कार पाते देख अभिभावकों की खुशी चेहरे और आंखों में साफ झलक रही थी। सेक्टर-36 स्थित नार्थ रीजन के टॉप गर्ल्स कालेज में शुमार एमसीएम डीएवी कालेज फॉर वुमन के वार्षिक समारोह में पढ़ाई, खेल और अन्य गतिविधियों में नेशनल और इंटरनेशनल स्तर पर पुरस्कार पाने वाली 435 होनहार छात्राओं को सम्मानित किया गया।
हुनर हो तो कम उम्र में भी मंजिल पाना मुश्किल नहीं है। एमसीएम में बीए प्रथम वर्ष की छात्रा परमजोत इसका उदाहरण है। साल भर में इंटर कालेज और यूनिवर्सिटी स्तर पर वोकल म्यूजिक में 10 से अधिक अवार्ड जीतने पर बेस्ट वोकलिस्ट घोषित किया गया।
श्रेया घोसाल को रोल मॉडल मानने वाली परमजोत वायस ऑफ पंजाब के टॉप 8 में स्थान बना चुकी है। इनका सपना एक बेहतरीन प्लेबैक सिंगर बनना है। अपनी सफलता का श्रेय टीचर्स और अपने अभिभावक पिता अशोक कुमार और मां सरोज बाला को देती हैं।
हुनर हो तो कम उम्र में भी मंजिल पाना मुश्किल नहीं है। एमसीएम में बीए प्रथम वर्ष की छात्रा परमजोत इसका उदाहरण है। साल भर में इंटर कालेज और यूनिवर्सिटी स्तर पर वोकल म्यूजिक में 10 से अधिक अवार्ड जीतने पर बेस्ट वोकलिस्ट घोषित किया गया।
श्रेया घोसाल को रोल मॉडल मानने वाली परमजोत वायस ऑफ पंजाब के टॉप 8 में स्थान बना चुकी है। इनका सपना एक बेहतरीन प्लेबैक सिंगर बनना है। अपनी सफलता का श्रेय टीचर्स और अपने अभिभावक पिता अशोक कुमार और मां सरोज बाला को देती हैं।
इस बार चुनावों में खास होंगी बेंटियां
आगामी लोकसभा चुनाव में किसी भी उम्मीदवार की जीत का आधार युवाओं का वोट होगा। उसमें भी बेटियों के वोट अधिक मायने रखेंगे। यह कहना है सेक्टर-36 एमसीएम कालेज की छात्राओं का।
हर फील्ड में लड़कियां बेहतर कर रही हैं। जिन लड़कियों को वोट डालने का अधिकार मिला है उन्हें इसका प्रयोग करना चाहिए। मैं भी पहली बार लोकसभा चुनाव में वोट का प्रयोग करूंगी।
निशा (बीए सेकेंड ईयर)
मेरा वोट चंडीगढ़ में तो नहीं है लेकिन मैं पहली बार फिरोजपुर में वोट डालने के लिए जाऊंगी। लड़कियों के शिक्षित होने का यह फर्ज बनता है कि वह लोकतंत्र में अपने मत का प्रयोग करें।
सिमरत (बीकॉम स्टूडेंट)
वैसे तो मैं दूसरी बार वोट डालूंगी लेकिन लोकसभा चुनाव में पहली बार वोट डालने का मौका मिलेगा। मैं वोट डालने को लेकर काफी उत्साहित हूं।
आकांक्षा धवन (बीकॉम स्टूडेंट)
छात्राओं को भी मतदान के दिन को सिर्फ छुट्टी के तौर पर नहीं समझना चाहिए। जब छात्राएं सभी फील्ड में नेतृत्व कर रही हैं तो मतदान में भी उन्हें रोल मॉडल बनना चाहिए।
साहिबा (बीए फर्स्ट ईयर)
हर फील्ड में लड़कियां बेहतर कर रही हैं। जिन लड़कियों को वोट डालने का अधिकार मिला है उन्हें इसका प्रयोग करना चाहिए। मैं भी पहली बार लोकसभा चुनाव में वोट का प्रयोग करूंगी।
निशा (बीए सेकेंड ईयर)
मेरा वोट चंडीगढ़ में तो नहीं है लेकिन मैं पहली बार फिरोजपुर में वोट डालने के लिए जाऊंगी। लड़कियों के शिक्षित होने का यह फर्ज बनता है कि वह लोकतंत्र में अपने मत का प्रयोग करें।
सिमरत (बीकॉम स्टूडेंट)
वैसे तो मैं दूसरी बार वोट डालूंगी लेकिन लोकसभा चुनाव में पहली बार वोट डालने का मौका मिलेगा। मैं वोट डालने को लेकर काफी उत्साहित हूं।
आकांक्षा धवन (बीकॉम स्टूडेंट)
छात्राओं को भी मतदान के दिन को सिर्फ छुट्टी के तौर पर नहीं समझना चाहिए। जब छात्राएं सभी फील्ड में नेतृत्व कर रही हैं तो मतदान में भी उन्हें रोल मॉडल बनना चाहिए।
साहिबा (बीए फर्स्ट ईयर)
चीन में नाम चमकाने को तैयार ये बेटी
खेल हो या फिर पढ़ाई लड़कियां किसी भी क्षेत्र में पीछे नहीं हैं। इनकी पूरी लगन और मेहनत ही इन्हें सफलता के राह पर बढ़ाती है। ऐसी ही एक मिसाल बनकर उभरी है सिटी ब्यूटीफुल की युवा गोल्फर तवलीन बतरा कि जोकि पढ़ाई के साथ साथ स्पोर्ट्स में भी आगे रहती हैं।
तवलीन का चयन चीन में खेली जाने वाली निक फलैडों गोल्फ टूर के लिए भारतीय टीम में हुआ है। तीन दिवसीय गोल्फ टूर के लिए तवलीन मंगलवार 11 मार्च को चीन के लिए उड़ान भरेंगी। भवन विद्यालय सेक्टर 27 में 12 की छात्रा तलवीन का चयन गोल्फ यूनियन की मेरिट लिस्ट के जरिए हुआ है।
जूनियर वर्ग में खेलने वाली इस गोल्फर की जूनियर में मेरिट लिस्ट में 9 स्थान पर स्थान है। चंडीगढ़ गोल्फ क्लब में आयोजित पंजाब ओपन में तवलीन ट्राफी जीतने में कामयाब हुई ।
पिता से ली प्ररेणा
तवलीन केपिता इंद्र मोहन खुद गोल्फ खेलते हैं। उनके साथ जाने के बाद इसे भी गोल्फ खेलना में दिलचस्पी जागी।
तवलीन चंडीगढ़ गोल्फ रेंज में कोच जैसी ग्रेवाल की देख्ररेख में रोजाना अभ्यास करती है।
वर्ष 2012 में चंडीगढ़ गोल्फ कोर्स में अयोजित एमेच्योर गोल्फ चैंपियनशिप में गोल्ड मेडल जीता, वर्ष 2013 में चंडीगढ़ गोल्फ क्लब में आयोजित पंजाब ओपन में विजेता ट्राफी जीती और वर्ष 2013 में पंचकूला गोल्फ क्लब में सीजीए गोल्फ टूर्नामेंट में गर्ल्स टाइटल का खिताब अपने नाम किया।
तवलीन का चयन चीन में खेली जाने वाली निक फलैडों गोल्फ टूर के लिए भारतीय टीम में हुआ है। तीन दिवसीय गोल्फ टूर के लिए तवलीन मंगलवार 11 मार्च को चीन के लिए उड़ान भरेंगी। भवन विद्यालय सेक्टर 27 में 12 की छात्रा तलवीन का चयन गोल्फ यूनियन की मेरिट लिस्ट के जरिए हुआ है।
जूनियर वर्ग में खेलने वाली इस गोल्फर की जूनियर में मेरिट लिस्ट में 9 स्थान पर स्थान है। चंडीगढ़ गोल्फ क्लब में आयोजित पंजाब ओपन में तवलीन ट्राफी जीतने में कामयाब हुई ।
पिता से ली प्ररेणा
तवलीन केपिता इंद्र मोहन खुद गोल्फ खेलते हैं। उनके साथ जाने के बाद इसे भी गोल्फ खेलना में दिलचस्पी जागी।
तवलीन चंडीगढ़ गोल्फ रेंज में कोच जैसी ग्रेवाल की देख्ररेख में रोजाना अभ्यास करती है।
वर्ष 2012 में चंडीगढ़ गोल्फ कोर्स में अयोजित एमेच्योर गोल्फ चैंपियनशिप में गोल्ड मेडल जीता, वर्ष 2013 में चंडीगढ़ गोल्फ क्लब में आयोजित पंजाब ओपन में विजेता ट्राफी जीती और वर्ष 2013 में पंचकूला गोल्फ क्लब में सीजीए गोल्फ टूर्नामेंट में गर्ल्स टाइटल का खिताब अपने नाम किया।
हौसले ने भरी उड़ान और कारवां बढ़ता चला गया
शादी के कुछ साल बाद ही पति की मौत हो गई और बेटा, बेटी व खुद की जिंदगी बसर करने की बड़ी जिम्मेदारी आ गई। चाहतीं तो मायके जाकर रह सकती थी, लेकिन ठान लिया था कि खुद के पैरों पर खड़ा होना है।
किराए पर दो कमरे लेकर आसपास के बच्चों को पढ़ाना शुरू किया। 10 साल पहले शुरू हुए इस स्कूल में उस समय महज 10 बच्चे थे, लेकिन अब यह स्कूल दसवीं तक का हो गया है और आज 700 बच्चे पढ़ते हैं। हौसले से यह उड़ान भरीं रायपुररानी स्थित एमजी हाई स्कूल की प्रिंसिपल नीलम अरोड़ा ने, जो नारी शक्ति की एक जबरदस्त मिसाल है।
आज उनके स्कूल की अपनी दो मंजिला इमारत है और इंग्लिश माध्यम स्कूल खोलने की तैयारी है। इन सबके पीछे एक जो मजबूत पहलू रहा, वह था दूसरों के बच्चों को अपना समझकर अच्छी शिक्षा देना। उन्होंने खुद के बच्चों को पढ़ा-लिखाकर सेटल तो किया ही, दूसरों के बच्चों को भी जीवन में आगे बढ़ाया।
नीलम की कहानी, उन्हीं की जुबानी
नीलम अरोड़ा ने बताया कि उन्होंने 1981 में शादी के बाद पारिवारिक जिम्मेदारियां संभाली। उथल-पुथल के बीच जिंदगी चलती रही, लेकिन 1993 में पति की मौत हो गई। अपने साथ-साथ बेटी और बेटे को भी संभालना था।
इसलिए आस-पास के बच्चों को पढ़ाना शुरू किया। कुछ मदद मिलती रही, हिम्मत बढ़ती गई और कारवां बढ़ता गया। स्कूल के बच्चे अलग-अलग क्षेत्रों में बाजी मारते हैं तो मेहनत का फल नजर आता है। अपनी बेटी को भी अच्छी शिक्षा दी, जो अब चंडीगढ़ स्थित देव समाज कॉलेज में लेक्चरार है।
उसकी अच्छे घर में शादी की। बेटे को भी बी-टेक कराई। जिंदगी गुजर रही है। अब अगला चैलेंज अपने एरिया में अच्छा इंगलिश माध्यम स्कूल खोलना है। सहयोगियों की मदद से इस चैलेंज को भी जरूर पूरा करूंगी।
किराए पर दो कमरे लेकर आसपास के बच्चों को पढ़ाना शुरू किया। 10 साल पहले शुरू हुए इस स्कूल में उस समय महज 10 बच्चे थे, लेकिन अब यह स्कूल दसवीं तक का हो गया है और आज 700 बच्चे पढ़ते हैं। हौसले से यह उड़ान भरीं रायपुररानी स्थित एमजी हाई स्कूल की प्रिंसिपल नीलम अरोड़ा ने, जो नारी शक्ति की एक जबरदस्त मिसाल है।
आज उनके स्कूल की अपनी दो मंजिला इमारत है और इंग्लिश माध्यम स्कूल खोलने की तैयारी है। इन सबके पीछे एक जो मजबूत पहलू रहा, वह था दूसरों के बच्चों को अपना समझकर अच्छी शिक्षा देना। उन्होंने खुद के बच्चों को पढ़ा-लिखाकर सेटल तो किया ही, दूसरों के बच्चों को भी जीवन में आगे बढ़ाया।
नीलम की कहानी, उन्हीं की जुबानी
नीलम अरोड़ा ने बताया कि उन्होंने 1981 में शादी के बाद पारिवारिक जिम्मेदारियां संभाली। उथल-पुथल के बीच जिंदगी चलती रही, लेकिन 1993 में पति की मौत हो गई। अपने साथ-साथ बेटी और बेटे को भी संभालना था।
इसलिए आस-पास के बच्चों को पढ़ाना शुरू किया। कुछ मदद मिलती रही, हिम्मत बढ़ती गई और कारवां बढ़ता गया। स्कूल के बच्चे अलग-अलग क्षेत्रों में बाजी मारते हैं तो मेहनत का फल नजर आता है। अपनी बेटी को भी अच्छी शिक्षा दी, जो अब चंडीगढ़ स्थित देव समाज कॉलेज में लेक्चरार है।
उसकी अच्छे घर में शादी की। बेटे को भी बी-टेक कराई। जिंदगी गुजर रही है। अब अगला चैलेंज अपने एरिया में अच्छा इंगलिश माध्यम स्कूल खोलना है। सहयोगियों की मदद से इस चैलेंज को भी जरूर पूरा करूंगी।