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हाईकोर्ट का निर्देश, बांझपन और दुर्घटना में गर्भपात का क्लेम देंगी बीमा कंपनियां
विवेक शर्मा/अमर उजाला, चंडीगढ़
Updated Tue, 15 Nov 2016 01:17 AM IST
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Punjab And Haryana Highcourt Chandigarh
- फोटो : File Photo
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विदेश की तर्ज पर अब भारत में भी बांझपन और हादसे में गर्भपात के लिए बीमा कंपनियों को मुआवजा देना होगा। मोनिका डी. मेहताब की जनहित याचिका पर हाईकोर्ट ने आईआरडीए को इस संदर्भ में नियम बनाने के निर्देश दिए हैं। कोर्ट में केंद्र सरकार ने इसे अपनी सैद्धांतिक मंजूरी दे दी, जिसके बाद अब इन नियमों के बनने का रास्ता साफ हो गया है।
आईआरडीए ने हाईकोर्ट को बताया कि नेशनल इंश्योरेंस ने बांझपन को कवर करने वाली दो पॉलिसी लांच की है और इस दिशा में अन्य कंपनियों को शामिल करने के लिए काम किया जा रहा है। हाईकोर्ट ने इस पर सुनवाई 16 दिसंबर तक स्थगित कर दी।
मोनिका डी. मेहताब ने अपनी याचिका में कहा है कि अमेरिका, ब्रिटेन व अन्य देशों में बांझपन या हादसे से हुआ गर्भपात बीमा कवर में आता है। वहां बांझपन या गर्भपात की स्थिति में बीमा कंपनियां पीड़ित को क्लेम की राशि मुहैया करवाती है। बांझपन की स्थिति में यह क्लेम अच्छे से अच्छा इलाज करवाने के लिए मुहैया करवाया जाता है। याची ने कहा कि जब विदेशों में ऐसा होता है तो भारत में भी इसके लिए प्रावधान होना चाहिए।
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भारत में अभी तक ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है और ये इंश्योरेंस के दायरे में भी नहीं आते हैं। हाईकोर्ट ने इस मामले में चार सरकारी बीमा कंपनियों, केंद्र सरकार और आईआरडीए (इंश्योरेंस रेगुलेटरी एंड डेवलपमेंट अथॉरिटी) को पार्टी बनाया था। वीरवार को इंश्योरेंस कंपनियों की ओर से कहा गया कि आईआरडीए ही इंश्योरेंस की रेगुलेटरी अथॉरिटी है और ऐसे में उन्हें ऐसे रेगुलेशन बनाने के निर्देश दिए जाएं, जिससे बांझपन और गर्भपात को बीमा कवर क्षेत्र में शामिल किया जाए। रेगुलेशन बनने के बाद ही सरकारी और प्राइवेट बीमा कंपनियां इस कवर का लाभ दे पाएंगी।
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आईआरडीए ने हाईकोर्ट को बताया कि नेशनल इंश्योरेंस ने बांझपन को कवर करने वाली दो पॉलिसी लांच की है और इस दिशा में अन्य कंपनियों को शामिल करने के लिए काम किया जा रहा है। हाईकोर्ट ने इस पर सुनवाई 16 दिसंबर तक स्थगित कर दी।
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मोनिका डी. मेहताब ने अपनी याचिका में कहा है कि अमेरिका, ब्रिटेन व अन्य देशों में बांझपन या हादसे से हुआ गर्भपात बीमा कवर में आता है। वहां बांझपन या गर्भपात की स्थिति में बीमा कंपनियां पीड़ित को क्लेम की राशि मुहैया करवाती है। बांझपन की स्थिति में यह क्लेम अच्छे से अच्छा इलाज करवाने के लिए मुहैया करवाया जाता है। याची ने कहा कि जब विदेशों में ऐसा होता है तो भारत में भी इसके लिए प्रावधान होना चाहिए।
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भारत में अभी तक ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है और ये इंश्योरेंस के दायरे में भी नहीं आते हैं। हाईकोर्ट ने इस मामले में चार सरकारी बीमा कंपनियों, केंद्र सरकार और आईआरडीए (इंश्योरेंस रेगुलेटरी एंड डेवलपमेंट अथॉरिटी) को पार्टी बनाया था। वीरवार को इंश्योरेंस कंपनियों की ओर से कहा गया कि आईआरडीए ही इंश्योरेंस की रेगुलेटरी अथॉरिटी है और ऐसे में उन्हें ऐसे रेगुलेशन बनाने के निर्देश दिए जाएं, जिससे बांझपन और गर्भपात को बीमा कवर क्षेत्र में शामिल किया जाए। रेगुलेशन बनने के बाद ही सरकारी और प्राइवेट बीमा कंपनियां इस कवर का लाभ दे पाएंगी।
केंद्र ने कहा, हमें कोई आपत्ति नहीं
highcourt
केंद्र ने कहा, हमें कोई आपत्ति नहीं
केंद्र सरकार ने कहा कि यदि आईआरडीए ऐसा रेगुलेशन तैयार करे तो उसे कोई आपत्ति नहीं है। सरकार ने इसके लिए कोर्ट में सैद्धांतिक मंजूरी दे दी। हाईकोर्ट ने आईआरडीए को इन प्रावधानों को अपनाने और इस दिशा में आगे बढ़कर काम करने के निर्देश दिए हैं। आईआरडीए की ओर से दी गई मंजूरी और प्रावधानों को अंतिम रूप दिए जाने के साथ ही बांझपन और गर्भपात की स्थिति में बीमा कवर के लाभ का रास्ता साफ हो जाएगा। हाईकोर्ट के इन आदेशों का प्रभाव देश के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों पर होगा। सबसे अधिक लाभ उन दंपतियों को मिलेगा जो संतान सुख के लिए अपनी जीवन भर की जमा पूंजी को इलाज में खर्च करने को मजबूर हैं।
‘हर बीमा कंपनी के लिए अनिवार्य हो’
याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया है कि बीमा के कवर का दायरा बढ़ाने के साथ ही बांझपन का बीमा हर कंपनी के लिए अनिवार्य किया जाना चाहिए। इस बीमा के तहत इलाज से लेकर अन्य लाभ दिए जाने का प्रावधान होना चाहिए। साथ ही अपील की है कि आईआरडीए इसके लिए विस्तृत प्रावधान बनाए ताकि कंपनियां इसके लिए बाध्य हो जाएं कि वे इस बीमा का लाभ दें।
केंद्र सरकार ने कहा कि यदि आईआरडीए ऐसा रेगुलेशन तैयार करे तो उसे कोई आपत्ति नहीं है। सरकार ने इसके लिए कोर्ट में सैद्धांतिक मंजूरी दे दी। हाईकोर्ट ने आईआरडीए को इन प्रावधानों को अपनाने और इस दिशा में आगे बढ़कर काम करने के निर्देश दिए हैं। आईआरडीए की ओर से दी गई मंजूरी और प्रावधानों को अंतिम रूप दिए जाने के साथ ही बांझपन और गर्भपात की स्थिति में बीमा कवर के लाभ का रास्ता साफ हो जाएगा। हाईकोर्ट के इन आदेशों का प्रभाव देश के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों पर होगा। सबसे अधिक लाभ उन दंपतियों को मिलेगा जो संतान सुख के लिए अपनी जीवन भर की जमा पूंजी को इलाज में खर्च करने को मजबूर हैं।
‘हर बीमा कंपनी के लिए अनिवार्य हो’
याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया है कि बीमा के कवर का दायरा बढ़ाने के साथ ही बांझपन का बीमा हर कंपनी के लिए अनिवार्य किया जाना चाहिए। इस बीमा के तहत इलाज से लेकर अन्य लाभ दिए जाने का प्रावधान होना चाहिए। साथ ही अपील की है कि आईआरडीए इसके लिए विस्तृत प्रावधान बनाए ताकि कंपनियां इसके लिए बाध्य हो जाएं कि वे इस बीमा का लाभ दें।