World Environment Day: विदेशों से नौकरी छोड़ युवा दे रहे जैविक खेती को बढ़ावा, बुजुर्ग कर रहे पौधरोपण की अपील
पर्यावरण बचाने के लिए कुछ युवा विदेशों से नौकरी छोड़कर देश में जैविक खेती को बढ़ावा दे रहे हैं तो वहीं बुजुर्ग अपने अनुभवों से मिट्टी के अनुकूल निशुल्क पौधे देकर लोगों से अधिक से अधिक पौधे लगाने की अपील कर रहे हैं।
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भारत कृषि प्रधान देश है, इसलिए पर्यावरण को बेहतर बनाए रखने में किसानों का बहुत बड़ा योगदान है। भारत विश्व का दूसरा सबसे बड़ा फल एवं सब्जी उत्पादक देश है। यहां दुनिया के करीब 12 प्रतिशत फल और सब्जियों का उत्पादन होता है। वहीं केला, आम, नींबू और पपीता के उत्पादन में भारत दुनिया में नंबर एक पर है, लेकिन बढ़ती तकनीक ने पर्यावरण असंतुलन को भी बढ़ाया है।
ज्यादातर फलों और सब्जियों में केमिकल के प्रयोग ने जहां लोगों की सेहत पर दुष्प्रभाव डाला है तो वहीं भूमि की उर्वरक शक्ति को भी खत्म किया है। आधुनिकता की दौड़ में भागते हुए कुछ युवा और बुजुर्गों ने पर्यावरण को बचाने के लिए एक बार फिर बीड़ा उठाया है।
अर्शदीप ने दुकानों पर होने वाले खर्च से कम लागत में खेत में उगा लीं ताजा फल और सब्जियां
सेक्टर-48 निवासी अर्शदीप (38) ने पर्यावरण को बचाने के लिए नजीर पेश की है। विदेशों में रिसर्च करने बाद अर्शदीप को लगा कि केमिकलयुक्त सब्जी और फल खाने से लोगों की सेहत पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा है। उन्होंने भारत लौटकर यहां के हालातों का जायजा लिया। उन्होंने जॉर्जिया में रिसर्च वैज्ञानिक के रूप में इस विषय पर अध्ययन किया। इसके बाद पूरे साल में अपने परिवार का राशन, अन्न, सब्जी व फल का खर्चा निकाला। इस अनुमान के अनुसार होशियारपुर में एक एकड़ भूमि पर जैविक खेती के माध्यम से एक साल तक अनाज, फल और सब्जी उगाई। उनके शोध के अनुसार चार लोगों का परिवार एक साल में बाजार से इतना सामान खरीदने में लगभग डेढ़ लाख रुपये खर्च करता है जबकि 90 हजार रुपये में जैविक खेती से इतना सामान उगाकर उपयोग किया जा सकता है। अर्शदीप ने बताया कि उन्नत खेती का सबसे अच्छा उदाहरण आज कोरिया, ऑस्ट्रेलिया और इजराइल हैं। वहां कम पानी, बिना बिजली और रसायनों के बेहतर खेती होती है। रिसर्च के दौरान यहां से काफी कुछ सीखने को मिला। जैविक खेती को लेकर अर्शदीप ने एक किताब लिखी है, जिसमें उन्होंने इस तरह की खेती एक ओर किसानों की आय बढ़ाती है, दूसरी ओर हमें शुद्ध खाद्यान्न उपलब्ध कराती है।
आठ एकड़ भूमि पर 50 तरह की फसलें बिना किसी रसायन के उगा रहे सीएस ग्रेवाल
सेक्टर-9 निवासी सीएस ग्रेवाल अमेरिका में एक कार बनाने वाली कंपनी में नौकरी करते थे। इस दौरान बच्चों को पंजाब के शुद्ध खानपान के बारे में बताते थे, लेकिन वर्ष 2008 में लौटे तो सबकुछ उलट था। पत्नी ने कहा कि अपनी जमीन पर एक मॉडल फसल तैयार करनी चाहिए ताकि लोगों को पता चले कि बिना रसायनों के भी बेहतर खेती हो सकती है। मोहाली के पास अपने फार्म हाउस में यह प्रयोग शुरू किया। वर्ष 2013 में एक एकड़ भूमि में मुश्किल से कुछ बैंगन ही उगा पाए, लेकिन हिम्मत नहीं हारी। उसके बाद प्रयास जारी रहा, लगभग आठ साल की मेहनत के बाद आज आठ एकड़ भूमि पर 50 तरह की फसलें बिना किसी रसायन के उगा रहे हैं, जिसमें सभी दालें, सब्जी और फल हैं। वहीं मुर्गी पालन से अंडे और गाय पालन से शुद्ध दूध ले रहे हैं। कीड़ों को मारने के लिए पॉलिनेटर बने हैं जो उन्हें अपनी ओर आकर्षित करके मारते हैं और हर्बल की खुशबू से उन्हें दूर भगाकर फसलों को बचाते हैं। किसान और अन्य लोग भी ऐसे ही प्रयोग करें, इसके लिए अब प्रत्येक शनिवार को फार्म हाउस पर लोगों को आमंत्रित किया जाता है। वहां अपने अनुभवों को साझा किया जाता है। इसमें बताते हैं कि प्रकृति हमारी ताकत है, इससे दोस्ती करें। इसमें स्कूल व कॉलेज के बच्चे भी शामिल होते हैं।अनुभव सब पर हावी... रिटायरमेंट के बाद करम सिंह ने उठा ली पर्यावरण को बचाने की जिम्मेदारी
सेक्टर-125 मोहाली निवासी करम सिंह की उम्र 80 साल होने के बावजूद पर्यावरण के प्रति प्रेम कम नहीं हुआ है। बागवानी में एमएससी करने के बाद पर्यावरण को लेकर करम सिंह में जज्बा जागा। नौकरी में फुर्सत नहीं मिली तो रिटायरमेंट के बाद वह अपने स्तर पर पौधे उगाकर लोगों को बांटना शुरू किया। इसके लिए कई जगह जमीन की मांग की, लेकिन कहीं भूमि नहीं मिली जहां वह पौधे उगाकर लोगों को निशुल्क बांट सकें। छोटे स्तर पर शुरू हुआ काम एक निजी कंपनी को पसंद आया। उन्होंने कहा कि आप हमारे यहां पौधे उगाएं। करम सिंह ने काम शुरू किया, लेकिन लागत ज्यादा आने के कारण कंपनी ने लोगों को निशुल्क पौधे देने से मना कर दिया। करम सिंह ने निर्णय लिया कि अब खुद की भूमि खरीदकर वहां पौधे उगाएंगे और लोगों को निशुल्क देंगे। छोटे स्तर पर ही उन्होंने अब तक एक लाख पौधे लोगों को बांट दिए हैं। इसके अलावा एक संस्था को हर साल 50 हजार पौधे निशुल्क देकर पंजाब के विभिन्न जिलों में लगवाते हैं। साथ ही उनकी देखरेख के लिए समय समय पर जाते हैं। करम सिंह अपने अनुभव को लोगों से साझा करने के लिए ज्यादा से ज्यादा कार्यशालाओं में भाग लेते हैं।
स्थानीय स्तर पर उगेगी फल-सब्जी तो बेहतर होगा पर्यावरण
मुख्य वन संरक्षक देवेंद्र दलाई का कहना है कि चंडीगढ़ में काफी संख्या में फल व सब्जी बाहर से मंगवाई जाती है। लोग शहतूत, जामुन, अमरूद, आम जैसे फलों और सब्जियों को अपने स्तर उगा सकते हैं। इससे ट्रांसपोटेशन में जो कार्बन फुटप्रिंट निकलता है उसे कम किया जा सकता है और दूसरी ओर स्थानीय पेड़ पौधे लगने से भूमिगत जल स्तर बढ़ेगा। जिस जगह जिस पेड़ का जंगल है उसे कभी बदलें नहीं। एक बार पेड़ों की किस्म बदलने पर दूसरी प्रजाति ठीक से बढ़ती नहीं है और पहली प्रजाति फिर से अपनी गुणवत्ता के अनुसार फल नहीं दे पाती है।वन क्षेत्र में कमी आई, शहरी क्षेत्र में बढ़ी हरियाली
शहर में विकास कार्यों के लिए सबसे पहली योजना पेड़ों की कटाई की आती है। पर्यावरण सिटी ब्यूटीफुल की पहचान है। वर्ष 2017 में फॉरेस्ट विभाग की रिपोर्ट के अनुसार चंडीगढ़ में वन क्षेत्र में 0.1 स्क्वायर किलोमीटर की कमी आई है, लेकिन शहर में ग्रीन क्षेत्र बढ़ा है। विकास कार्यों और बढ़ती जनसंख्या के कारण यह संभव है, लेकिन शहर में बढ़ती हरियाली से भी रिपोर्ट में संतोष जताया गया है।चंडीगढ़ की हरियाली एक नजर में
सुखना वाइल्ड लाइफ सेंचुरी- 2598.482 हेक्टरलेक रिजर्व फॉरेस्ट- 153.93 हेक्टर
सुखना चो रिजर्व फॉरेस्ट- 395.924 हेक्टर
पटियाला की राव फॉरेस्ट- 136.475 हेक्टर
मनीमाजरा फॉरेस्ट एरिया- 5.53 हेक्टर
कुल- 3290.3 हेक्टर