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अब रेलवे ट्रैक से दूर रहेंगे हाथी और नहीं होंगे हादसे, कनेक्शन मधुमक्खियों से...अनोखा तरीका
मोहित धुपड़/न्यूज डेस्क, चंडीगढ़
Updated Sat, 01 Dec 2018 10:21 AM IST
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ट्रेन हादसे न हों, इसके लिए हाथियों को ट्रैकों से दूर रखने के लिए इंडियन रेलवे ने बेहद अनोखा तरीका खोज निकाला है, जिसका कनेक्शन मधुमक्खियों से है। रेलवे मधुमक्खियों की कृत्रिम गूंज का सहारा ले रहा है। अब उत्तर रेलवे अपने क्षेत्र के ऐसे प्रभावित क्षेत्रों में लाउड स्पीकर लगवा रहा है, जिससे मधुमक्खियों के झुंड की कृत्रिम आवाज गूंजेगी। ट्रेन आने से पांच मिनट पहले ये लाउडस्पीकर ऑन कर दिए जाएंगे और पांच मिनट तक मधुमक्खियों की आवाज गूंजती रहेगी। रेलवे का दावा है कि इस गूंज से हाथी रेल लाइनों के पास आएंगे ही नहीं और इससे रेल हादसों में कमी आएगी।
दरअसल, रेलवे और वन विभाग के अनुसंधान के बाद इस फार्मूले को तैयार किया गया था। उत्तर रेलवे अब हाथियों से होने वाले रेल हादसों को रोकने के लिए इस फार्मूले पर काम कर रहा है। इस अनुसंधान में ये तथ्य सामने आया है कि जंगलों में मधुमक्खियों का झुंड हाथियों का बहुत परेशान करता है। इसलिए हाथियों को जैसे ही मधुमक्खियों के झुंड की आवाज सुनाई देती है, वे परेशान होकर वहां से रास्ता ही बदल जाते हैं। इसलिए उत्तर रेलवे ने वहां के हाथी प्रभावित इलाकों में स्थित स्टेशनों पर ऐसे लाउड स्पीकर लगाने शुरू कर दिए हैं।
उधर, इन इलाकों में ट्रेन की स्पीड 30 से 35 किलोमीटर प्रति घंटा रखने के भी निर्देश दिए हैं। उत्तर भारत में उत्तराखंड में टांडा रेंज जंगल से लालकुआं, देहरादून, हल्द्वानी, नैनीताल समेत बरेली-दिल्ली, वेस्टर्न यूपी इत्यादि इलाकों में रेल लाइनें हाथियों से ज्यादा प्रभावित हैं। इसलिए अभी इस बेल्ट में लाउडस्पीकर लगाने का काम शुरू किया गया है। इसके अलावा देश में वेस्ट बंगाल, असम में लुमडिंग आरक्षित जंगल, जलपाईगुड़ी के बिनागुड़ी इलाके में, आंधप्रदेश, तमिलनाडु, ओडिशा, छत्तीसगढ़ इलाकों में भी रेल लाइनों पर हाथियों से हादसों का खतरा बना रहता है।
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दरअसल, रेलवे और वन विभाग के अनुसंधान के बाद इस फार्मूले को तैयार किया गया था। उत्तर रेलवे अब हाथियों से होने वाले रेल हादसों को रोकने के लिए इस फार्मूले पर काम कर रहा है। इस अनुसंधान में ये तथ्य सामने आया है कि जंगलों में मधुमक्खियों का झुंड हाथियों का बहुत परेशान करता है। इसलिए हाथियों को जैसे ही मधुमक्खियों के झुंड की आवाज सुनाई देती है, वे परेशान होकर वहां से रास्ता ही बदल जाते हैं। इसलिए उत्तर रेलवे ने वहां के हाथी प्रभावित इलाकों में स्थित स्टेशनों पर ऐसे लाउड स्पीकर लगाने शुरू कर दिए हैं।
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उधर, इन इलाकों में ट्रेन की स्पीड 30 से 35 किलोमीटर प्रति घंटा रखने के भी निर्देश दिए हैं। उत्तर भारत में उत्तराखंड में टांडा रेंज जंगल से लालकुआं, देहरादून, हल्द्वानी, नैनीताल समेत बरेली-दिल्ली, वेस्टर्न यूपी इत्यादि इलाकों में रेल लाइनें हाथियों से ज्यादा प्रभावित हैं। इसलिए अभी इस बेल्ट में लाउडस्पीकर लगाने का काम शुरू किया गया है। इसके अलावा देश में वेस्ट बंगाल, असम में लुमडिंग आरक्षित जंगल, जलपाईगुड़ी के बिनागुड़ी इलाके में, आंधप्रदेश, तमिलनाडु, ओडिशा, छत्तीसगढ़ इलाकों में भी रेल लाइनों पर हाथियों से हादसों का खतरा बना रहता है।
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पानी की तलाश में निकलते हैं हाथी, शाम को होते हैं ज्यादा हादसे
इस संबंध में संबंधित इलाकों के वन्य जीव प्राणी विभाग ने रेल मंत्रालय को कई बार पत्र भी लिखे हैं। इसके चलते रेलवे इस तरह की व्यवस्था करवा रहा है। हाथियों का झुंड जंगलों में पानी के स्त्रोत सूखने व खत्म होने के बाद जंगलों से बाहर निकलते हैं। हाथी इन इलाकों में गुजर रही रेल लाइनों पर पहुंचते हैं और हादसों का सबब बन जाते हैं। एक सर्वे के अनुसार 33 फीसदी हादसे सुबह, 42 फीसदी शाम और 17 फीसदी हादसे रात को होते हैं।
31 सालों में 300 से अधिक हाथियों की मौत
पिछले 31 सालों में ट्रेनों से टकराकर 300 से अधिक हाथियों की मौत हो चुकी है। सबसे अधिक वर्ष 2012 से अब तक पश्चिमी बंगाल में 75 हाथी ट्रेन से टकराकर मरे। देश में 78 हाथी कॉरिडोर हैं। इन हाथी कॉरिडोरों में 26 हजार के करीब हाथी मौजूद हैं। इन हाथी कॉरिडोरों में 40 नेशनल हाइवे पर, 20 रेल पटरियों पर व 18 नेशनल हाइवे व रेल पटरियों दोनों पर हैं। सबसे ज्यादा हाथी कॉरिडोर उत्तराखंड, झारखंड, पश्चिमी बंगाल व असम में हैं।
31 सालों में 300 से अधिक हाथियों की मौत
पिछले 31 सालों में ट्रेनों से टकराकर 300 से अधिक हाथियों की मौत हो चुकी है। सबसे अधिक वर्ष 2012 से अब तक पश्चिमी बंगाल में 75 हाथी ट्रेन से टकराकर मरे। देश में 78 हाथी कॉरिडोर हैं। इन हाथी कॉरिडोरों में 26 हजार के करीब हाथी मौजूद हैं। इन हाथी कॉरिडोरों में 40 नेशनल हाइवे पर, 20 रेल पटरियों पर व 18 नेशनल हाइवे व रेल पटरियों दोनों पर हैं। सबसे ज्यादा हाथी कॉरिडोर उत्तराखंड, झारखंड, पश्चिमी बंगाल व असम में हैं।