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इंडियन एयरफोर्स ने मनाई बेमिसाल एयरक्राफ्ट की सिल्वर जुबली, जिससे दी थी पाकिस्तान को शिकस्त
मोहित धुपड़, अमर उजाला, चंडीगढ़
Updated Thu, 22 Nov 2018 05:14 PM IST
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1971 का भारत पाकिस्तान युद्ध
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1971 के भारत-पाक युद्ध के दौरान जब पाकिस्तानी सेना सरहद को पार कर भारत में घुसने की कोशिश कर रही थी तो इंडियन एयरफोर्स ने भी पाकिस्तानियों को खदेड़ने में अपनी अहम भूमिका निभाई थी। उस समय इंडियन एयरफोर्स के लड़ाकू जहाज हंटर जहां राजस्थान एरिया में सक्रिय था, वहीं पंजाब और अन्य क्षेत्रों में भी पाकिस्तानियों को जवाब देने के लिए एयरफोर्स का सहारा लिया गया।
ऐसे में अचानक इंडियन एयरफोर्स को ऐसे जहाजों की कमी खलने लगी जो बमबारी कर पाक सेना को तितर-बितर कर सकें। युद्ध में इसी अचानक जरूरत के मद्देनजर यह आदेश हुआ कि इंडियन एयरफोर्स अपने ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट एएन-12 को बमबारी मिशन में लगाकर युद्ध में इस्तेमाल किया जाए। इस आदेश के बाद इस एयरक्राफ्ट को तुरंत मोडिफाई कर युद्ध में इस्तेमाल किया गया और इस एयरक्राफ्ट ने पाकिस्तानी सेना और उनकी टैंक रेजीमेंट पर बम गिराकर उसे खदेड़ दिया।
भारत पाक युद्ध में एयरक्राफ्ट के पराक्रम को आज 25 साल बाद इंडियन एयरफोर्स याद कर रही है। एयरफोर्स इस एयरक्राफ्ट की सिल्वर जुबली मना रही है । इसी के चलते चंडीगढ़ एयरफोर्स स्टेशन में इस एयरक्राफ्ट की सन 1993 में अलविदा उड़ान भरने वाले विंग कमांडर सतीश भाटिया को सम्मानित किया गया। इस अवसर पर रिटायर्ड एयर मार्शल वी. पुरी भी मौजूद रहे। चंडीगढ़ स्थित एयरफोर्स की 12 विंग के एओसी एस. श्रीनिवासन ने इस अवसर पर सभी वेटरन अफसरों व उनके परिजनों का गर्मजोशी से स्वागत किया।
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ऐसे में अचानक इंडियन एयरफोर्स को ऐसे जहाजों की कमी खलने लगी जो बमबारी कर पाक सेना को तितर-बितर कर सकें। युद्ध में इसी अचानक जरूरत के मद्देनजर यह आदेश हुआ कि इंडियन एयरफोर्स अपने ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट एएन-12 को बमबारी मिशन में लगाकर युद्ध में इस्तेमाल किया जाए। इस आदेश के बाद इस एयरक्राफ्ट को तुरंत मोडिफाई कर युद्ध में इस्तेमाल किया गया और इस एयरक्राफ्ट ने पाकिस्तानी सेना और उनकी टैंक रेजीमेंट पर बम गिराकर उसे खदेड़ दिया।
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भारत पाक युद्ध में एयरक्राफ्ट के पराक्रम को आज 25 साल बाद इंडियन एयरफोर्स याद कर रही है। एयरफोर्स इस एयरक्राफ्ट की सिल्वर जुबली मना रही है । इसी के चलते चंडीगढ़ एयरफोर्स स्टेशन में इस एयरक्राफ्ट की सन 1993 में अलविदा उड़ान भरने वाले विंग कमांडर सतीश भाटिया को सम्मानित किया गया। इस अवसर पर रिटायर्ड एयर मार्शल वी. पुरी भी मौजूद रहे। चंडीगढ़ स्थित एयरफोर्स की 12 विंग के एओसी एस. श्रीनिवासन ने इस अवसर पर सभी वेटरन अफसरों व उनके परिजनों का गर्मजोशी से स्वागत किया।
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लेह, सियाचिन, चीन बॉर्डर पर फौज को पहुंचाता था रसद सामग्री
1962 के भारत चीन युद्ध के बाद इंडियन एयरफोर्स ने इस एयरक्राफ्ट को रूस से खरीदा था। यह एक ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट था, जिसका मकसद लेह और चीन बॉर्डर पर तैनात फौज के जवानों तक रसद सामग्री पहुंचाना था। यह एयरक्राफ्ट चंडीगढ़ से ही इन दुर्गम इलाकों के लिए उड़ान भरता था, क्योंकि इस एयरक्राफ्ट की स्क्वाड्रन 25 और 44 चंडीगढ़ में ही थी, लेकिन जरूरत पड़ी तो सन 1971 की लड़ाई में इसी मालवाहक जहाज ने बम बसाकर पाकिस्तानियों के छक्के छुड़ा दिए।
यह एक बेमिसाल एयरक्राफ्ट था, जिसने सियाचिन ग्लेशियर, लेह लद्दाख और चीन बॉर्डर पर तैनात सेना के जवानों को पूरा बैकअप दिया। साथ ही इस एयरक्राफ्ट ने एयर एंबुलेंस ऑपरेशंस में भी अपनी अहम भूमिका निभाई। मैं 5000 से अधिक घंटे इस एयरक्राफ्ट में फ्लाइंग कर चुका हूं और मेरे लिए यह गर्व की बात है कि इस तरह एयरक्राफ्ट की अलविदा उड़ान भी 25 साल पहले मैंने ही भरी थी।
- विंग कमांडर सतीश भाटिया, रिटायर्ड एयरफोर्स
यह एक बेमिसाल एयरक्राफ्ट था, जिसने सियाचिन ग्लेशियर, लेह लद्दाख और चीन बॉर्डर पर तैनात सेना के जवानों को पूरा बैकअप दिया। साथ ही इस एयरक्राफ्ट ने एयर एंबुलेंस ऑपरेशंस में भी अपनी अहम भूमिका निभाई। मैं 5000 से अधिक घंटे इस एयरक्राफ्ट में फ्लाइंग कर चुका हूं और मेरे लिए यह गर्व की बात है कि इस तरह एयरक्राफ्ट की अलविदा उड़ान भी 25 साल पहले मैंने ही भरी थी।
- विंग कमांडर सतीश भाटिया, रिटायर्ड एयरफोर्स