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संपत्ति मामले में मकान मालिकों के हक में हाईकोर्ट का अहम फैसला

Fri, 15 Apr 2016 10:48 AM IST
सुरजीत सिंह सत्ती/अमर उजाला, चंडीगढ़
सुरजीत सिंह सत्ती/अमर उजाला, चंडीगढ़ Updated Fri, 15 Apr 2016 10:48 AM IST
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important decision on property rights case of High Courtn in favour of  landlords
कोर्ट - फोटो : file photo

किराए और संपत्ति पर अवैध कब्जा जमाकर बैठे किराएदारों के मामले में मकान मालिकों के हक में हाईकोर्ट ने दिया अहम फैसला। दरअसल पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई किराएदार केस हारने के बावजूद संपत्ति पर कब्जा जमाए रखता है तो अवैध कब्जे की अवधि का मध्यवर्ती लाभ (मुआवजा) संपत्ति की मार्केट वेल्यू के हिसाब से निर्धारित हो। जस्टिस अजय तिवारी ने एक मामले का निपटारा करते हुए कहा है कि चूंकि संपत्ति की कीमतें और स्टांप ड्यूटी कम ज्यादा होती रहती हैं, ऐसे में मध्यवर्ती लाभ फिक्स नहीं किया जा सकता।

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हाईकोर्ट ने कहा है कि चूंकि रेंट कंट्रोल एक्ट में मुआवजा लाभ निर्धारण करने के बारे में स्थिति स्पष्ट नहीं है, ऐसे में अदालत के लिए मुआवजा तय करना भी चुनौती है। बेंच का मानना है कि संपत्ति मालिक मार्केट में किराए के हिसाब से मुआवजा और मांगता है, जबकि किराएदार रेंट एग्रिमेंट का हवाला देते हुए तय किराए से अधिक पैसा नहीं देने की बात कहता है।
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बेंच ने सुप्रीम कोर्ट और बांबे हाईकोर्ट के दो निर्णयों समेत कुछ अन्य फैसलों के आधार पर एक संपत्ति के मामले में फैसला सुनाया है कि किराएदार केस हार चुका है और हाईकोर्ट में निचली अदालत के फैसले को चुनौती दी है और वह मालिक की संपत्ति पर अवैध रूप से काबिज भी है। लिहाजा रेंट एग्रिमेंट में तय किराए के अलावा उसे संपत्ति के उच्चम मूल्य के हिसाब से प्रतिमाह मुआवजा देना होगा।

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important decision on property rights case of High Courtn in favour of  landlords
कोर्ट - फोटो : file photo

बेंच के सामने यह भी बड़ा सवाल था कि संपत्ति मालिक मुआवजे का हकदार जिला अदालत द्वारा फैसला सुनाने की तिथि से है या फिर हाईकोर्ट में अपील करने के बाद से। इस पर बेंच ने कहा है कि चूंकि जिला अदालत ने किराएदार को कानून बाहर कर दिया, ऐसे में वह अब गैर कानूनी तरीके से संपत्ति पर काबिज है, लिहाजा किरोदार को निर्देश दिया है कि वह जिला अदालत के फैसले के दिन के बाद से चले आ रहे अवैध कब्जे की अवधि का किराया और छह हजार रुपये मुआवजा जिला अदालत में जमा कराए। जिला अदालत इस राशि को एफडी या आरडी में रखे और अपील में जिसके हक में फैसला हो, राशि उसी को दी जाए।

घाटा संपत्ति मालिक को ही: बेंच ने अपने फैसले में कहा है कि एक बार जिला अदालत किराएदार को संपत्ति खाली करने का आदेश दे दे, तब से वह गैर कानूनी काबिजकार बन जाता है, लेकिन किराएदार मामले को लंबा लटकाने के लिए अपील करते हैं। ऐसे में नुकसान संपत्ति मालिक को ही होता है और अधिकांश मामलों में आखिर केस संपत्ति मालिक के हक में होते हैं, लिहाजा संपत्ति मालिक को ही नुकसान होता है। ऐसे में संपत्ति मालिक को मुआवजा देने से मना नहीं किया जा सकता।

यह है मामला: एक महिला ने नारनौल में दुकान किराए पर ली थी। वर्ष 2011 में वह केस हार गई। किराया पांच सौ रुपए था, जबकि दुकान मालिक ने कहा कि उसी मार्केट में ऐसी ही दुकान 14 हजार रुपए प्रतिमाह किराए पर चढ़ी है, लिहाजा उसे इसी हिसाब से मुआवजा दिया जाना चाहिए। उधर किराएदार का कहना था कि 14 हजार रुपए किराए वाली जिस दुकान की बात कही जा रही है, वह दुकान बड़ी है और अच्छी लोकेशन पर है। ऐसे में हाईकोर्ट ने संपत्ति की उच्चम वेल्यू के हिसाब से मुआवजा तय करते हुए पांच सौ रुपए प्रतिमाह किराए के अलावा छह हजार रुपए मुआवजा कोर्ट में जमा कराने का निर्देश दिया है।

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