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Chandigarh News: मेरा स्वास्थ्य मेरा अधिकार का सपना कैसे हो साकार... जब व्यवस्था ही बीमार

Sun, 07 Apr 2024 02:51 AM IST
Chandigarh Bureau चंडीगढ़ ब्यूरो
Updated Sun, 07 Apr 2024 02:51 AM IST
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How can my dream of health and rights come true... when the system itself is sick?
चंडीगढ़। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने विश्व स्वास्थ्य दिवस 2024 के थीम के रूप में मेरा स्वास्थ्य, मेरा अधिकार चुना है, जो मौलिक मानव अधिकार पर केंद्रित है। इसमें गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य देखभाल, शिक्षा और सूचना तक पहुंच को शामिल किया गया है। लेकिन अफसोस की बात यह है कि हम जिस शहर में रह रहे हैं उसकी स्वास्थ्य व्यवस्था खुद ही बीमार है। फिर यहां की जनता मेरा स्वास्थ्य मेरा अधिकार की बात कैसे कर सकती है। व्यवस्था और कमियों के बीच में सेहत का सपना पूरा होता नजर नहीं आ रहा। शहर के सरकारी अस्पतालों में न इलाज करने के लिए डॉक्टर उपलब्ध हैं, न दवा। इतना ही नहीं उपलब्ध उपकरण चलाने के लिए विशेषज्ञों की तलाश भी वर्षों से जारी है।
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डॉक्टरों की कमी से जूझ रहा विभाग

शहर के सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों की नियुक्ति 1997 के बाद नहीं हुई है। स्थिति यह है कि डेपुटेशन पर अलग अलग प्रदेशों से डॉक्टर को बुलाकर व्यवस्था संभालने का प्रयास किया जा रहा है। चिंता की बात यह है कि अब डेपुटेशन से भी व्यवस्था नहीं संभल रही। वही सरकारी व्यवस्था से दुखी डॉक्टर तैनाती के चांद महीने बाद ही नौकरी छोड़कर चले जा रहे हैं। इस कारण ज्यादातर सरकारी अस्पतालों की ओपीडी या तो खाली चल रही है या एक डॉक्टर को रोटेशन पर अलग-अलग अस्पतालों में भेज कर ओपीडी चलाई जा रही है।
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दवा के सारे दावे फेल

सरकारी अस्पताल में इलाज के लिए आने वाले मरीजों को सस्ती दवा का सपना दिखाने वाले अधिकारियों के सारे दावे फेल होते नजर आ रहे हैं। स्थित है कि सरकारी अस्पतालों में संचालित जन औषधि केंद्र पर दवाइयां उपलब्ध नहीं है। वही सरकारी अस्पतालों के फार्मेसी काउंटर से भी मरीज निराश होकर लौट रहे हैं। सर्दी जुकाम, बुखार, पेट दर्द, दर्द की दवा, एंटीबायोटिक, कैल्शियम और आयरन जैसी दवाइयां भी मरीज को निजी दवा की दुकानों से महंगे दर पर खरीदनी पड़ रही है।
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मशीनें तो हैं पर चलती नहीं

सरकारी अस्पतालों में मरीजों की सुविधा का हवाला देकर लगातार करोड़ों रुपए खर्च कर नई मशीनें तो खरीदी जा रही है, लेकिन उसे चलाने के लिए विशेषज्ञ उपलब्ध नहीं हैं। स्वास्थ्य विभाग के लिए अल्ट्रासाउंड मशीन इसका सबसे बेहतर उदाहरण है। स्थिति यह है कि विभाग के पास सिविल अस्पताल में अल्ट्रासाउंड मशीन तो वर्षों से उपलब्ध है, लेकिन उसे चलाने के लिए विभाग रेडियोलॉजिस्ट की व्यवस्था पिछले तीन वर्षों से नहीं कर पाया है। इस कारण अस्पतालों में आने वाले मरीजों को निजी केंद्रों में अल्ट्रासाउंड के लिए पैसे खर्च करने पड़ रहे हैं। इतना ही नहीं जहां पर जांच की सुविधा उपलब्ध है वहां पर वेटिंग इतनी लंबी है कि मरीज स्थिति गंभीर होने के दर से सरकारी के बजाय निजी सेंटर में जांच करना बेहतर समझ रहा है।
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हमारा दुर्भाग्य...स्वास्थ्य सेवाएं जनता की पहुंच से काफी दूर
इस वर्ष बात हो रही है सेहत के अधिकार की, लेकिन ये हमारा दुर्भाग्य ही है जो शहर में स्वास्थ्य सेवाएं जनता की पहुंच से काफी दूर है। प्रशासन को इस ओर गंभीरता से सोचने की जरूरत है।

-मंगल पाण्डेय, सेक्टर-51

अधिकार तो छोड़िए जरूरत के अनुसार स्वास्थ्य सेवा नहीं उपलब्ध
सरकारी व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी है। अधिकार तो छोड़िए जरूरत के अनुसार भी स्वास्थ्य सेवा उपलब्ध नहीं है। अगर यही हाल रहा तो आने वाले कुछ ही वर्षों में डब्ल्यूएचओ के निर्देश और मानकों का कोई प्रभाव नहीं होगा।
-शिवम कुमार, हल्लोमाजरा
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