{"_id":"584c4ca34f1c1bb35b447c7c","slug":"historians-claim-kurukshetra-is-not-the-real-center-of-the-mahabharata","type":"feature-story","status":"publish","title_hn":"इतिहासकारों का दावा, कुरुक्षेत्र नही कैथल है महाभारत का असली केंद्र","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
इतिहासकारों का दावा, कुरुक्षेत्र नही कैथल है महाभारत का असली केंद्र
नसीब सैनी/अमर उजाला, कैथल
Updated Sun, 11 Dec 2016 12:12 AM IST
विज्ञापन
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय
- फोटो : file photo
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
कुरुक्षेत्र को महाभारत का युद्ध स्थल माना जाता है, लेकिन इतिहासकारों का दावा है कि महाभारत का असली केंद्र कैथल था। इस दावे के पीछे तर्क है कि युद्धस्थल की 48 कोस की परिधि में सबसे ज्यादा इलाका कैथल जिले का आता है। महाभारत की 48 कोस की परिधि पांच जिलों में फैली है। इस युद्धस्थली के 160 मील के एरिया में 134 तीर्थ हैं। अकेले कैथल जिले में 50 तीर्थ हैं, जो महाभारत कालीन हैं। हालांकि देखभाल एवं सरंक्षण के अभाव में ये तीर्थ स्थल अपना अस्तित्व खोते जा रहे हैं। कई तीर्थों के तालाब कब्जों की जद में आ चुके हैं।
कुरुक्षेत्र, कैथल, करनाल, जींद व पानीपत जिलों की 160 मील के इलाके में कुरु भूमि का एरिया आता है। युद्ध के समय स्थापित किए गए चार यक्ष तीर्थ आज भी विद्यमान हैं। इनमें कैथल में अरंतुक यक्ष गांव बहर पिसौल, कुरुक्षेत्र के रतगल गांव में तरंतुक यक्ष, जींद के रामराय गांव में रामहृदय यक्ष एवं पानीपत के सींख गांव में मचक्रुक यक्ष तीर्थ हैं। इनमें कैथल जिले का सबसे ज्यादा इलाका 48 कोस की परिधि में आता है। 134 तीर्थों में से 50 तीर्थ कैथल में स्थित हैं। इनमें से अधिकतर तीर्थों की आज भी पहचान हैं एवं वहां विधिवत पूजा-अर्चना भी होती है। लेकिन कई तीर्थों के तालाब पर कब्जे हो चुके हैं।
क्या कहते हैं इतिहासकार
इतिहासकार कमलेश शर्मा बताते हैं कि 48 कोस की परिधि में वर्तमान कैथल जिले का सबसे ज्यादा एरिया आता है। गांव सेरहधा युद्ध स्थली का केंद्र बिंदू था। यहीं से बबरुभान ने कटे हुए सिर के साथ महाभारत का युद्ध देखा था। सिर धरा से गांव का नाम सेरहधा पड़ा। इसी प्रकार मानस गांव का नाम भी मानुष तीर्थ है। कई और ऐसे तीर्थ हैं, जिनकी पहचान ही महाभारत की घटनाओं एवं पात्रों के नाम से होती है।
विज्ञापन
विज्ञापन
कुरुक्षेत्र, कैथल, करनाल, जींद व पानीपत जिलों की 160 मील के इलाके में कुरु भूमि का एरिया आता है। युद्ध के समय स्थापित किए गए चार यक्ष तीर्थ आज भी विद्यमान हैं। इनमें कैथल में अरंतुक यक्ष गांव बहर पिसौल, कुरुक्षेत्र के रतगल गांव में तरंतुक यक्ष, जींद के रामराय गांव में रामहृदय यक्ष एवं पानीपत के सींख गांव में मचक्रुक यक्ष तीर्थ हैं। इनमें कैथल जिले का सबसे ज्यादा इलाका 48 कोस की परिधि में आता है। 134 तीर्थों में से 50 तीर्थ कैथल में स्थित हैं। इनमें से अधिकतर तीर्थों की आज भी पहचान हैं एवं वहां विधिवत पूजा-अर्चना भी होती है। लेकिन कई तीर्थों के तालाब पर कब्जे हो चुके हैं।
विज्ञापन
क्या कहते हैं इतिहासकार
इतिहासकार कमलेश शर्मा बताते हैं कि 48 कोस की परिधि में वर्तमान कैथल जिले का सबसे ज्यादा एरिया आता है। गांव सेरहधा युद्ध स्थली का केंद्र बिंदू था। यहीं से बबरुभान ने कटे हुए सिर के साथ महाभारत का युद्ध देखा था। सिर धरा से गांव का नाम सेरहधा पड़ा। इसी प्रकार मानस गांव का नाम भी मानुष तीर्थ है। कई और ऐसे तीर्थ हैं, जिनकी पहचान ही महाभारत की घटनाओं एवं पात्रों के नाम से होती है।
विज्ञापन
कैथल में ये हैं प्रमुख तीर्थ
कैथ्ाल
- फोटो : File Photo
कैथल में ये हैं प्रमुख तीर्थ
भगवान श्रीकृष्ण द्वारा स्थापित नवग्रह कुंड, ऐतिहासिक श्री ग्यारह रुद्री शिव मंदिर के अलावा कई भव्य एवं ऐतिहासिक तीर्थ स्थल हैं, जिनका जिक्र कई पुराणों में आता है।
उपेक्षा के शिकार तीर्थ
गीता जयंती हो या फिर कोई अन्य कार्यक्रम, सरकारों ने अभी तक कुरुक्षेत्र में ही ज्यादा ध्यान दिया है। सरकार द्वारा गठित श्रीकृष्णा सर्किट के तहत कैथल में आने वाले सभी तीर्थों के जीर्णोद्धार का फैसला लिया जाए और इन तीर्थों को आपस में जोड़ दिया जाए तो पर्यटन की दृष्टि से कैथल जिला कुरुक्षेत्र की तर्ज पर विश्व मानचित्र पर आ सकता है।
48 कोस की परिधि का कण-कण ऐतिहासिक है। इस मिट्टी में जगह-जगह महाभारत से जुड़ी स्मृतियां हैं। सरकार ने कई तीर्थों का जीर्णोद्धार किया है। सभी तीर्थों के रखरखाव की ओर ध्यान दिया जाएगा। -कैप्टन शक्ति सिंह, एडीसी, कैथल
भगवान श्रीकृष्ण द्वारा स्थापित नवग्रह कुंड, ऐतिहासिक श्री ग्यारह रुद्री शिव मंदिर के अलावा कई भव्य एवं ऐतिहासिक तीर्थ स्थल हैं, जिनका जिक्र कई पुराणों में आता है।
उपेक्षा के शिकार तीर्थ
गीता जयंती हो या फिर कोई अन्य कार्यक्रम, सरकारों ने अभी तक कुरुक्षेत्र में ही ज्यादा ध्यान दिया है। सरकार द्वारा गठित श्रीकृष्णा सर्किट के तहत कैथल में आने वाले सभी तीर्थों के जीर्णोद्धार का फैसला लिया जाए और इन तीर्थों को आपस में जोड़ दिया जाए तो पर्यटन की दृष्टि से कैथल जिला कुरुक्षेत्र की तर्ज पर विश्व मानचित्र पर आ सकता है।
48 कोस की परिधि का कण-कण ऐतिहासिक है। इस मिट्टी में जगह-जगह महाभारत से जुड़ी स्मृतियां हैं। सरकार ने कई तीर्थों का जीर्णोद्धार किया है। सभी तीर्थों के रखरखाव की ओर ध्यान दिया जाएगा। -कैप्टन शक्ति सिंह, एडीसी, कैथल
कैथल में स्थित प्रमुख तीर्थ
गीता जयंती में क्राफ्ट मेला
- फोटो : अमर उजाला
कैथल में स्थित प्रमुख तीर्थ
गांव बहर पिसौल में अरंतुक यक्ष
कसान में श्री तीर्थ
कलायत में कपिलमुनि तीर्थ
सजूमा सूर्यवत तीर्थ
गुहणा में गोभवन
सांघण में शंखिनी तीर्थ
प्रभोत ब्रह्म तीर्थ
सिल्ला खेड़ा ब्रह्मोदूंबर
कैथल वृद्धकेदार
शेरगढ़ में परिसरक
फरल फल्गू
क्योड़क कोटिकूट तीर्थ
भानपुरा कुंज तीर्थ
गोहरा खेड़ी गंधर्व
रसीना ऋणमोचन
पवनहद पबनावा
कैथल नवग्रह कुंड
कैथल श्री ग्यारह रुद्री शिव मंदिर
गांव बहर पिसौल में अरंतुक यक्ष
कसान में श्री तीर्थ
कलायत में कपिलमुनि तीर्थ
सजूमा सूर्यवत तीर्थ
गुहणा में गोभवन
सांघण में शंखिनी तीर्थ
प्रभोत ब्रह्म तीर्थ
सिल्ला खेड़ा ब्रह्मोदूंबर
कैथल वृद्धकेदार
शेरगढ़ में परिसरक
फरल फल्गू
क्योड़क कोटिकूट तीर्थ
भानपुरा कुंज तीर्थ
गोहरा खेड़ी गंधर्व
रसीना ऋणमोचन
पवनहद पबनावा
कैथल नवग्रह कुंड
कैथल श्री ग्यारह रुद्री शिव मंदिर