हिंदी दिवस: विदेशियों के मन में है हिंदी के प्रति प्रेम अगाध, भारत से चुनते हैं बहू और दामाद
विदेशों में हिंदी सीखने वालों की तादाद लगातार बढ़ रही है। माना जाता है कि विदेशी धरती पर चल रहे विश्वविद्यालयों में भाषा सीखने वाले विद्यार्थियों की संख्या एक से लेकर पांच तक पहुंच गई तो समझो उस कोर्स का मकसद पूरा हो गया, लेकिन हिंदी सीखने वालों की संख्या 50 तक पहुंच रही है।
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हिंदी देश की बिंदी है। यह बिंदी विदेशी धरा पर भी देश का मान बढ़ा रही है। विदेशों में वहां की सरकारें, शिक्षण संस्थान इस भाषा को आगे बढ़ाने के लिए कदम उठा रहे हैं। पुर्तगाल सहित कई देश ऐसे हैं जिनका हिंदी के प्रति अगाध प्रेम हैं। ये भारत से बहू-दामाद चुनने में प्रमुखता देते हैं। विदेशों में हिंदी सीखने वालों की तादाद लगातार बढ़ रही है। माना जाता है कि विदेशी धरती पर चल रहे विश्वविद्यालयों में भाषा सीखने वाले विद्यार्थियों की संख्या एक से लेकर पांच तक पहुंच गई तो समझो उस कोर्स का मकसद पूरा हो गया, लेकिन हिंदी सीखने वालों की संख्या 50 तक पहुंच रही है। इस संबंध में अमर उजाला ने हिंदी के जानकारों से बातचीत की।
हिंदी पढ़कर युवा अनुवाद के क्षेत्र में बिखेर रहे चमक
यहां हिंदी की स्थिति बहुत अच्छी है। स्थानीय युवा हिंदी पढ़कर अनुवाद के क्षेत्र में चमक रहे हैं। संस्थाएं भी अनुवाद के लिए तेजी से आगे आ रही हैं। मेरे विश्वविद्यालय में 20 से अधिक हिंदी के छात्र हैं। इस बार संख्या बढ़ने की संभावनाएं हैं। हिंदी के विकास में यहां के दूतावास की अहम भूमिका है। माह में दो से चार कार्यक्रम हिंदी के विकास को लेकर करवाए जा रहे हैं। -प्रो. आनंद वर्धन शर्मा, विजिटिंग प्रोफेसर, भारत विद्या विभाग, सोफिया विश्वविद्यालय, बुल्गारिया
बॉलीवुड, शास्त्रीय संगीत का कमाल... हिंदी के प्रति बढ़ा लगाव
यहां हिंदी वर्ष 2009 से पढ़ाई जा रही है। हर साल 25 से अधिक विद्यार्थी दाखिला लेते हैं। यहां से पढ़ाई के बाद छात्र आगरा स्थित केंद्रीय हिंदी संस्थान में पढ़ाई के लिए जा रहे हैं। बॉलीवुड, शास्त्रीय संगीत, भारतीय आर्थिक शक्ति जैसे कारणों की वजह से लोगों में हिंदी के प्रति लगाव बढ़ा है। यहां तमाम लोग भारत में रिश्ता जोड़ते हैं। यहां के पीएम भी भारतवंशी हैं। हिंदी के प्रति उनका प्रेम अपार है। यहां तमाम लोग मुंबई आदि शहरों से जुड़े हैं जो वहां से बहू व दामाद चुनते हैं। -प्रो. शिव कुमार सिंह, अध्यक्ष, भारतीय अध्ययन केंद्र, कला संकाय, लिस्बन विश्वविद्यालय, पुर्तगाल
हिंदी से मिला तीसरा बाजार
विदेश में कई कारणों से हिंदी आगे बढ़ी है। एक तो मॉरीशस, फिजी, सूरीनाम, त्रिनिदाद जैसी जगहों पर भारतीय मूल के लोग आपको मिलेंगे, जिन्हें हिंदी से प्यार है। फिर अमेरिका, कनाडा अनेक देशों में प्रवासी भारतीयों के साथ हिंदी पहुंची है और तीसरे बाजार की जरूरत के कारण विदेशी मूल के लोग भी इसकी ओर आकर्षित हुए, लेकिन असल सलाम विदेश में उन लोगों को है, जो भारतीय संस्कृति और सभ्यता को समझने के लिए हिंदी से जुड़ते हैं। -डॉ. गुरमीत सिंह, एसोसिएट प्रोफेसर, हिंदी विभाग पीयू
खुशी की बात.. विदेशों में भी हिंदी में लिखे जा रहे होटल के नाम
मैंने कई देशों की यात्रा की। लोगों से हिंदी में बात भी की, लेकिन उन लोगों में हिंदी के प्रति प्रेम दिखा जो हिंदुस्तान से संबंध रखते हैं या उनके रिश्तेदार यहां रहते हैं। विदेशों में कई होटल, दुकानों पर हिंदी में लिखे संदेश भी मिले। एयरपोर्ट भी कुछ जगह हिंदी में साइन बोर्ड दिखे। इससे खुशी हो रही थी कि हिंदी विदेशों में भी आगे बढ़ रही है। -प्रो. प्रशांत गौतम, खेल निदेशक पीयू