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Highcourt: वर्षों से काम कर रहे कर्मियों को मिले नियमित दर्जा, बठिंडा निगम को छह हफ्ते में नियमितीकरण के आदेश

Wed, 15 Apr 2026 08:33 AM IST
Nivedita न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़ Published by: Nivedita Updated Wed, 15 Apr 2026 08:33 AM IST
सार

कोर्ट ने कहा कि आउटसोर्सिंग एजेंसियां केवल माध्यम हैं और इन्हें वास्तविक रोजगार संबंधों को छिपाने के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कान्ट्रैक्चुअल व्यवस्था के पर्दे को हटाने की जरूरत पर बल देते हुए कहा कि वास्तविक स्थिति को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

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High Court says Employees working for years must be granted regular status Bathinda Corporation
पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

आउटसोर्सिंग व्यवस्था के जरिये वर्षों से काम कर रहे कर्मचारियों को बड़ी राहत देते हुए पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि केवल कागजी अनुबंधों के सहारे कर्मचारियों को उनके वैधानिक अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता। 
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अदालत ने कहा कि यदि कोई कर्मचारी लंबे समय से किसी सरकारी संस्था के नियंत्रण और निगरानी में कार्य कर रहा है तो उसे वास्तविक रूप से उसी संस्था का कर्मचारी माना जाएगा।
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यह अहम फैसला जस्टिस हरप्रीत सिंह बराड़ की एकल पीठ ने सुनाया जिसमें तीन याचिकाओं का एक साथ निपटारा किया गया। अदालत ने बठिंडा नगर निगम को निर्देश दिया कि याचिकाकर्ताओं की सेवाएं छह सप्ताह के भीतर नियमित की जाएं अन्यथा उन्हें स्वत: नियमित माना जाएगा।
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मामले में एक क्लर्क-कम-डाटा एंट्री ऑपरेटर का उदाहरण प्रमुख रूप से सामने आया जो वर्ष 2010 से लगातार कार्यरत था। हालांकि बीच-बीच में आउटसोर्सिंग एजेंसियां बदलती रहीं लेकिन कर्मचारी का वास्तविक कार्य, नियंत्रण और पर्यवेक्षण नगर निगम के अधीन ही रहा। अदालत ने इसे निर्णायक आधार मानते हुए कहा कि असली नियोक्ता वही है जो काम के निष्पादन पर नियंत्रण रखता है।

कोर्ट ने कहा कि आउटसोर्सिंग एजेंसियां केवल माध्यम हैं और इन्हें वास्तविक रोजगार संबंधों को छिपाने के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कान्ट्रैक्चुअल व्यवस्था के पर्दे को हटाने की जरूरत पर बल देते हुए कहा कि वास्तविक स्थिति को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

अदालत ने संबंधित कानूनों का हवाला देते हुए कहा कि जिन कर्मचारियों ने वर्ष 2016 से पहले तीन वर्ष की निरंतर सेवा पूरी कर ली थी, उन्हें संविदात्मक दर्जा मिलना उनका अधिकार है। इसी आधार पर याचिकाकर्ता को 24 दिसंबर 2016 से संविदा कर्मचारी मानने का निर्देश दिया गया।


फैसले में राज्य सरकारों की उस प्रवृत्ति पर भी कड़ी टिप्पणी की गई जिसमें स्थायी कार्य के बावजूद कर्मचारियों को अस्थायी या आउटसोर्स आधार पर रखा जाता है। अदालत ने इसे संविधान के अनुच्छेद 14, 16 और 21 का उल्लंघन करार देते हुए कहा कि राज्य वित्तीय तंगी का हवाला देकर कर्मचारियों के अधिकारों से मुंह नहीं मोड़ सकता। लंबे समय तक कार्य करने वाले कर्मचारी अनुभव और दक्षता अर्जित कर लेते हैं जिससे उनके नियमितीकरण का दावा और मजबूत हो जाता है।
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