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हाईकोर्ट का फैसला: सक्षम पत्नी का गुजारा भत्ता दावा कानून का दुरुपयोग, घर पर बैठने की अनुमति नहीं दे सकते

Fri, 04 Oct 2024 10:24 AM IST
निवेदिता वर्मा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़ Published by: निवेदिता वर्मा Updated Fri, 04 Oct 2024 10:24 AM IST
सार

जींद निवासी महिला ने हाईकोर्ट में पारिवारिक न्यायालय के आदेश के खिलाफ याचिका दायर की थी। हाईकोर्ट ने कहा कि महिला का पति फैक्टरी में काम करता है और काफी कम कमाता है। उस पर बच्चों की भी जिम्मेदारी है। महिला अपना भरण पोषण खुद कर सकती है।

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High Court says capable wives cannot allowed to sit idle at home by misusing provision of maintenance
पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने अहम फैसला सुनाते हुए यह स्पष्ट कर दिया कि सीआरपीसी की धारा 125 के तहत भरण-पोषण के प्रावधान का दुरुपयोग कर सक्षम पत्नियों को घर पर बेकार बैठने की अनुमति नहीं दी जा सकती। पत्नी ने उस आदेश को चुनौती दी थी जिसके तहत उसका दावा खारिज करते हुए पारिवारिक न्यायालय ने कहा था कि वह अंतिम या अंतरिम गुजारा भत्ता की हकदार नहीं है।
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पत्नी के वकील ने दलील दी कि वह एक साधारण ग्रामीण है और उसका पति एक फैक्ट्री में राजमिस्त्री का काम करता है और 12,000 रुपये प्रति माह कमाता है।

हाईकोर्ट में याचिका दाखिल करते हुए जींद निवासी पत्नी के वकील ने यह दलील दी कि याचिकाकर्ता के वैवाहिक जीवन के दौरान उसे पति और ससुराल वाले बेरहमी से पीटते थे। 2015 में आईपीसी की धारा 498-ए, 406, 323 और 506 के तहत उनके खिलाफ एक एफआईआर भी दर्ज की गई थी। 
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याची ने बताया कि पारिवारिक न्यायालय ने दावा इस आधार पर खारिज कर दिया था कि याची पहले बच्चे के जन्म की तारीख, समय और जन्मस्थान का विवरण देने में असमर्थ थी। साथ ही अदालत ने गलत निष्कर्ष निकाला था कि पत्नी 6-7 हजार रुपये प्रति माह कमाती है। हाईकोर्ट ने अपील पर फैसला सुनाते हुए कहा कि आईपीसी की धारा 125 का उद्देश्य पीड़ित पत्नियों जो अपना भरण-पोषण करने में असमर्थ हैं, उन्हें अभाव से बचाना है। जब पति काम करता है, अपने और अपने परिवार की विभिन्न जरूरतों को पूरा करने के लिए मेहनत करता है तब प्रावधान का दुरुपयोग कर सक्षम पत्नियों को घर पर बेकार बैठने की अनुमति नहीं दी जा सकती। 
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हाईकोर्ट ने कहा कि साक्ष्यों के आधार पर पारिवारिक न्यायालय इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि पत्नी ने वर्ष 2014 में बिना किसी पर्याप्त कारण के वैवाहिक घर को त्याग दिया। विवाह से दो बच्चे पैदा हुए हैं, जो पति की देखभाल और अभिरक्षा में हैं। हाईाकेर्ट ने हैरानी जताते हुए कहा कि जब याची ने घर छोड़ा तो बच्चे उस समय 1 से तीन वर्ष की आयु के थे बावजूद इसके पत्नी ने अपने नाबालिग बच्चों की अभिरक्षा के लिए कोई आवेदन दायर नहीं किया है। पति एक फैक्टरी में नौकरी कर रहा है और उसे मात्र 6-7 हजार रुपये प्रतिमाह मिलते हैं। वह अपनी मां के साथ ही नाबालिग बच्चों का भी भरण-पोषण कर रहा है। दूसरी ओर पत्नी पर ऐसी कोई जिम्मेदारी नहीं है और वह अपने माता-पिता के घर में आराम से रह रही है। पत्नी का सबसे पहला और सबसे महत्वपूर्ण कर्तव्य है कि वह अपना भरण-पोषण करे, क्योंकि वह सक्षम है।
 
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