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ली कार्बूजिए ने खाली जमीन को सिटी ब्यूटीफुल बनाया, योजनाएं ऐसी बनाएं, 50 साल तक सुंदर रहे

Fri, 29 Nov 2019 11:43 AM IST
पंचकुला ब्‍यूरो न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़ Published by: पंचकुला ब्‍यूरो Updated Fri, 29 Nov 2019 11:43 AM IST
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Punjab Haryana High Court Orders to Plan for Maintainance of City Beautiful Chandigarh
सिटी ब्यूटीफुल - फोटो : अमर उजाला
बदहाल सरकारी मकानों को लेकर लंबित याचिका पर सुनवाई के के दौरान हाईकोर्ट ने कहा कि जवाहरलाल नेहरू और ली कार्बूजिए ने कभी खाली जमीन पर स्मार्ट शहर को बसाने का सपना देखा था। अब हम सिटी ब्यूटीफुल में है यह ऐसा ही बना रहे इसके लिए आने वाले 50 साल को ध्यान में रख प्रशासन को योजना बनानी चाहिए।
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हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि शहर में जमीन की कमी है ऐसे में सिंगल और डबल स्टोरी सरकारी मकानों को चरणबद्ध तरीके से गिराकर उस पर मल्टी स्टोरी बिल्डिंग बनाने की दिशा में काम करना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि सेक्टर 22 के सिंगल स्टोरी सरकारी मकानों को गिरा वहां ऐसा करने की सलाह दो साल पहले दी गई थी लेकिन कोई एक्शन नहीं लिया गया।
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हाईकोर्ट ने अब चंडीगढ़ के सीनियर स्टैंडिंग काउंसिल पंकज जैन को निर्देश दिए हैं कि केस में समय-समय पर जारी दिशा निर्देशों के बारे में वह चंडीगढ़ के प्रशासक से बात करें और इस दौरान चीफ इंजिनियर भी मौजूद हों और सुझावों पर गौर किया जाए।
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चीफ इंजीनियर ने कोर्ट में समस्या बताते हुए कहा था कि अक्सर देरी इसलिए होती है कि अलॉटी अपने पसंद का रंग करवाने की जिद करते हैं। इसपर हाईकोर्ट ने कहा कि शहर के सभी सरकारी मकानों में एकरूपता होनी चाहिए। किसी को भी अपनी मर्जी से कोई भी रंग करने की इजाजत नहीं दी जाए। ऐसे तो हर कोई मनमर्जी करेगा और शहर के सरकारी मकानों की एकरूपता नष्ट हो जाएगी।

बिना मुरम्मत किए कोई भी मकान नहीं किया जाए अलॉट
हाईकोर्ट ने कहा कि वह लगातार आदेश दे रहे हैं की शहर के किसी भी खाली पड़े सरकारी मकान को बिना मुरम्मत के आगे किसी को अलॉट न किया जाए लेकिन इस आदेश के बावजूद भी उनके पास लगातार इसकी शिकायतें आ रहे ही जहां बदहाल पड़े सरकारी मकान भी अलॉट कर दिए गए और फिर अलॉटियों ने इसकी शिकायत की है। हाई कोर्ट ने अब कड़े लहजे में इसके आदेश दे दिए हैं।

जादू की छड़ी नहीं यह मालूम है पर योजना बनाकर काम करे तो शहर बन सकता है स्टेट ऑफ आर्ट हाईकोर्ट ने कहा कि हमें पता है कि प्रशासन के पास कोई जादू की छड़ी नहीं है जो एक झटके में सब कुछ कर दें। लेकिन यदि प्रशासन यह सब चरणबद्घ तरीके से योजनाबद्घ होकर करे तो आने वाले 50 साल में भी शहर ऐसा ही सुंदर रहेगा। इमारतों का प्रबंधन सही प्रकार से कर कम स्थान में ज्यादा लोगों के रहने की व्यवस्था की जा सकेगी।

ये हैं चुनौतियां

बढ़ते वेंडर्स पर लगाम जरूरी
शहर के बाजारों में फड़ियां बढ़ गई हैं। वेंडर एक्ट के नाम पर अतिक्रमण बढ़ा है। बाजारों में पैदल चलने की जगह कम हो गई है। यहां तक कि सिटी का हार्ट के जाने वाले सेक्टर-17 का प्लाजा भी अब फड़ी बाजार में बदल गया है। इससे इसका पुराना स्वरूप बिगड़ रहा है।

जाम से निपटना सबसे बड़ी चुनौती
वर्तमान में शहर की सड़कों पर 10 लाख के करीब वाहन दौड़ रहे हैं, लेकिन जाम से निपटने का प्रशासन के पास कोई ठोस प्लान नहीं है। चंडीगढ़ के अलावा पंजाब और हरियाणा से रोजाना लाखों कारें शहर में प्रवेश करती हैं। सुबह और शाम को पीक आवर्स में शहर की प्रमुख सड़कों पर वाहनों की लंबी कतारें लग जाती हैं। बारिश के समय में यह स्थिति और भी गंभीर बन जाती है।

वेस्ट मैनेजमेंट की व्यवस्था अभी भी खराब
प्रतिदिन शहर से निकलने वाला 450 टन का कचरा चंडीगढ़ के लिए मुश्किल का सबब बनता जा रहा है। जो गारबेज प्लांट है, वह पूरा कचरा प्रोसेस नहीं कर पा रहा है। डंपिंग ग्राउंड से डड्डूमाजरा में बीमारियां फैल रही हैं। डंपिंग ग्राउंड को यहां से शिफ्ट करना एक बड़ी चुनौती है। हालांकि नगर निगम की तरफ से इस डंपिंग ग्राउंड को शिफ्ट करने के लिए टेंडर अलॉट कर दिया गया है। बावजूद इसके शहर के कचरे का निपटारा कैसे होगा इसको लेकर कोई प्लानिंग नहीं है।

गर्मियों में पानी की किल्लत
गर्मी में शहर भर में पानी की भारी किल्लत हो जाती है। पानी की मांग 116 एमजीडी पहुंच जाती है। शहर में लगे 265 ट्यूबवेलों में से 22 एमजीडी पानी ही मिल पाता है। गर्मी में पानी की कमी हो जाती है, जो कि हर साल लोगों को सहन करनी पड़ती है। हालांकि काजौली वाटर वर्क्स के पांचवें और छठे फेज से पानी आने के बाद इससे थोड़ी राहत जरूर मिली है।

पार्किंग की दिक्कत बरकरार
शहर के हर बाजार और रिहायशी इलाके में पार्किंग की दिक्कत है। नगर निगम शहर की कई पार्किंग को फिर से पेड करने जा रहा है। पार्किंग के पेड होने के बाद लोग स्लिप रोड, सड़क किनारे और फुटपाथ पर गाड़ियां पार्क करने लगते हैं। कम्युनिटी पार्किंग बनाने के लिए नगर निगम को प्रशासन मंजूरी नहीं दे रहा है। इसके अलावा आज तक चंडीगढ़ प्रशासन पार्किंग पॉलिसी को नोटिफाई नहीं कर पाया है।

बच्चों के लिए खेलने का पार्क नहीं
शहर में 1800 छोटे-बड़े पार्क हैं, लेकिन कोई भी मैदान ऐसा नहीं है, जहां पर बच्चे क्रिकेट और आउटडोर गेम्स खेल सकें। खेल के मैदान न होने के कारण बच्चे घर तक ही सीमित हो गए हैं। अभिभावक अपने बच्चों के लिए लंबे समय से खेल के मैदान की मांग कर रहे हैं, लेकिन आज तक चंडीगढ़ प्रशासन और नगर निगम की तरफ से खेल के मैदान को लेकर कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है।

सीवरेज की समस्या भी अहम
भविष्य में चंडीगढ़ के लिए सीवरेज की समस्या काफी गंभीर होने वाली है, लेकिन अभी तक प्रशासन और नगर निगम ने इस पर ध्यान नहीं दिया है। चंडीगढ़ की स्थापना के समय शहर की अंडरग्राउंड सीवरेज पाइप लाइन उस वक्त की जनसंख्या के हिसाब से बिछाई गई थी, लेकिन अब शहर की जनसंख्या में काफी बढ़ोतरी हुई है। अंडरग्राउंड सीवरेज और पानी की पाइप लाइंस 60 साल पुरानी हो गई हैं। इनकी हालत भी खराब है। इस ओर भी कोई ध्यान नहीं दे रहा।

जगह-जगह कूड़े के ढेर बिगाड़ रहे सूरत
शहर में 30,000 रोड गलियां हैं। नगर निगम हर साल करोड़ों रुपये सफाई पर खर्च करता है। इसके बावजूद मानसून में जलभराव की स्थिति बन जाती है। एक घंटे में 25 मिमी बारिश ही ड्रेनेज सिस्टम झेल सकता है, लेकिन इससे ज्यादा बारिश होने पर रोड गलियां ब्लॉक हो जाती हैं। शहर में साफ-सफाई नाममात्र है। जगह-जगह कूड़े के ढेर हैं, जिससे शहर की सूरत बिगड़ गई है। स्वच्छता रैंकिंग में भी चंडीगढ़ 20वें नंबर पर है। इस साल भी स्वच्छता रैंकिंग में सुधार की उम्मीद कम ही जताई जा रही है।

रोजाना मासूमों को नोंच रहे कुत्ते
शहर में हर निवासी लावारिस कुत्तों से परेशान है। हर दिन डॉग बाइट के केस सामने आ रहे हैं। पिछले वर्ष सेक्टर-18 में कुत्तों ने पार्क में खेल रहे एक बच्चे को नोच-नोच कर मार डाला था। दिखावे के लिए नगर निगम और प्रशासन कुत्तों की संख्या को कंट्रोल करने के लिए नसबंदी करते हैं। बीते कुछ महीने पहले कुत्तों की समस्या पर नगर निगम की तरफ से एक इंटरनेशनल सेमिनार भी कराया गया था। बावजूद इसके कुत्तों की संख्या लगातार बढ़ रही है और कुत्तों के काटने के मामलों में भी बढ़ोतरी हो रही है।
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