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Haryana Elections : हार के पंजे से भाजपा ने छीनी जीत... हाशिए पर क्षेत्रीय नेता, इसलिए डूबी कांग्रेस की लुटिया

Thu, 10 Oct 2024 06:03 AM IST
दुष्यंत शर्मा अमर उजाला नेटवर्क, चंडीगढ़
अमर उजाला नेटवर्क, चंडीगढ़ Published by: दुष्यंत शर्मा Updated Thu, 10 Oct 2024 06:03 AM IST
सार

चुनाव के दौरान किए गए लोकनीति-सीएसडीएस सर्वेक्षण के अनुसार, कांग्रेस के अति आत्मविश्वास के अलावा इन प्रमुख कारणों ने भी उसकी हार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई...

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Haryana Elections: BJP snatches victory from the claws of defeat... Regional players marginalized
हरियाणा विधानसभा चुनाव - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

राज्य विधानसभा चुनावों में अक्सर दो प्रतिद्वंद्वियों के बीच सीधा मुकाबला देखने को मिलता है। नतीजे अक्सर एक पार्टी की हार और उसके मुख्य प्रतिद्वंद्वी की जीत के इर्द-गिर्द केंद्रित होते हैं। हरियाणा चुनाव इसका ताजा उदाहरण है। दस साल से सत्ता में काबिज भाजपा का मुकाबला पहले की तुलना में ताकतवर और ऊर्जा से लबरेज कांग्रेस से था। मुकाबला बराबरी का था, पर अति आत्मविश्वास कांग्रेस को ले डूबा। वहीं, खामोशी से जमीन पर काम करने वाली भाजपा सत्ता कायम रखने में कामयाब रही। स्पष्ट रूप से हरियाणा में द्विपक्षीय मुकाबला हुआ। इस चुनाव में क्षेत्रीय खिलाड़ी राजनीतिक हाशिये पर चले गए। 

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सरकार के कामकाज के प्रति संतुष्टि बनी सत्ता में वापसी में मददगार 
मौजूदा सरकार के प्रति संतुष्टि के भाव ने भाजपा को सत्ता में फिर से वापसी में मदद की। सर्वे में दस में से छह मतदाताओं ने भाजपा सरकार के प्रदर्शन से संतुष्टि जताई। चार ने असंतुष्टि जाहिर की। संतुष्टि दर 20 फीसदी अंक थी। सरकार से पूरी तरह संतुष्ट लोगों में से तीन चौथाई ने भाजपा को वोट दिया, जबकि पूरी तरह असंतुष्ट लोगों में से तीन चौथाई ने कांग्रेस को वोट दिया। जो लोग समर्थन या असंतोष में कम स्पष्ट थे, वे दोनों पार्टियों के बीच समान रूप से विभाजित हुए। दिलचस्प बात यह रही कि भाजपा और कांग्रेस दोनों ने स्थानीय मुद्दों पर ध्यान केंद्रित किया। दोनों पार्टियों के बीच वोट शेयर का अंतर एक फीसदी से भी कम था। इसी वजह से भाजपा उम्मीदवारों की जीत का कम अंतर, जबकि कांग्रेस उम्मीदवारों की जीत का अंतर अधिक रहा। 
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पार्टी से जुड़ाव और नेतृत्व की रही अहम भूमिका
सर्वे में दूसरा अहम कारक मतदाताओं का पार्टी से जुड़ाव का रहा यानी तय था कि किसे समर्थन करना है, किसे नहीं। दस में छह से अधिक मतदाताओं ने कहा कि उनका मतदान पार्टी से जुड़ाव तय करता है। साथ ही दलों के नेतृत्व ने भी अहम भूमिका निभाई। सबसे पसंदीदा सीएम उम्मीदवार दोनों पार्टियों के प्रमुख चेहरे थे। भाजपा से मौजूदा सीएम नायब सिंह सैनी कांग्रेस से दावेदार भूपेंद्र सिंह हुड्डा से मामूली अंतर से आगे थे। मोदी कारक ने भी भाजपा की जीत में अहम भूमिका निभाई, जबकि राहुल गांधी कारक ने ऐसा नहीं किया।

किसान और पहलवान विवाद का जमीन पर नहीं दिखा खास असर
करीब दस साल तक सीएम रहे मनोहर लाल की तुलना में मात्र छह महीने से थोड़ा अधिक समय तक सत्ता में रहने वाले सैनी को मतदाताओं ने अधिक पसंद किया। मतदाताओं ने किसानों के कल्याण और विकास के मुद्दे पर भाजपा को कांग्रेस से बेहतर माना। हालांकि, यह अंतर मामूली रूप से ही रहा। किसानों के लिए कल्याणकारी योजनाओं के लाभार्थियों ने बड़ी संख्या में भाजपा को वोट दिया जबकि गैर लाभार्थियों ने कांग्रेस को। पहलवानों के विवाद पर ज्यादातर मतदाताओं ने माना कि केंद्र सरकार ने उचित कार्रवाई की। हालांकि, पहलवान मुद्दा चुनाव प्रचार के दौरान और उससे पहले भी काफी सुर्खियों में रहा, पर जमीनी स्तर पर इसका वास्तविक प्रभाव उतना नहीं पड़ा, जितना पड़ने की संभावना दिख रही थी।

महिला मतदाताओं की भी रही महत्वपूर्ण भूमिका
महिला मतदाताओं ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। महिलाओं का समर्थन हासिल करने में भाजपा ने कांग्रेस को पीछे छोड़ दिया। जिन लोगों को लगा कि 5 वर्षों में हरियाणा में महिला सुरक्षा में सुधार हुआ है, उनमें से आधे ने भाजपा को वोट दिया। जिनको लगा स्थिति और खराब हुई, उनमें से लगभग आधे ने कांग्रेस को वोट दिया। इस कांटे के मुकाबले वाले चुनाव में लैंगिक वोट ने अहम अंतर पैदा किया।


जाट कांग्रेस के साथ, भाजपा के पीछे लामबंद हो गए गैर जाट
इस चुनाव में नए सामाजिक गठबंधन उभर कर सामने आए। हरियाणा में ऐतिहासिक रूप से जाट बनाम गैर-जाट होता रहा है। इस बार कांग्रेस ने जाट वोटों को अपने पक्ष में करने की भरपूर कोशिश की। हालांकि, उसे जाट वोटों का बहुमत हासिल हुआ, लेकिन दो महत्वपूर्ण घटनाक्रम हुए। इनेलो ने जाट वोटों का एक हिस्सा हासिल किया, जिससे कांग्रेस का जाट वोट बंट गया, जबकि कांग्रेस पूरी तरह से जाटों के एकजुट होने की उम्मीद थी। इससे भी अहम बात यह रही कि जाट वोटों को एकजुट करने के कांग्रेस के प्रयासों से भाजपा के पीछे गैर-जाट लामबंद हो गए। भाजपा ने ब्राह्मणों, पंजाबी खत्रियों, यादवों और गैर-जाटव अनुसूचित जातियों के बीच अपना आधार मजबूत किया। यह नया इंद्रधनुषी गठबंधन स्पष्ट रूप से उसके लिए फायदेमंद रहा और उसे जीत मिली।

कांग्रेस को अंदरूनी कलह की भारी कीमत चुकानी पड़ी 
कांग्रेस को अंदरूनी कलह की भारी कीमत चुकानी पड़ी। भूपेंद्र सिंह हुड्डा और कुमारी सैलजा के बीच सीएम पद की दावेदारी की खींचतान का असर साफ तौर से दिखा। दस में से छह मतदाताओं का मानना था कि इस अंदरूनी कलह और इसके व्यापक प्रभाव से पार्टी की संभावनाओं को नुकसान पहुंचा। केवल एक चौथाई मतदाताओं का मानना था कि मतदाता की पसंद को प्रभावित करने में यह कोई महत्वपूर्ण कारक नहीं था। इस प्रकार, पूरे चुनाव अभियान के दौरान दिखाई देने वाले कांग्रेस के अति आत्मविश्वास और आंतरिक संघर्ष ने भाजपा को हार के मुंह से जीत छीनने का मौका दिया।

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