{"_id":"5d8dc4c88ebc3e93b532c358","slug":"haryana-assembly-elections-2019-punjab-vs-haryana-on-syl-issue","type":"feature-story","status":"publish","title_hn":"हरियाणा विस चुनावः SYL के लिए पंजाब के खिलाफ कड़ा विरोध जताना था, इसलिए दिए थे इस्तीफे","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
हरियाणा विस चुनावः SYL के लिए पंजाब के खिलाफ कड़ा विरोध जताना था, इसलिए दिए थे इस्तीफे
Fri, 27 Sep 2019 01:44 PM IST
खुशबू गोयल
मोहित धुपड़, अमर उजाला, चंडीगढ़
मोहित धुपड़, अमर उजाला, चंडीगढ़
Published by: खुशबू गोयल
Updated Fri, 27 Sep 2019 01:44 PM IST
विज्ञापन
सतलुज यमुना लिंक नहर को पाटते हुए लोग
- फोटो : अमर उजाला
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
एसवाईएल के मुद्दे को लेकर पंजाब के खिलाफ कड़ा विरोध जताने के लिए ही भाजपा के छह विधायकों ने इस्तीफ दे दिए थे। सतलुज-यमुना लिंक नहर (एसवाईएल) के मुद्दे पर पंजाब के रूख पर कड़ा विरोध जताने के लिए पहली बार हरियाणा के भाजपा विधायकों ने बड़ा कूटनीतिक कदम उठाया था, जो सूबे के सियासी इतिहास में एक बड़ी घटना बनी। भाजपा के सभी छह विधायकों ने अपना कार्यकाल खत्म होने से नौ महीने पहले ही जुलाई 2004 में अपने पद से इस्तीफे दे दिए थे।
यह एक चौंकाने वाला सियासी घटनाक्रम था, क्योंकि उन विधायकों की यह कार्रवाई अचानक थी। विधायक कंवरपाल ने बताया कि भाजपा के सभी छह विधायक तत्कालीन हरियाणा विधानसभा स्पीकर सतबीर सिंह कादियान के पास इकट्ठे पहुंचे और तत्कालीन पंजाब सरकार के फैसले पर कड़ा विरोध जाहिर करते हुए सभी ने अपने पद इस्तीफे दे दिए। जिसमें वह भी शामिल थे। इसका मकसद यह था कि हरियाणा की जनता को संदेश दिया जा सके कि भाजपा ही एसवाईएल के मसले पर सूबे में पूरी तरह से गंभीर है।
इस ऐतिहासिक राजनीतिक घटना के बाद भले ही अभी तक हरियाणा को एसवाईएल का पानी तो नहीं मिला, लेकिन मौजूदा भाजपा सरकार ने अपने इस कार्यकाल में उन छह विधायकों के संघर्ष को मजबूती से आगे बढ़ाया। अब फिर से एसवाईएल पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला हरियाणा के पक्ष में आ चुका है। मगर पंजाब सरकार आज भी अपने अडि?ल रवैये पर अडिग है। जिसके चलते अब केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह हरियाणा विधानसभा चुनाव के बाद दिल्ली में दोनों सूबों के सीएम और अफसरों को बिठाकर इसका हल निकालेंगे।
विज्ञापन
विज्ञापन
यह एक चौंकाने वाला सियासी घटनाक्रम था, क्योंकि उन विधायकों की यह कार्रवाई अचानक थी। विधायक कंवरपाल ने बताया कि भाजपा के सभी छह विधायक तत्कालीन हरियाणा विधानसभा स्पीकर सतबीर सिंह कादियान के पास इकट्ठे पहुंचे और तत्कालीन पंजाब सरकार के फैसले पर कड़ा विरोध जाहिर करते हुए सभी ने अपने पद इस्तीफे दे दिए। जिसमें वह भी शामिल थे। इसका मकसद यह था कि हरियाणा की जनता को संदेश दिया जा सके कि भाजपा ही एसवाईएल के मसले पर सूबे में पूरी तरह से गंभीर है।
विज्ञापन
इस ऐतिहासिक राजनीतिक घटना के बाद भले ही अभी तक हरियाणा को एसवाईएल का पानी तो नहीं मिला, लेकिन मौजूदा भाजपा सरकार ने अपने इस कार्यकाल में उन छह विधायकों के संघर्ष को मजबूती से आगे बढ़ाया। अब फिर से एसवाईएल पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला हरियाणा के पक्ष में आ चुका है। मगर पंजाब सरकार आज भी अपने अडि?ल रवैये पर अडिग है। जिसके चलते अब केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह हरियाणा विधानसभा चुनाव के बाद दिल्ली में दोनों सूबों के सीएम और अफसरों को बिठाकर इसका हल निकालेंगे।
विज्ञापन
इन भाजपा विधायकों ने दिए थे इस्तीफे
इस मसले पर इस्तीफे देने वाले भाजपा विधायकों में छछरौली से कंवरपाल गुर्जर, अंबाला सिटी से वीणा छिब्बर, शाहबाद से कपूरचंद, कलानौर से सरिता, फरीदाबाद से चंद्र भाटिया व मेवला महाराजपुर से कृष्णपाल गुर्जर शामिल थे।
पंजाब ने नहर बनाने की बजाए समझौता ही कर दिया था रद
वैसे तो दोनों सूबों में यह जल विवाद करीब पांच दशकों से अधिक पुराना है। सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन एसवाईएल मामले में 15 जनवरी 2002 को सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब सरकार को एक साल में एसवाईएल के निर्माण के आदेश दिए थे। इसके जवाब में पंजाब सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में इस आदेश के खिलाफ पुनर्विचार याचिका डाल दी थी।
इस पुनर्विचार याचिका को 4 जून 2004 को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया था। जिसके बाद पंजाब ने ‘पंजाब टर्मिनेशन ऑफ एग्रीमेंट एक्ट 2004’ बनाकर ‘नहर जल बंटवारा समझौता’ रद कर दिया था। पंजाब के इसी रूख का तत्कालीन हरियाणा की इनेलो-भाजपा गठबंधन सरकार ने भी विरोध किया था। लेकिन भाजपा पंजाब सरकार के इस फैसले से इतना ज्यादा नाराज थी कि वे इस पर अपना कड़ा विरोध जाहिर करना चाहती थी।
पंजाब ने नहर बनाने की बजाए समझौता ही कर दिया था रद
वैसे तो दोनों सूबों में यह जल विवाद करीब पांच दशकों से अधिक पुराना है। सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन एसवाईएल मामले में 15 जनवरी 2002 को सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब सरकार को एक साल में एसवाईएल के निर्माण के आदेश दिए थे। इसके जवाब में पंजाब सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में इस आदेश के खिलाफ पुनर्विचार याचिका डाल दी थी।
इस पुनर्विचार याचिका को 4 जून 2004 को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया था। जिसके बाद पंजाब ने ‘पंजाब टर्मिनेशन ऑफ एग्रीमेंट एक्ट 2004’ बनाकर ‘नहर जल बंटवारा समझौता’ रद कर दिया था। पंजाब के इसी रूख का तत्कालीन हरियाणा की इनेलो-भाजपा गठबंधन सरकार ने भी विरोध किया था। लेकिन भाजपा पंजाब सरकार के इस फैसले से इतना ज्यादा नाराज थी कि वे इस पर अपना कड़ा विरोध जाहिर करना चाहती थी।
सांसद सांगवान के घर हुआ था इस्तीफा देने का फैसला
भाजपा के तत्कालीन सोनीपत से सांसद किशन सिंह सांगवान के घर इसी मसले को लेकर भाजपा कोर कमेटी की बैठक बुलाई गई। तत्कालीन प्रदेशाध्यक्ष गणेशीलाल, संगठनमंत्री राम प्यारे पांडे, हरियाणा भाजपा के प्रभारी डा. हर्षवर्धान समेत सभी छह भाजपा विधायक व अन्य नेतागण बैठक में मौजूद थे।
बैठक में विचार चल रहा था कि पंजाब ने समझौते रद करने की जो हिमाकत की है, उसका कड़े से कड़ा विरोध होना चाहिए। बैठक में विचार हुआ कि प्रदेशभर में भाजपा पंजाब के इस फैसले के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करे। लेकिन इस पर भाजपा के विधायकों ने एकसुर से कहा कि प्रदर्शन की बजाए वे इसके विरोधस्वरूप अपना विधायक पद छोडऩे को तैयार हैं, ताकि हरियाणा की जनता में इस मसले पर भाजपा की गंभीरता का संदेश दिया जा सके।
प्रदेशाध्यक्ष व प्रभारी ने विधायकों के इस विचार को भाजपा केंद्रीय नेतृत्व से सांझा किया और वहां से हरी झंडी मिलते ही भाजपा के सभी विधायक अचानक अपना इस्तीफा ले स्पीकर केपास पहुंच गए। इस कार्रवाई से उस वक्त गठबंधन सरकार में भाजपा के साथी दल इनेलो भी हैरान था। चूंकि उस वक्त इनेलो के पास पूर्ण बहुमत था, इसलिए भाजपा विधायकों के इस्तीफ से सरकार पर कोई संकट नहीं आया।
बैठक में विचार चल रहा था कि पंजाब ने समझौते रद करने की जो हिमाकत की है, उसका कड़े से कड़ा विरोध होना चाहिए। बैठक में विचार हुआ कि प्रदेशभर में भाजपा पंजाब के इस फैसले के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करे। लेकिन इस पर भाजपा के विधायकों ने एकसुर से कहा कि प्रदर्शन की बजाए वे इसके विरोधस्वरूप अपना विधायक पद छोडऩे को तैयार हैं, ताकि हरियाणा की जनता में इस मसले पर भाजपा की गंभीरता का संदेश दिया जा सके।
प्रदेशाध्यक्ष व प्रभारी ने विधायकों के इस विचार को भाजपा केंद्रीय नेतृत्व से सांझा किया और वहां से हरी झंडी मिलते ही भाजपा के सभी विधायक अचानक अपना इस्तीफा ले स्पीकर केपास पहुंच गए। इस कार्रवाई से उस वक्त गठबंधन सरकार में भाजपा के साथी दल इनेलो भी हैरान था। चूंकि उस वक्त इनेलो के पास पूर्ण बहुमत था, इसलिए भाजपा विधायकों के इस्तीफ से सरकार पर कोई संकट नहीं आया।