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विभाजन के गवाह: लाहाैर से विस्थापित हुए हरजिंदर सिंह... सब कुछ खोया पर हार नहीं मानी; खड़ी की मशहूर डेयरी

Fri, 15 Aug 2025 08:23 AM IST
निवेदिता वर्मा रिशु राज सिंह, अमर उजाला, चंडीगढ़
रिशु राज सिंह, अमर उजाला, चंडीगढ़ Published by: निवेदिता वर्मा Updated Fri, 15 Aug 2025 08:23 AM IST
सार

लाहौर के न्यू धर्मपुरा इलाके से विस्थापित होकर आए हरजिंदर सिंह तलवार ने सात साल की उम्र में विभाजन का दर्द सहा। हालांकि उन्होंने हार नहीं मानी और उसी दर्द को अपनी ताकत बनाकर जिंदगी की नई शुरुआत की।  

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Harjinder Singh Talwar migrated from Lahore partition started dairy in chandigarh
हरजिंदर सिंह - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

आजादी के समय हुए भारत-पाकिस्तान विभाजन की दर्दनाक यादें आज भी कई लोगों के जेहन में ताजा हैं। ऐसी ही एक कहानी है 85 वर्षीय हरजिंदर सिंह तलवार की, जो लाहौर से विस्थापित होकर भारत आए और अपनी मेहनत से नई जिंदगी की शुरुआत की।

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मशहूर तलवार डेयरी के मालिक हरजिंदर सिंह ने बताया कि कैसे उन्होंने महज 7 साल की उम्र में अपना सब कुछ खो दिया और फिर संघर्ष की राह पर चलकर चंडीगढ़ में डेयरी की नींव रखी।

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लाहाैर के बड़े जमींदार थे पिता

हरजिंदर सिंह का परिवार मूल रूप से लाहौर के न्यू धर्मपुरा इलाके का रहने वाला था। पिता का नाम माखन सिंह था। वो बड़े जमींदार थे। विभाजन के दौरान की हिंसा की यादें साझा करते हुए उन्होंने कहा कि वह छत पर बैठकर देखते थे। पास में ईंटें रखी थी कि उन पर हमला हुआ तो वह ईंट से वार करेंगे। उनके एक चाचा अंबाला रहते थे, तो परिवार ने कुछ दिन के लिए अंबाला भेज दिया। इस बीच हिंसा बहुत ज्यादा भड़क गई और उनके पिता, बड़ा भाई और दादी पाकिस्तान में फंस गए। चारों तरफ मारकाट चल रही थी।

उनके पिता के पास काम करने वाले कुछ मुसलमान कर्मियों ने उनकी जान बचाई। तीनों को बुर्का पहनाया और तांगे पर बिठाकर बॉर्डर की तरफ ले गए। सभी गहने और पैसे एक ट्रंक में रख लिए थे। रास्ते में कुछ बदमाश मिले, जिन्होंने हमला किया लेकिन किसी तरह जान बची। वहां से भाग कर किसी तरह अमृतसर बॉर्डर पहुंचे। हरजिंदर सिंह ने बताया कि वहां पर उनका ट्रंक लूट लिया गया और उनके पास कुछ भी नहीं बचा।

यह भी पढ़ें: विभाजन की विभीषका: जिस ट्रेन में पाकिस्तान से आई थीं लाशें.. उसके गार्ड के परिवार की यादों में आज भी दहशत

खुड्डा लाहौरा में बहती थी नहर, सेक्टर-33 में ग्वाले...यहीं से शुरू किया सफर

पिता के एक दोस्त, पटना के राधा किशन सिन्हा ने सोलन में अपनी कोठी रहने के लिए दे दी। कई साल वहां रहे। हरजिंदर के बड़े भाई पंजाब यूनिवर्सिटी में थे। 1958 में जब हरजिंदर 18 साल के थे, वे चंडीगढ़ आए। उस समय का चंडीगढ़ आज से बिल्कुल अलग था। उन्होंने बताया कि खुड्डा लाहौरा में बरसाती नदी बहती थी। जहां इस समय सेक्टर-33 हैं, वहां ग्वाले बैठते थे। वहां पर चौधरी बिधी चंद ने बिना कोई पैसे लिए सेक्टर-33 में काम करने के लिए जमीन दी, जहां उन्होंने 20 भैंसें और 3 गायें रखीं। कहा कि वह सबसे ज्यादा दूध बेचते थे। 3-4 साल तक यह काम चला, लेकिन सेक्टर-33 में घर बनने लगे तो बड़हेड़ी में शिफ्ट हो गए।

नौकर की सलाह ने बदली जिंदगी

बताया कि परिवार के सदस्यों ने इस काम को छोड़कर पटियाला बुलाया। जब वह जाने लगे तो एक नौकर जगत सिंह ने यहीं रहकर काम करने की सलाह ही। इसके बाद उनकी जिनंदी ने नया मोड़ दिया। परिवार के खिलाफ जाकर वह चंडीगढ़ में नौकर के साथ एक कमरे के मकान में रहे। 65 रुपये की नई साइकिल ली और 4 आने की रोटी पर गुजारा किया। वह साइकिल पर बड़हेड़ी, पलसौरा, बुटरेला और अटावा जैसे गांवों से दूध खरीदते और चंडीगढ़ के अलग-अलग सेक्टरों में बेचते थे। साइकिल पर 130 लीटर दूध ले जाते थे। लोग उन्हें 'भाईजी' या 'सरदार जी' कहकर पुकारते थे।


 

रिश्तेदार थे अमीर, उन्हें पसंद नहीं था मेरा दूध बेचना

हरजिंदर ने बताया कि रिश्तेदार अमीर होने के कारण मिलने नहीं आते थे। उनका दूध बेचना उन्हें अच्छा नहीं लगता था, लेकिन अंबाला वाले चाचा आते रहते। जो रिश्तेदार मिलने नहीं आते थे, वे अब सलाह लेने आने लगे। जिन्हें दूध का काम करता हुए देखना अच्छा नहीं लग रहा था, उन्होंने भी अपने लड़के भेज दिए कि इन्हें भी सेट कर दो। कुछ साल बाद सेक्टर-15 में एक शोरूम लिया, जहां से तलवार डेयरी शुरू की। जिंदगी में चुनौतियां कम नहीं थीं।

मेहनत और हिम्मत की मिसाल हैं हरजिंदर

72 साल की उम्र में संपत्ति का बंटवारा हुआ। सेक्टर-15 का शोरूम छोड़ दिया और खुड्डा जस्सू में दोबारा काम शुरू किया। अब यहीं पर दूध से बनने वाले सभी प्रोडक्ट्स तैयार करते हैं। छोटी बेटी बिन्नी काम में हाथ बंटा रही है। हरजिंदर सिंह सामाजिक कार्यों में दिल खोलकर सेवा करने के लिए भी मशहूर हैं। हरजिंदर सिंह की यह कहानी न सिर्फ विभाजन की त्रासदी को बयां करती है, बल्कि मेहनत और हिम्मत की मिसाल भी पेश करती है। आज वे चंडीगढ़ में अपनी यादों के साथ जी रहे हैं, लेकिन उनका सफर युवाओं के लिए प्रेरणा है।

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