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भाषा की गतिशीलता और तरक्की में अनुवाद की बड़ी भूमिका
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चंडीगढ़। पीयू के एचआरडीसी की ओर से आयोजित भाषा शिक्षकों के रिफ्रेशर कोर्स का समापन शुक्रवार को हो गया। विशेषज्ञों ने कहा कि किसी भी भाषा की गतिशीलता और तरक्की उस भाषा से और उस भाषा में होने वाले अनुवाद पर निर्भर करती है। कोई भाषा कहां तक पहुंचेगी, उसमें अनुवाद की बड़ी भूमिका होती है। इसलिए हमें अनुवाद की ताकत को पहचानना चाहिए। कोर्स समन्वयक डॉ. गुरमीत सिंह ने पूरे कोर्स की रिपोर्ट प्रस्तुत की।
पंजाब यूनिवर्सिटी की ओर से ‘अनुवाद की संस्कृति व संस्कृति का अनुवाद’ विषय पर आयोजित यह पहला ऑनलाइन रिफ्रेशर कोर्स था, जो पूरा हुआ। समापन सत्र में हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय धर्मशाला के चांसलर प्रो. हरमहेंद्र सिंह बेदी मुख्य वक्ता के तौर पर शामिल हुए जबकि हरियाणा साहित्य अकादमी व हरियाणा उर्दू अकादमी पंचकूला के निदेशक डॉ. चंद्र त्रिखा मुख्य अतिथि थे। डॉ. चंद्र त्रिखा ने कहा कि भाषाएं अनुवाद के माध्यम से केवल बढ़ती ही नहीं है बल्कि बचती भी हैं। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि उर्दू अदब आज यदि युवा पीढ़ी के बीच जिंदा है तो वो अनुवाद के कारण ही है।
ऋग्वेद सबसे प्राचीन ग्रंथ.. एशिया की संस्कृति का सूक्ष्म वर्णन मिला
प्रो. हरमहेंद्र सिंह बेदी ने अनुवाद के महत्व को रेखांकित करते हुए गुरुवाणी का उदाहरण देते हुए बताया कि इसमें हिंदी, फारसी, ब्रज, पंजाबी आदि भाषाओं के संतों की वाणी गुरु ग्रंथ साहिब में गुरुमुखी लिपि में संकलित की गई है। वैश्विक वाङ्मय के पीछे अनुवाद की बहुत बड़ी भूमिका है और इसके माध्यम से ही यह ज्ञात हुआ है कि ऋग्वेद सबसे प्राचीन ग्रंथ है, जिसमें एशिया की संस्कृति का सूक्ष्म वर्णन मिलता है। एचआरडीसी के निदेशक प्रो. एसके तोमर ने कहा कि नई शिक्षा नीति में अनुवाद के महत्व को समझते हुए राष्ट्रीय स्तर पर एक श्रेष्ठ अनुवाद संस्थान स्थापित करने का लक्ष्य रखा गया है। उन्होंने कहा कि अनुवाद के माध्यम से सभी भारतीय भाषाओं की ज्ञान संपदा पूरी दुनिया तक पहुंच सकती है।
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भाषा कोर्स में 10 राज्यों के भाषा शिक्षकों ने लिया हिस्सा
रिफ्रेशर कोर्स के कोर्स समन्वयक व हिंदी विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. गुरमीत सिंह ने समापन सत्र में दो सप्ताह के रिफ्रेशर कोर्स की रिपोर्ट प्रस्तुत की। उन्होंने उम्मीद जताई कि कोर्स के दौरान अनुवाद के विविध पक्षों पर हुई सार्थक चर्चा को प्रतिभागी अपने क्षेत्रों और विद्यार्थियों के बीच आगे बढ़ाएंगे। इसके माध्यम से अनुवाद की एक ऐसी संस्कृति विकसित हो पाएगी, जिसमें सभी भारतीय भाषाएं एक साथ आगे बढ़ पाएंगी। कोर्स में शामिल प्रतिभागियों राजेश जानकर, वेदव्रत, पूजा रावल और गुरप्रीत रायकोट ने अनुभव साझे करते हुए कहा कि कोर्स में बहुत कुछ नया सीखने को मिला। एचआरडीसी की उप निदेशक डॉ. जयंती दत्ता ने सभी का धन्यवाद किया। इस भाषा कोर्स में दस राज्यों के भाषा शिक्षकों ने हिस्सा लिया।
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पंजाब यूनिवर्सिटी की ओर से ‘अनुवाद की संस्कृति व संस्कृति का अनुवाद’ विषय पर आयोजित यह पहला ऑनलाइन रिफ्रेशर कोर्स था, जो पूरा हुआ। समापन सत्र में हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय धर्मशाला के चांसलर प्रो. हरमहेंद्र सिंह बेदी मुख्य वक्ता के तौर पर शामिल हुए जबकि हरियाणा साहित्य अकादमी व हरियाणा उर्दू अकादमी पंचकूला के निदेशक डॉ. चंद्र त्रिखा मुख्य अतिथि थे। डॉ. चंद्र त्रिखा ने कहा कि भाषाएं अनुवाद के माध्यम से केवल बढ़ती ही नहीं है बल्कि बचती भी हैं। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि उर्दू अदब आज यदि युवा पीढ़ी के बीच जिंदा है तो वो अनुवाद के कारण ही है।
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ऋग्वेद सबसे प्राचीन ग्रंथ.. एशिया की संस्कृति का सूक्ष्म वर्णन मिला
प्रो. हरमहेंद्र सिंह बेदी ने अनुवाद के महत्व को रेखांकित करते हुए गुरुवाणी का उदाहरण देते हुए बताया कि इसमें हिंदी, फारसी, ब्रज, पंजाबी आदि भाषाओं के संतों की वाणी गुरु ग्रंथ साहिब में गुरुमुखी लिपि में संकलित की गई है। वैश्विक वाङ्मय के पीछे अनुवाद की बहुत बड़ी भूमिका है और इसके माध्यम से ही यह ज्ञात हुआ है कि ऋग्वेद सबसे प्राचीन ग्रंथ है, जिसमें एशिया की संस्कृति का सूक्ष्म वर्णन मिलता है। एचआरडीसी के निदेशक प्रो. एसके तोमर ने कहा कि नई शिक्षा नीति में अनुवाद के महत्व को समझते हुए राष्ट्रीय स्तर पर एक श्रेष्ठ अनुवाद संस्थान स्थापित करने का लक्ष्य रखा गया है। उन्होंने कहा कि अनुवाद के माध्यम से सभी भारतीय भाषाओं की ज्ञान संपदा पूरी दुनिया तक पहुंच सकती है।
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भाषा कोर्स में 10 राज्यों के भाषा शिक्षकों ने लिया हिस्सा
रिफ्रेशर कोर्स के कोर्स समन्वयक व हिंदी विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. गुरमीत सिंह ने समापन सत्र में दो सप्ताह के रिफ्रेशर कोर्स की रिपोर्ट प्रस्तुत की। उन्होंने उम्मीद जताई कि कोर्स के दौरान अनुवाद के विविध पक्षों पर हुई सार्थक चर्चा को प्रतिभागी अपने क्षेत्रों और विद्यार्थियों के बीच आगे बढ़ाएंगे। इसके माध्यम से अनुवाद की एक ऐसी संस्कृति विकसित हो पाएगी, जिसमें सभी भारतीय भाषाएं एक साथ आगे बढ़ पाएंगी। कोर्स में शामिल प्रतिभागियों राजेश जानकर, वेदव्रत, पूजा रावल और गुरप्रीत रायकोट ने अनुभव साझे करते हुए कहा कि कोर्स में बहुत कुछ नया सीखने को मिला। एचआरडीसी की उप निदेशक डॉ. जयंती दत्ता ने सभी का धन्यवाद किया। इस भाषा कोर्स में दस राज्यों के भाषा शिक्षकों ने हिस्सा लिया।