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देश का सबसे ऊंचा फतेह बुर्ज अंधेरे में है, जानें क्या है वजह
ब्यूरो/अमर उजाला, मोहाली
Updated Mon, 17 Apr 2017 12:44 AM IST
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शाम होते ही अंधेरे में फतेह बुर्ज
- फोटो : अमर उजाला
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मोहाली के चप्पड़चिड़ी में लाखों रुपये की लागत से बनाया गया बाबा बंदा सिंह बहादुर की शहादत को समर्पित फतेह बुर्ज कई दिनों से शाम होते ही अंधेरे में डूब जाता है। वहीं, फतेह बुर्ज में लगने वाली लिफ्टों का काम भी अधर में लटक गया है। इस कारण सैलानी फतेह बुर्ज के ऊपर तक नहीं जा पा रहे हैं। हालांकि काफी संख्या में रोजाना सैलानी फतेह बुर्ज देखने के लिए पहुंच रहे हैं।
जानकारी के मुताबिक, चप्पड़चिड़ी स्थित फतेह बुर्ज को रोशन करने वाली लाइटों में कई दिनों से खराब हैं। इस कारण शाम होते ही फतेह बुर्ज अंधेरे में डूब जाता है। हालांकि, यह मामला गमाडा के अधिकारियों तक पहुंच गया है, लेकिन छुट्टियां होने के कारण लाइटों को ठीक नहीं किया जा सका। हालांकि, फतेह बुर्ज को रोशन करने के लिए गमाडा की ओर से आकर्षक लेजर लाइट लगाई गईं हैं। जिससे फतेह बुर्ज शाम को खूबसूरत रंगों में नजर आता है।
जापान से आई लिफ्ट दरवाजे पड़ गए छोटे
फतेह बुर्ज के अंदर जाने के लिए लिफ्ट लगाई जानी है। गमाडा ने जापान से एक नामी कंपनी से लिफ्ट मंगवा ली है। सूत्रों से पता चला है कि लिफ्ट लगाने के लिए जो दरवाजे छोड़े गए हैं उसका आकार छोटा है। जबकि लिफ्टों का आकार बड़ा है। ऐसे में अगर दरवाजों का साइज बड़ा कर लिफ्टें लगाई जाएं और बुर्ज को नुकसान भी न हो। इस संबंध में टेक्निकल माहिरों से राय मांगी गई है। सूत्रों के मुताबिक माहिरों की रिपोर्ट आने के बाद से ही लिफ्ट का काम आगे बढ़ पाएगा।
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जानकारी के मुताबिक, चप्पड़चिड़ी स्थित फतेह बुर्ज को रोशन करने वाली लाइटों में कई दिनों से खराब हैं। इस कारण शाम होते ही फतेह बुर्ज अंधेरे में डूब जाता है। हालांकि, यह मामला गमाडा के अधिकारियों तक पहुंच गया है, लेकिन छुट्टियां होने के कारण लाइटों को ठीक नहीं किया जा सका। हालांकि, फतेह बुर्ज को रोशन करने के लिए गमाडा की ओर से आकर्षक लेजर लाइट लगाई गईं हैं। जिससे फतेह बुर्ज शाम को खूबसूरत रंगों में नजर आता है।
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जापान से आई लिफ्ट दरवाजे पड़ गए छोटे
फतेह बुर्ज के अंदर जाने के लिए लिफ्ट लगाई जानी है। गमाडा ने जापान से एक नामी कंपनी से लिफ्ट मंगवा ली है। सूत्रों से पता चला है कि लिफ्ट लगाने के लिए जो दरवाजे छोड़े गए हैं उसका आकार छोटा है। जबकि लिफ्टों का आकार बड़ा है। ऐसे में अगर दरवाजों का साइज बड़ा कर लिफ्टें लगाई जाएं और बुर्ज को नुकसान भी न हो। इस संबंध में टेक्निकल माहिरों से राय मांगी गई है। सूत्रों के मुताबिक माहिरों की रिपोर्ट आने के बाद से ही लिफ्ट का काम आगे बढ़ पाएगा।
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भारत में सबसे ऊंचा है फतेह बुर्ज
शाम होते ही अंधेरे में फतेह बुर्ज
बुतों को कमजोर कर रहे हैं चूहे
बाबा बंदा सिंह बहादुर यादगारी कॉम्प्लेक्स में बाबा बंदा सिंह बहादुर व उनके पांच जरनैलों के बुत लगाए गए हैं। जो कि ऊंचे मिट्टी के टिब्बों पर लगाए गए हैं जो कि ऐसा प्रतीक होता है कि वजीर खान के युद्ध के दौरान खालसा फौज की कमांड कर रहे हो। लेकिन इन मिट्टी के टिब्बों को अब चूहों की मार पड़ रही है। चूहे इन टिब्बों को कमजोर कर रहे हैं।
जानकारी के मुताबिक फतेह बुर्ज 11 महीने में बन कर तैयार हुआ है। इसकी ऊंचाई 328 फुट है। यह महान जरनैल बाबा बंदा सिंह बहादुर की सरहिंद फतेह के लिए लड़े गए युद्ध में हुई जीत का प्रतीक है। उस समय जो युद्ध हुआ उसमें सरहिंद के वजीर खान को बाबा बंदा सिंह बहादुर ने इस स्थान पर मार कर छोटे साहिबजादों की शहादत का बदला लिया था। साथ ही पहला खालसा राज भी स्थापित किया था।
फतेह बुर्ज की तीन मंजिलें है। पहली मंजिल 67 फुट, दूसरी 117 और तीसरी 220 फुट है। फतेह बुर्ज के ऊपर गुंबद और खंडा भी लगाया गया है। तीनों मंजिलें उस समय हुए युद्ध में हुई जीत का प्रतीक है।
बाबा बंदा सिंह बहादुर यादगारी कॉम्प्लेक्स में बाबा बंदा सिंह बहादुर व उनके पांच जरनैलों के बुत लगाए गए हैं। जो कि ऊंचे मिट्टी के टिब्बों पर लगाए गए हैं जो कि ऐसा प्रतीक होता है कि वजीर खान के युद्ध के दौरान खालसा फौज की कमांड कर रहे हो। लेकिन इन मिट्टी के टिब्बों को अब चूहों की मार पड़ रही है। चूहे इन टिब्बों को कमजोर कर रहे हैं।
जानकारी के मुताबिक फतेह बुर्ज 11 महीने में बन कर तैयार हुआ है। इसकी ऊंचाई 328 फुट है। यह महान जरनैल बाबा बंदा सिंह बहादुर की सरहिंद फतेह के लिए लड़े गए युद्ध में हुई जीत का प्रतीक है। उस समय जो युद्ध हुआ उसमें सरहिंद के वजीर खान को बाबा बंदा सिंह बहादुर ने इस स्थान पर मार कर छोटे साहिबजादों की शहादत का बदला लिया था। साथ ही पहला खालसा राज भी स्थापित किया था।
फतेह बुर्ज की तीन मंजिलें है। पहली मंजिल 67 फुट, दूसरी 117 और तीसरी 220 फुट है। फतेह बुर्ज के ऊपर गुंबद और खंडा भी लगाया गया है। तीनों मंजिलें उस समय हुए युद्ध में हुई जीत का प्रतीक है।