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अटल बिहारी वाजपेयी को जो एक बार सुन लेता, वो उन्हें भूला नहीं पाता था...दिल छू लेंगे 3 किस्से
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
Updated Fri, 17 Aug 2018 05:12 PM IST
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Atal Bihari Vajpayee
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पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी अपने आप में एक ऐसा संगठन थे कि कोई तोड़ने की हिम्मत नहीं कर सकता था। पढ़ें पूर्व प्रधानमंत्री से जुड़े तीन ऐसे किस्से, जो दिल को छू जाएंगे। वे आज हमारे बीच नहीं रहे।
16 अगस्त 2018 की शाम को उन्होंने दिल्ली स्थित एम्स में आखिरी सांस ली, लेकिन उनकी यादें और उनसे जुड़ी बातें पूरा देश याद रखेगा। हर कोई उनको लेकर अपनी भावनाएं व्यक्त कर रहा है। लगभग देश के हर राज्य से उन्होंने नाता जोड़ा और अपनी यादें छोड़ी। ऐसा ही एक खास नाता उनका पंजाब से रहा, पढ़िए तीन किस्से...
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16 अगस्त 2018 की शाम को उन्होंने दिल्ली स्थित एम्स में आखिरी सांस ली, लेकिन उनकी यादें और उनसे जुड़ी बातें पूरा देश याद रखेगा। हर कोई उनको लेकर अपनी भावनाएं व्यक्त कर रहा है। लगभग देश के हर राज्य से उन्होंने नाता जोड़ा और अपनी यादें छोड़ी। ऐसा ही एक खास नाता उनका पंजाब से रहा, पढ़िए तीन किस्से...
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अपने आप में एक संगठन थे अटल बिहारी वाजपेयी
Atal bihari vajpayee
जनसंघ का निर्माण हुआ तो मेरे पिता स्व. मनमोहन कालिया पहले दिन से अटल बिहारी वाजपेयी के साथ जुड़ गए। अटल जी अपने आप में एक संगठन थे। उनका व्यक्तित्व ऐसा था, कि एक बार जो उनके विचार सुन लेता उनसे दूर जाने का दिल नहीं करता था। पिताजी पहली बार 1967 में जनसंघ से विधायक चुने गए और दूसरी बार 1969 में। यही वजह थी कि अटल जी मेरे पिता से दिल से लगाव रखते थे। 1977 में जब जनता पार्टी का गठन हुआ तो पिता जी पंजाब में अटल जी के सारथी थे।
1977 में उनके पिता जी जनसंघ से विधायक चुने गए तो अटल जी के साथ लगातार चिट्ठी का आदान प्रदान होने लगा। मनमोहन कालिया को जालंधर में कन्वीनर लगाया गया और अटल जी की विचारधारा की पंजाब में नींव रखी गई। अटल जी ने पंजाब में दौरा किया तो जिम्मेदारी मनमोहन कालिया के कंधों पर थी। पिता जी हमेशा घर आकर अटल जी की विचारधारा का गुणगान करते थे। उनकी बातों व कविताओं का व्याख्यान काफी शौक से सुनाया करते थे।
उनकी बातों को सुनकर मैं काफी उत्साहित होता और हमेशा पिता से यही जिद्द करता था कि मुझे अटल जी के विचारों को सुनना है। अकसर उनकी बातों को रैली में जाकर सुनता, उनके भाषणों की आडियो टेप को घर में लगाकर सुनता। तब अहसास होता था कि अटल जी राजनीति नहीं करते बल्कि देश के लिए जीते हैं। वह पिता जी से हमेशा गरीबी और देश की तरक्की की बातों का विचार करते थे। दो जून 1986 को जब मनमोहन कालिया का निधन हुआ तो अटल जी घर आए थे।
अटल जी की शिक्षा को लेकर ही मैं राजनीति में उतरा। मंत्री बनने के बाद अटल जी से अकसर मुलाकात होती तो वह प्यार से पीठ थपथपाते थे और पिता की यादों को जरूर सांझा करते थे। बतौर मंत्री जब भी उनसे मुलाकात हुई, एक ही बात को हमेशा कहते थे, लोगों की सेवा करनी है। देश को आगे ले जाना है और शक्तिशाली बनाना है। वह जो खुद करते थे, उसकी सीख हमेशा दूसरों को देते थे। अटल जी ने देश को शक्तिशाली बनाया, अर्थव्यवस्था को मजबूत किया और देश में सड़कों का जाल बिछा दिया। आज मैं चल रहा हूं और चलता जा रहा हूं, यह उनकी बदौलत ही है। उनसे जो कुछ सीखा उसमें खुद को ढालने की कोशिश कर रहा हूं।
(जैसा मनोरंजन कालिया ने अमर उजाला के संवाददाता सुरिंदर पाल को बताया।)
1977 में उनके पिता जी जनसंघ से विधायक चुने गए तो अटल जी के साथ लगातार चिट्ठी का आदान प्रदान होने लगा। मनमोहन कालिया को जालंधर में कन्वीनर लगाया गया और अटल जी की विचारधारा की पंजाब में नींव रखी गई। अटल जी ने पंजाब में दौरा किया तो जिम्मेदारी मनमोहन कालिया के कंधों पर थी। पिता जी हमेशा घर आकर अटल जी की विचारधारा का गुणगान करते थे। उनकी बातों व कविताओं का व्याख्यान काफी शौक से सुनाया करते थे।
उनकी बातों को सुनकर मैं काफी उत्साहित होता और हमेशा पिता से यही जिद्द करता था कि मुझे अटल जी के विचारों को सुनना है। अकसर उनकी बातों को रैली में जाकर सुनता, उनके भाषणों की आडियो टेप को घर में लगाकर सुनता। तब अहसास होता था कि अटल जी राजनीति नहीं करते बल्कि देश के लिए जीते हैं। वह पिता जी से हमेशा गरीबी और देश की तरक्की की बातों का विचार करते थे। दो जून 1986 को जब मनमोहन कालिया का निधन हुआ तो अटल जी घर आए थे।
अटल जी की शिक्षा को लेकर ही मैं राजनीति में उतरा। मंत्री बनने के बाद अटल जी से अकसर मुलाकात होती तो वह प्यार से पीठ थपथपाते थे और पिता की यादों को जरूर सांझा करते थे। बतौर मंत्री जब भी उनसे मुलाकात हुई, एक ही बात को हमेशा कहते थे, लोगों की सेवा करनी है। देश को आगे ले जाना है और शक्तिशाली बनाना है। वह जो खुद करते थे, उसकी सीख हमेशा दूसरों को देते थे। अटल जी ने देश को शक्तिशाली बनाया, अर्थव्यवस्था को मजबूत किया और देश में सड़कों का जाल बिछा दिया। आज मैं चल रहा हूं और चलता जा रहा हूं, यह उनकी बदौलत ही है। उनसे जो कुछ सीखा उसमें खुद को ढालने की कोशिश कर रहा हूं।
(जैसा मनोरंजन कालिया ने अमर उजाला के संवाददाता सुरिंदर पाल को बताया।)
समय के पाबंद थे अटल बिहारी वाजपेयी, आरएसएस वर्कर होने पर फख्र था
atal bihari vajpayee
जगदीश जोशी, मुक्तसर
पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी तीन बार मुक्तसर की ऐतिहासिक धरती पर आ चुके थे। नगर काउंसिल के पूर्व उपाध्यक्ष व भाजपा के वरिष्ठ नेता सतपाल पठेला ने वाजपेयी को याद करते हुए कहा कि उनके जैसा नेता कहीं देखने को नहीं मिलता। वह तो त्याग व तपस्या की मूर्ति थे। हर व्यक्ति को उनसे कार्य समय पर करने की प्रेरणा मिलती थी, क्योंकि वह खुद समय के पाबंद थे। 1978 में कैनाल रेस्ट हाउस में समारोह में आए थे तो बिल्कुल तय समय पर पहुंचे थे। वह पार्टी का हमेशा सम्मान करते थे।
वहीं आरएसएस वर्कर होने पर भी उन्हें फख्र था। भाजपा के जिला अध्यक्ष राजेश पठेला गोरा ने बताया कि 1978 में उन्होंने पहली बार वाजपेयी जी को आमने-सामने देखा था। तब उनकी उम्र महज नौ वर्ष ही थी। वह अपने पिता सतपाल पठेला के साथ कैनाल रेस्ट हाउस में कार्यकर्ताओं के साथ हो रही बैठक में गए थे जहां वाजपेयी कार्यकर्ताओं के साथ रुबरु होने आए थे। वाजपेयी 1977 में घास मंडी चौक में पूर्व मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल के पक्ष में रैली को संबोधित करने भी आए थे।
उस समय बादल ने लोकसभा चुनाव लड़ा था और बाद में कृषि मंत्री बने थे। भाजपा के मंडल अध्यक्ष संदीप गिरधर बताते हैं कि 1986 में लुबानियांवाली बस कांड में मारे गए मुक्तसर के 17 लोगों को श्रद्धांजलि देने के लिए नई दाना मंडी में श्रद्धांजलि समारोह रखा गया था। उन दिनों अटल बिहारी वाजपेयी विपक्ष के नेता थे और इस श्रद्धांजलि समारोह में भाग लेने आए थे। समारोह के बाद वे उनके तेलियांवाली गली स्थित पुराने घर गए थे। जहां उन्होंने करीब तीन घंटे बिताए और खाना खाया।
संदीप गिरधर के अनुसार उन दिनों उनके पिता स्व. राजकुमार गिरधर भाजपा के जिला अध्यक्ष थे। उस समय पहली बार वाजपेयी जी को देखा तो लगा उनके जैसा विनम्र स्वभाव का नेता कोई न होगा। वह बहुत मिलनसार थे। मंडी किल्लियांवाली में किया था चौधरी देवी लाल की प्रतिमा का अनावरण मंडी किल्लियांवाली में वाजपेयी ने 25 सितंबर 2001 में पूर्व उप प्रधानमंत्री चौधरी देवी लाल चौटाला की प्रतिमा का अनावरण किया था।
पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी तीन बार मुक्तसर की ऐतिहासिक धरती पर आ चुके थे। नगर काउंसिल के पूर्व उपाध्यक्ष व भाजपा के वरिष्ठ नेता सतपाल पठेला ने वाजपेयी को याद करते हुए कहा कि उनके जैसा नेता कहीं देखने को नहीं मिलता। वह तो त्याग व तपस्या की मूर्ति थे। हर व्यक्ति को उनसे कार्य समय पर करने की प्रेरणा मिलती थी, क्योंकि वह खुद समय के पाबंद थे। 1978 में कैनाल रेस्ट हाउस में समारोह में आए थे तो बिल्कुल तय समय पर पहुंचे थे। वह पार्टी का हमेशा सम्मान करते थे।
वहीं आरएसएस वर्कर होने पर भी उन्हें फख्र था। भाजपा के जिला अध्यक्ष राजेश पठेला गोरा ने बताया कि 1978 में उन्होंने पहली बार वाजपेयी जी को आमने-सामने देखा था। तब उनकी उम्र महज नौ वर्ष ही थी। वह अपने पिता सतपाल पठेला के साथ कैनाल रेस्ट हाउस में कार्यकर्ताओं के साथ हो रही बैठक में गए थे जहां वाजपेयी कार्यकर्ताओं के साथ रुबरु होने आए थे। वाजपेयी 1977 में घास मंडी चौक में पूर्व मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल के पक्ष में रैली को संबोधित करने भी आए थे।
उस समय बादल ने लोकसभा चुनाव लड़ा था और बाद में कृषि मंत्री बने थे। भाजपा के मंडल अध्यक्ष संदीप गिरधर बताते हैं कि 1986 में लुबानियांवाली बस कांड में मारे गए मुक्तसर के 17 लोगों को श्रद्धांजलि देने के लिए नई दाना मंडी में श्रद्धांजलि समारोह रखा गया था। उन दिनों अटल बिहारी वाजपेयी विपक्ष के नेता थे और इस श्रद्धांजलि समारोह में भाग लेने आए थे। समारोह के बाद वे उनके तेलियांवाली गली स्थित पुराने घर गए थे। जहां उन्होंने करीब तीन घंटे बिताए और खाना खाया।
संदीप गिरधर के अनुसार उन दिनों उनके पिता स्व. राजकुमार गिरधर भाजपा के जिला अध्यक्ष थे। उस समय पहली बार वाजपेयी जी को देखा तो लगा उनके जैसा विनम्र स्वभाव का नेता कोई न होगा। वह बहुत मिलनसार थे। मंडी किल्लियांवाली में किया था चौधरी देवी लाल की प्रतिमा का अनावरण मंडी किल्लियांवाली में वाजपेयी ने 25 सितंबर 2001 में पूर्व उप प्रधानमंत्री चौधरी देवी लाल चौटाला की प्रतिमा का अनावरण किया था।
अटल जी तो अटल हैं
Atal bihari vajpayee
- फोटो : अमर उजाला
मुझे बहन कहकर बुलाते थे लेकिन अफसोस रक्षाबंधन से पहले ही जुदा हो गए। अटल जी अपने आप में एक व्यक्तित्व थे। बहुत ही सहज व सरल स्वभाव के थे। मैं विद्यार्थी जीवन में करीब मैं 13-14 साल की ही रही होंगी, जब मैंने अटल जी को पहली बार देखा था। अटल जी न केवल चेहरे याद रखते थे बल्कि नाम तक भी नहीं भूलते थे। उनके जाने से हिंदुस्तान की राजनीति में बहुत बड़ा स्थान खाली हो गया है। वे सबके अपने थे।
एक सरल सी मुस्कान हमेशा उनके चेहरे पर रहती थी। उनका कहीं भी कार्यक्रम होता था तो मैं सब काम छोड़कर उनका भाषण सुनने जाती थी। एक बार की बात है प्रधानमंत्री बनने से पहले अटलजी गंगाजी के बीच ‘डैम कोठी’ पर मीटिंग ले रहे थे। मेरे पहुंचते ही उन्होंने कहा, ये देखो हमारी बहन लक्ष्मीकांता आई हैं। उसके बाद उन्होंने प्यार से अपने पास बैठाया और मीटिंग ली। यह मेरे लिए गर्व का क्षण था। यही नहीं प्रधानमंत्री काल में मैं उनसे तीन बार मिली।
हर बार इतने ही सहज और आत्मीयता से भरे हुए। आतंकवाद के दौरान मैंने चंदा भी इकट्ठा किया। कालेज में हिंदी विभाग का हेड होने के कारण मैं अपने विद्यार्थियों को प्रतियोगिता के लिए अटलजी की 10-12 हिंदी की कविताएं कंठस्थ करवा कर भेजती थी। कभी ऐसा नहीं हुआ कि मेरे विद्यार्थी बिना इनाम के वापस आए हों। 1999 में कारगिल के युद्ध के समय तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी जी मिली थीं। वे परेशान थे लेकिन कभी परेशानी उनके चेहरे पर नहीं आती थी।
मैं अपने ड्राइंग रूम में किसी नेता की फोटो नहीं लगाती। बस अटलजी की फोटो मेरे ड्राइंग रूम में लगी है। 2007 में वे अमृतसर आए और सुरक्षा घेरे में मंच पर थे लेकिन मुझे बुलाना नहीं भूले। तब मैंने उन्हें और आडवाणी जी को नारियल की माला पहनाई थी। वे जिंदादिल इंसान थे। ऐसे इंसान सदियों में एक बार जन्म लेते हैं और मरकर भी अमर, अटल रहते हैं। बस एक पीड़ा हमेशा रहेगी कि 2 साल पहले जब दिल्ली उनसे मिलने गई तो मुझे किसी ने उनसे मिलने नहीं दिया।
- पंजाब की पूर्व सेहत मंत्री लक्ष्मीकांता चावला से टेलीफोन पर सीमा एस आनंद की बातचीत पर आधारित
एक सरल सी मुस्कान हमेशा उनके चेहरे पर रहती थी। उनका कहीं भी कार्यक्रम होता था तो मैं सब काम छोड़कर उनका भाषण सुनने जाती थी। एक बार की बात है प्रधानमंत्री बनने से पहले अटलजी गंगाजी के बीच ‘डैम कोठी’ पर मीटिंग ले रहे थे। मेरे पहुंचते ही उन्होंने कहा, ये देखो हमारी बहन लक्ष्मीकांता आई हैं। उसके बाद उन्होंने प्यार से अपने पास बैठाया और मीटिंग ली। यह मेरे लिए गर्व का क्षण था। यही नहीं प्रधानमंत्री काल में मैं उनसे तीन बार मिली।
हर बार इतने ही सहज और आत्मीयता से भरे हुए। आतंकवाद के दौरान मैंने चंदा भी इकट्ठा किया। कालेज में हिंदी विभाग का हेड होने के कारण मैं अपने विद्यार्थियों को प्रतियोगिता के लिए अटलजी की 10-12 हिंदी की कविताएं कंठस्थ करवा कर भेजती थी। कभी ऐसा नहीं हुआ कि मेरे विद्यार्थी बिना इनाम के वापस आए हों। 1999 में कारगिल के युद्ध के समय तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी जी मिली थीं। वे परेशान थे लेकिन कभी परेशानी उनके चेहरे पर नहीं आती थी।
मैं अपने ड्राइंग रूम में किसी नेता की फोटो नहीं लगाती। बस अटलजी की फोटो मेरे ड्राइंग रूम में लगी है। 2007 में वे अमृतसर आए और सुरक्षा घेरे में मंच पर थे लेकिन मुझे बुलाना नहीं भूले। तब मैंने उन्हें और आडवाणी जी को नारियल की माला पहनाई थी। वे जिंदादिल इंसान थे। ऐसे इंसान सदियों में एक बार जन्म लेते हैं और मरकर भी अमर, अटल रहते हैं। बस एक पीड़ा हमेशा रहेगी कि 2 साल पहले जब दिल्ली उनसे मिलने गई तो मुझे किसी ने उनसे मिलने नहीं दिया।
- पंजाब की पूर्व सेहत मंत्री लक्ष्मीकांता चावला से टेलीफोन पर सीमा एस आनंद की बातचीत पर आधारित