पंजाब में गहराया वित्तीय संकट, नए विकास कार्यों पर लगी रोक, खर्च में 20 फीसदी की कटौती
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गंभीर वित्तीय संकट से जूझ रही पंजाब सरकार ने आखिरकार राज्य में नए विकास कार्यों से भी हाथ खींच लिया है। अब सरकार का सारा ध्यान कर्मचारियों के वेतन-पेंशन, सरकारी संस्थानों के बिजली के बिल और राज्य पर चढ़े भारी-भरकम कर्ज को चुकाने में लग गया है। वित्त विभाग की ओर से खर्चों में कटौती संबंधी प्रस्ताव को मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने मंजूरी दे दी है।
वित्त विभाग की बजट शाखा-1 द्वारा राज्य से सभी विभाग प्रमुखों, सभी डिवीजनों के कमिश्नरों और डिप्टी कमिश्नरों को भेजे पत्र में कहा गया है कि सभी विभागों के लिए वेतन, पेंशन, बिजली के बिल और कर्ज की अदायगी को छोड़कर बाकी सभी तरह के खर्च में 20 फीसदी कटौती कर दी गई है।
2019-20 में कोई भी विभाग किसी भी नए कार्य के लिए टेंडर जारी नहीं करेगा और विभागों को वर्तमान में जारी विकास कार्यों पर ध्यान देने को कहा गया है। इसके साथ ही हिदायत दी गई है कि अगर किन्हीं आपात स्थितियों में किसी कार्य के लिए कोई टेंडर जारी करना अपरिहार्य हो तो उसके लिए अनुमति वित्त विभाग से ली जाए। विभागों को ताकीद दी गई है कि वे विभाग के लिए कोई भी नया साजो-सामान न खरीदें।
जीएसटी की लेटलतीफी से डूबी प्रदेश की अर्थव्यवस्था
देश में जब तक जीएसटी की व्यवस्था लागू नहीं हुई थी तब तक पंजाब सरकार को अपने सभी साधनों से हर साल 42 से 48 हजार करोड़ रुपये की राजस्व प्राप्ति होती थी। जीएसटी लागू होने के बाद से इस मद के तहत आई सेवाओं से राज्य सरकार को करीब 12 हजार करोड़ रुपये सालाना ही मिल रहे हैं, जिसकी अदायगी में भी केंद्र सरकार द्वारा देरी की जा रही है।
खजाने की हालत इतनी खराब हो चुकी है कि राज्य सरकार ने 8202 करोड़ रुपये पुराने कर्जों का ब्याज के रूप में चुका दिए और मौजूदा खर्च चलाने के लिए बाजार से 8212 करोड़ रुपये का नया कर्ज भी उठा लिया। केंद्र से उसे न तो समय पर जीएसटी शेयर की राशि मिली और न ही जीएसटी मुआवजे की राशि।
इस दौरान राज्य में जीएसटी की आमदनी में पांच फीसदी की बढ़ोतरी तो हुई लेकिन भ्रष्टाचार ने सरकार को राज्य के करों और गैर कर राजस्व से होने वाली आय में लगातार घाटा होता रहा। वित्त विभाग के अनुसार, प्रदेश के टैक्स रेवन्यू और नान टेक्स रेवन्यू में 11 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है। केंद्र से जीएसटी शेयर मिलने में तो देरी हो रही है जबकि अपने साधनों से आमदनी घटती जा रही है।
केंद्र ने अगस्त और सितंबर के लिए 4100 करोड़ रुपये के जीएसटी बकाया के एवज में पंजाब को 2228 करोड़ रुपये दिसंबर में जारी किए। बाकी बचे पैसे के अलावा अक्तूबर और नवंबर का जीएसटी शेयर अभी तक केंद्र के पास है। राज्य सरकार को 2018-19 में अपने साधनों से 45181 करोड़ रुपये की आय हुई थी, जो 2019-20 में 42496 करोड़ रुपये पर सिमट जाने की संभावना है।
नवंबर 2019 तक टैक्स रेवन्यू और नान टेक्स रेवन्यू का कुल आंकड़ा 4580 करोड़ रुपये की कमी दर्शा रहा है। वहीं, राज्य सरकार पर कर्ज का बोझ 2.25 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है, जिसके लिए अब हर महीने ब्याज में ही टैक्स राशि का बड़ा हिस्सा चला जाता है।
पंजाब के बुनियादी ढांचे पर भारी पड़ रहीं केंद्र की शर्तें
भारत सरकार द्वारा सड़कें, बिजली, सिंचाई आदि बुनियादी ढांचा विकसित करने के लिए राज्यों को वित्तीय सहायता दी जाती है। पंजाब ने पहले ही अपने स्रोतों से या कर्ज लेकर केंद्र की मदद के बिना ही ढांचा विकसित कर लिया है, जिसका उसे अब केंद्र की मौजूदा स्कीमों में निहित शर्तों के कारण खामियाजा भुगतना पड़ रहा है। उसे अनुदान भी नहीं मिल रहा और ऊपर से ढांचा विकसित करने के लिए उठाए कर्ज की अदायगी भी करनी पड़ रही है।
सांसदों-विधायकों के लिए लग्जरी कारें
नए विकास कार्यों पर रोक लगाने वाला पंजाब का वित्त विभाग मंत्रियों-विधायकों के खर्चों में कोई कटौती नहीं कर रहा। पंजाब सरकार ने नवंबर, 2018 में मुख्यमंत्री, उनके सलाहकारों, मंत्रियों, विभाग प्रमुखों, कमिश्नरों और डिप्टी कमिश्नरों के लिए 97 नई गाड़ियां खरीदने से लिए करीब 90 करोड़ रुपये मंजूर किए थे।
ठीक एक साल बाद अब नवंबर 2019 में कुछ सांसदों और विधायकों की तरफ से 20 नई गाड़ियां देने की मांग सरकार के पास पहुंची। इनमें से 10 आलीशान गाड़ियां खरीदने का प्रस्ताव वित्त विभाग ने मंजूर कर लिया है। हालांकि नए वाहनों का प्रस्ताव इसलिए दिया गया था कि संबंधित सांसदों और विधायकों के पास जो सरकारी गाड़ियां हैं, वे दस साल पुरानी हो चुकी हैं। प्रस्ताव में इस बात का हवाला दिया गया था कि दिल्ली सरकार द्वारा 10 साल पुराने डीजल वाहनों के दिल्ली में प्रवेश पर रोक लगा दिए जाने के कारण पंजाब के कई सांसदों को किराए के वाहनों से दिल्ली आना-जाना पड़ता है।