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कांग्रेस ने तेज की गठजोड़ की कवायद, बसपा को मनाने में जुटी
अखिल तलवार/ अमर उजाला, चंडीगढ़
Updated Thu, 13 Mar 2014 12:39 PM IST
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समझौतों की बैसाखी के सहारे लोकसभा की चुनाव की नैय्या पार करने में जुटी कांग्रेस ने गठजोड़ की कवायद तेज कर दी है।
पीपीपी से गठजोड़ के औपचारिक ऐलान के बाद अब कांग्रेस की निगाहें बसपा की तरफ है। कांग्रेस ने बसपा को मनाने की कोशिशें तेज कर दी हैं। पंजाब के बाद अब यूपी में भी बसपा के साथ तालमेल को लेकर बात शुरू हो गई है।
देश भर में कांग्रेस के खिलाफ चल रही लहर के बीच सीटें निकालना आसान नहीं है।
इस बात को समझते हुए प्रदेश कांग्रेस प्रधान प्रताप सिंह बाजवा ने इस बार गठबंधन की रणनीति बनाई है। बाजवा की नजर छोटी पार्टियों के वोट बैंक पर है।
रणनीति के तहत इन पार्टियों को एक-दो सीटें देकर बाकी सीटों पर इनके समर्थन से जीत हासिल करने की योजना है।
इस कड़ी में सबसे पहला गठबंधन पीपीपी के साथ किया गया। आम आदमी पार्टी की दस्तक के बाद पीपीपी की जमीन दरकने लगी थी।
समझौता आसान था, लेकिन पीपीपी के साझा मोर्चा में होने के कारण तकनीकी दिक्कत आ रही थी। आखिर पीपीपी, कांग्रेस के साथ आने को राजी हो गई।
अब कांग्रेस की नजरें बसपा पर टिकीं हैं। दोनों पार्टियों के प्रदेश नेतृत्व के बीच बात तय हो गई है। संभावित समझौते के तहत कांग्रेस, बसपा को दो सीटें दे सकती है। जिनमें फतेहगढ़ साहिब के अलावा जालंधर या होशियारपुर में से एक सीट हो सकती है।
बदले में बसपा बाकी सीटों पर कांग्रेस को सपोर्ट करेगी। इसमें बड़ी अड़चन यह है कि बसपा ज्यादातर सीटों पर उम्मीदवार घोषित कर चुकी है।
वहीं, बसपा सुप्रीमो मायावती पहले ही साफ कर चुकी हैं कि किसी पार्टी के साथ चुनाव पूर्व समझौता नहीं होगा। लेकिन पंजाब में समझौते को लेकर पैरवी जारी है।
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वहीं, कांग्रेस ने यूपी में भी बसपा के साथ तालमेल की कोशिश शुरू कर दी है। कांग्रेस नेतृत्व को उम्मीद है कि दोनों राज्यों में बसपा के साथ समझौते की बात जल्द सिरे चढ़ सकती है।
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पीपीपी से गठजोड़ के औपचारिक ऐलान के बाद अब कांग्रेस की निगाहें बसपा की तरफ है। कांग्रेस ने बसपा को मनाने की कोशिशें तेज कर दी हैं। पंजाब के बाद अब यूपी में भी बसपा के साथ तालमेल को लेकर बात शुरू हो गई है।
देश भर में कांग्रेस के खिलाफ चल रही लहर के बीच सीटें निकालना आसान नहीं है।
इस बात को समझते हुए प्रदेश कांग्रेस प्रधान प्रताप सिंह बाजवा ने इस बार गठबंधन की रणनीति बनाई है। बाजवा की नजर छोटी पार्टियों के वोट बैंक पर है।
रणनीति के तहत इन पार्टियों को एक-दो सीटें देकर बाकी सीटों पर इनके समर्थन से जीत हासिल करने की योजना है।
इस कड़ी में सबसे पहला गठबंधन पीपीपी के साथ किया गया। आम आदमी पार्टी की दस्तक के बाद पीपीपी की जमीन दरकने लगी थी।
समझौता आसान था, लेकिन पीपीपी के साझा मोर्चा में होने के कारण तकनीकी दिक्कत आ रही थी। आखिर पीपीपी, कांग्रेस के साथ आने को राजी हो गई।
अब कांग्रेस की नजरें बसपा पर टिकीं हैं। दोनों पार्टियों के प्रदेश नेतृत्व के बीच बात तय हो गई है। संभावित समझौते के तहत कांग्रेस, बसपा को दो सीटें दे सकती है। जिनमें फतेहगढ़ साहिब के अलावा जालंधर या होशियारपुर में से एक सीट हो सकती है।
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बदले में बसपा बाकी सीटों पर कांग्रेस को सपोर्ट करेगी। इसमें बड़ी अड़चन यह है कि बसपा ज्यादातर सीटों पर उम्मीदवार घोषित कर चुकी है।
वहीं, बसपा सुप्रीमो मायावती पहले ही साफ कर चुकी हैं कि किसी पार्टी के साथ चुनाव पूर्व समझौता नहीं होगा। लेकिन पंजाब में समझौते को लेकर पैरवी जारी है।
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वहीं, कांग्रेस ने यूपी में भी बसपा के साथ तालमेल की कोशिश शुरू कर दी है। कांग्रेस नेतृत्व को उम्मीद है कि दोनों राज्यों में बसपा के साथ समझौते की बात जल्द सिरे चढ़ सकती है।