सख्ती का वक्त आएगा तो उंगली टेढ़ी कर लूंगा: खट्टर
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हरियाणा में सिर्फ 116 दिन पुरानी भाजपा सरकार के बारे में दावा किया जा रहा है कि उसे अफसरशाही और आंतरिक संगठन दोनों से चुनौती मिलने लगी है। सोशल मीडिया पर मंत्रियों के विवादित बयान और ब्यूरोक्रेसी की बढ़ती हिमाकत सरकार की क्षमता पर सवालिया निशान लगने लगे हैं। इस संबंध में हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर से अमर उजाला के स्थानीय संपादक संजय अभिज्ञान और प्रमुख संवाददाता प्रवीण पाण्डेय की एक्सक्लूसिव बातचीत:
प्रश्न: अक्तूबर में आपकी ताजपोशी के वक्त लोगों ने आपको छोटा मोदी बताया था क्योंकि आपकी व्यक्तिगत जीवनशैली और प्रचारक का इतिहास, मोदी जी से काफी मिलता जुलता है। लेकिन जहां तक अफसरशाही पर कंट्रोल की बात है, उस मोर्चे पर आपको मोदी के मुकाबले बहुत कम क्यों आंका जा रहा है?
सीएम: देखिए, एडमिनिस्ट्रेशन भी हरियाणा के समाज का ही एक अंग है। वह अभी तक अपने एक खास तरह के सिस्टम के तहत चलता रहा है। मैं उसे देख रहा हूं और सुधार का वक्त दे रहा हूं। सीएम के रूप में अफसरों को सजा देने के बजाय सुधरने का मौका देना मेरा फर्ज है। जब सख्ती का वक्त आएगा, तब उंगली टेढ़ी कर लूंगा।
अमर उजाला: क्या इसे और स्पष्ट करना चाहेंगे?
सीएम: जी, बिल्कुल। मेरे हिसाब से राज्य की व्यवस्था के चार अंग हैं। दो एडमिनिस्ट्रेशन के - अफसरशाही और निचले कर्मचारी-- और दो जनता के-- लीडर और आम पब्लिक। ये चारों मिलकर ही व्यवस्था का चक्र बनाते हैं। इस चक्र में अगर सुधार करना है तो लीडरशिप और अफसरशाही पर पहले ध्यान देना होगा। सरकार बनाने के बाद अभी तक मेरा फोकस लीडरशिप के सुधार पर था। नेताओं के स्तर पर करप्शन और ढीलेपन को मैंने सबसे पहले संबोधित किया है। इसके बाद अफसरशाहों का नंबर आएगा। अगर वे सीधे रास्ते से नहीं चलेंगे तो दंड देना पड़ेगा।
'ट्वीट वगैरह करना विज की फितरत है'
अमर उजाला: आपने लीडरों को सुधारने की बात कही। तो क्या अनिल विज सरीखे मंत्रियों की तरफ आपका इशारा था जो लगातार सोशल मीडिया पर असहमति की फुलझड़ियां छोड़ रहे हैं? बगावत के ऐसे संकेतों के बारे में आप क्या कर रहे हैं?
सीएम: अनिल विज के साथ न तो कोई मतभेद है और न ही किसी मुद्दे पर उनसे असहमति है। मेरा और अनिल विज का पच्चीस साल पुराना साझा राजनीतिक इतिहास है। अंबाला में 1990 में उन्हें चुनाव जितवाने से लेकर आज तक यह सफर जारी है। हां, उनका अलग नेचर है। ट्वीट वगैरह करना उनकी फितरत है क्योंकि वह लंबे समय से सरकार के सिस्टम को देख रहे हैं और मैं अपेक्षाकृत नया हूं। इसीलिए किन्हीं विषयों पर उनकी अलग राय हो सकती है, लेकिन इसे किसी बगावत या असंतोष के तौर पर देखना गलत है।
अमर उजाला: भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने कहा है कि हरियाणा में बीजेपी की सरकार एक एक्सीडेंटल सरकार है। तुक्के से बन गई यह सरकार चार माह में ही हर मोर्चे पर विफल हो गई है?
सीएम: मुझे ऐसे बयानों पर तरस आता है। यह कोई पहला मौका नहीं है जब भाजपा हरियाणा में सत्ता में है। हमने बंसीलाल और देवीलाल के साथ मिलकर भी सरकार चलाई है। वर्ष 1967 से भाजपा देश के विभिन्न राज्यों में सरकारें चलाती आई हैं। ऐसे में उसे एक्सीडेंटल सरकार कहना उनकी भूल है। दरअसल खुद हुड्डा साहब के साथ एक्सीडेंट हुआ है। वे भांप ही नहीं पाए कि पब्लिक में कांग्रेस के कुशासन को लेकर कितना रोष था। खुशफहमियों में बैठे थे और अचानक कुर्सी छिन गई। इसीलिए उन्हें एक्सीडेंट जैसी उपमाएं सूझ रही हैं।
'हरियाणा में एक समानांतर अधिग्रहण व्यवस्था'
अमर उजाला: अध्यादेश के जरिए बने भूमि अधिग्रहण कानून को लेकर किसान नाखुश बताया जा रहा है। ‘आप’ और कांग्रेस दोनों ने अपर्याप्त मुआवजे और अधिग्रहण से पहले किसान की अनुमति न लेने के प्रावधान को बड़े पैमाने पर उठाने की रणनीति घोषित कर दी है। आपका इस पर नजरिया?
सीएम: यह केंद्र का कानून है। मैं मानता हूं कि बिना किसान की सहमति के, उसकी जमीन लेने से अंसतोष तो होगा। ऐसा नहीं होना चाहिए। इसलिए हम हरियाणा प्रदेश स्तर पर एक समानांतर अधिग्रहण व्यवस्था या नीति लागू करने की सोच रहे हैं।
अमर उजाला: क्या आप इस बारे में प्रदेश सरकार की सोच से केंद्र को अवगत कराएंगे या हरियाणा भाजपा के तरफ से केंद्र को इस बारे में पुनर्विचार के लिए कहा गया है?
सीएम: नहीं, पुनर्विचार के लिए अभी तक हमने नहीं कहा है। लेकिन हम अपने स्तर पर इस कानून में संशोधन की बात पर विचार कर सकते हैं। प्रदेश स्तर पर केंद्रीय कानून के समानांतर नई नीति बनाने पर भी विचार संभव है। केंद्रीय बिल अपनी जगह रहे, हम अपनी कोई व्यवस्था बनाएंगे और केंद्र को इस बारे में सूचित कर देंगे।
मुफ्तखोरी के सब्जबाग दिखाकर 'आप' कामयाब
अमर उजाला: और यूरिया की भयानक किल्लत? कहा जा रहा है कि यह खट्टर सरकार के मिसमैनेजमेंट का नतीजा है?
सीएम: यूरिया की किल्लत हमें विरासत में मिली। ऐसी किल्लतें दो दिन में नहीं पैदा होतीं। 26 मई को केंद्र में सरकार बनी और जून में यूरिया संकट शुरू हो गया तो इसका ठीकरा भाजपा सरकार के सिर नहीं फोड़ा जा सकता। समस्या की जड़ें उससे छह माह पहले ही पनपने लगी थीं। बाद में केंद्र ने सप्लाई सुधारने के कदम उठाए तो नवंबर तक आकर केंद्र में हालात दुरुस्त हुए और फिर दिसंबर में हरियाणा में सप्लाई सुधरी।
अमर उजाला: और आगे के लिए क्या इंतजाम ताकि यूरिया संकट फिर से न फन उठाए?
सीएम: इसके लिए अब बीस फीसदी स्टॉक ज्यादा रखेंगे। यही नहीं, राज्य के आगामी बजट में यूरिया आपूर्ति के लिए विशेष स्कीम घोषित करने जा रहे हैं। हम सप्लाई तंत्र को डिजिटलाइज करेंगे। यूरिया को ऑनलाइन बांटने की जरूरत है ताकि कालाबाजारी और लीकेज खत्म हो।
अमर उजाला: और देश की राजधानी दिल्ली में यह क्या हो गया? हरियाणा से जुड़ी बाहरी दिल्ली की सारी सीटों पर बीजेपी का सूपड़ा साफ कैसे हो गया और उसके हरियाणा के लिए क्या मायने हैं?
सीएम: यह तो विश्लेषण का विषय है। हम तो चार दिन के लिए प्रचार की खातिर गए थे और इतने कम समय में नब्ज को समझने का दावा मैं नहीं करूंगा। इतना जरूर कहना है कि आम आदमी पार्टी ने मुफ्तखोरी के सब्जबाग दिखाकर वोटर को भरमाने में कामयाबी पा ली है और जल्दी ही मुफ्तखोरी की संस्कृति वाली राजनीति के खतरनाक पहलू दिल्ली में सामने आ जाएंगे।
अमर उजाला: दिल्ली में किरन बेदी को उतारने से बीजेपी का कार्यकर्ता रूठ गया था?
सीएम: किरन बेदी को लाने के फैसले पर मैं कोई टिप्पणी नहीं करूंगा। वह पार्टी का निर्णय था। कार्यकर्ता के मूड के बारे में भी मैं कोई दावा नहीं कर सकता क्योंकि हम लंबे समय तक दिल्ली में नहीं थे।
अमर उजाला: क्या घर वापसी, चर्च पर हमले और लव जेहाद जैसे मुद्दे भारी पड़े?
सीएम: मैं इन पर कोई कमेंट नहीं करना चाहता।