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यहां बिजली खपत में चल रहा है करोड़ों का खेल
डॉ. सुरेंद्र धीमान
Updated Fri, 03 Jan 2014 01:12 PM IST
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दिल्ली में बिजली कंपनियों की आमदनी और खर्च का पता लगाने के लिए ‘आप’ की सरकार ने ऑडिट कराने का फैसला किया है, लेकिन हरियाणा में कृषि में बिजली खपत का ऑडिट नहीं हो रहा है। दोनों बिजली वितरण कंपनियां कृषि खपत में आंकड़े बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर रही हैं।
सीनियर आईएएस अशोक खेमका ने भी दावा किया था कि कंपनियां घाटा पूरा करने के लिए कृषि में बिजली की खपत को छह गुना ज्यादा दिखाती हैं। इससे हरियाणा सरकार के खजाने पर हर साल करोड़ों रुपये का बोझ पड़ रहा है।
प्रदेश में दो बिजली वितरण कंपनियां उत्तर हरियाणा और दक्षिण हरियाणा बिजली वितरण निगम हैं। दोनों निगमों के पास कृषि नलकूप कनेक्शन हैं। करीब आधे नलकूपों पर मीटर लगे हैं और आधे कनेक्शनों पर मीटर नहीं हैं।
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हरियाणा सरकार ने कृषि नलकूपों के लिए लगभग मुफ्त बिजली देने की सुविधा दे रखी है। किसानों को सिर्फ 25 पैसे प्रति यूनिट देना होता है जबकि शेष राशि राज्य सरकार सब्सिडी के रूप में कंपनियों को सीधे देती है।
किसानों को यूनिट अनुसार या मोटर के लोड अनुसार बिल दिया जाता है। इसी खपत में खेल हो रहा है, जिस पर खेमका ने सवाल खड़े किए थे।
छह गुना फालतू दिखाई जाती है कृषि बिजली : खेमका
प्रदेश सरकार ने 2007 में अशोक खेमका को कृषि विभाग का निदेशक नियुक्त किया था। उन्होंने निदेशक के नाते हरियाणा सरकार को पत्र लिखकर कहा था कि कृषि क्षेत्र में दोनों बिजली वितरण निगम चोरी और भ्रष्टाचार छिपाने के लिए वास्तविक खपत से छह गुना बिजली खर्च दिखाते हैं।
खेमका ने सलाह दी थी कि अगर सब्सिडी का पैसा किसानों के खाते में सीधा जाए तो सब्सिडी छह गुना कम हो सकती है। खेमका के पत्र का हरियाणा सरकार ने इतना बुरा माना कि उनका फौरन वहां से तबादला कर दिया था।
आयोग का दावा, फालतू आंकड़े दायर करते हैं निगम
हरियाणा बिजली नियामक आयोग ने 30 मार्च, 2013 को दोनों बिजली वितरण निगमों की सालाना राजस्व जरूरत (एआरआर) पर फैसला सुनाते हुए लिखा था, ‘दोनों बिजली वितरण निगमों ने 2009-10 में कृषि सप्लाई फीडर अलग कर लिए थे।
उत्तर हरियाणा ने 2010-11, 11-12 में 14.93 फीसदी की बढ़ोतरी दिखाई जबकि 2012-13 (दिसंबर तक) में 12.95 फीसदी की बढ़ोतरी दिखाई। अगर कनेक्टेड लोड देखें तो सिर्फ 3.22 फीसदी की बढ़ोतरी हुई थी जबकि एक जनवरी 2012 से 31 दिसंबर, 2012 तक सिर्फ 3.96 फीसदी।
इसी तरह दक्षिण हरियाणा बिजली वितरण निगम ने 18.9 फीसदी की बढ़ोतरी दिखाई थी। इसी तरह 2013-14 की एआरआर का फैसला सुनाते समय आयोग ने उत्तर हरियाणा की 513.30 करोड़ यूनिट घटाकर 439.70 करोड़ और दक्षिण हरियाणा की 423.10 करोड़ यूनिट आयोग ने घटाकर 371.2 यूनिट कर दी थी।
दस साल में 5200 करोड़ हो गई सब्सिडी
बिजली नियामक आयोग ने 2004-05 की एआरआर का फैसला सुनाया था। तब कृषि क्षेत्र में बिजली खपत पर हरियाणा सरकार को 1073 करोड़ रुपये की सब्सिडी देनी थी।
अब 2014-15 में दोनों निगमों ने 5169 करोड़, 2015-16 में 5469 करोड़ और 2016-17 में 5793 करोड़ रुपये की प्रस्तावित सब्सिडी दिखाई है।
हमारे कृषि के फीडर अलग हैं। सभी पर मीटर लगे हैं। जितनी बिजली फीडर पर जाती है उसमें दर्ज होती है। जितने बिल किसानों की तरफ बनते हैं। उससे अंतर निकाल लिया जाता है। उसके अनुसार सब्सिडी ली जाती है। यह कहना बिल्कुल गलत है कि कृषि में खपत ज्यादा दिखाई जाती है। वास्तविक खपत ही एआरआर में दिखाई जाती है। हमारी कंपनियों का हर साल कैग की तरफ से ऑडिट होता है।
- अनुराग अग्रवाल, प्रबंध निदेशक, उत्तर-दक्षिण हरियाणा बिजली वितरण निगम।
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सीनियर आईएएस अशोक खेमका ने भी दावा किया था कि कंपनियां घाटा पूरा करने के लिए कृषि में बिजली की खपत को छह गुना ज्यादा दिखाती हैं। इससे हरियाणा सरकार के खजाने पर हर साल करोड़ों रुपये का बोझ पड़ रहा है।
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प्रदेश में दो बिजली वितरण कंपनियां उत्तर हरियाणा और दक्षिण हरियाणा बिजली वितरण निगम हैं। दोनों निगमों के पास कृषि नलकूप कनेक्शन हैं। करीब आधे नलकूपों पर मीटर लगे हैं और आधे कनेक्शनों पर मीटर नहीं हैं।
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हरियाणा सरकार ने कृषि नलकूपों के लिए लगभग मुफ्त बिजली देने की सुविधा दे रखी है। किसानों को सिर्फ 25 पैसे प्रति यूनिट देना होता है जबकि शेष राशि राज्य सरकार सब्सिडी के रूप में कंपनियों को सीधे देती है।
किसानों को यूनिट अनुसार या मोटर के लोड अनुसार बिल दिया जाता है। इसी खपत में खेल हो रहा है, जिस पर खेमका ने सवाल खड़े किए थे।
छह गुना फालतू दिखाई जाती है कृषि बिजली : खेमका
प्रदेश सरकार ने 2007 में अशोक खेमका को कृषि विभाग का निदेशक नियुक्त किया था। उन्होंने निदेशक के नाते हरियाणा सरकार को पत्र लिखकर कहा था कि कृषि क्षेत्र में दोनों बिजली वितरण निगम चोरी और भ्रष्टाचार छिपाने के लिए वास्तविक खपत से छह गुना बिजली खर्च दिखाते हैं।
खेमका ने सलाह दी थी कि अगर सब्सिडी का पैसा किसानों के खाते में सीधा जाए तो सब्सिडी छह गुना कम हो सकती है। खेमका के पत्र का हरियाणा सरकार ने इतना बुरा माना कि उनका फौरन वहां से तबादला कर दिया था।
आयोग का दावा, फालतू आंकड़े दायर करते हैं निगम
हरियाणा बिजली नियामक आयोग ने 30 मार्च, 2013 को दोनों बिजली वितरण निगमों की सालाना राजस्व जरूरत (एआरआर) पर फैसला सुनाते हुए लिखा था, ‘दोनों बिजली वितरण निगमों ने 2009-10 में कृषि सप्लाई फीडर अलग कर लिए थे।
उत्तर हरियाणा ने 2010-11, 11-12 में 14.93 फीसदी की बढ़ोतरी दिखाई जबकि 2012-13 (दिसंबर तक) में 12.95 फीसदी की बढ़ोतरी दिखाई। अगर कनेक्टेड लोड देखें तो सिर्फ 3.22 फीसदी की बढ़ोतरी हुई थी जबकि एक जनवरी 2012 से 31 दिसंबर, 2012 तक सिर्फ 3.96 फीसदी।
इसी तरह दक्षिण हरियाणा बिजली वितरण निगम ने 18.9 फीसदी की बढ़ोतरी दिखाई थी। इसी तरह 2013-14 की एआरआर का फैसला सुनाते समय आयोग ने उत्तर हरियाणा की 513.30 करोड़ यूनिट घटाकर 439.70 करोड़ और दक्षिण हरियाणा की 423.10 करोड़ यूनिट आयोग ने घटाकर 371.2 यूनिट कर दी थी।
दस साल में 5200 करोड़ हो गई सब्सिडी
बिजली नियामक आयोग ने 2004-05 की एआरआर का फैसला सुनाया था। तब कृषि क्षेत्र में बिजली खपत पर हरियाणा सरकार को 1073 करोड़ रुपये की सब्सिडी देनी थी।
अब 2014-15 में दोनों निगमों ने 5169 करोड़, 2015-16 में 5469 करोड़ और 2016-17 में 5793 करोड़ रुपये की प्रस्तावित सब्सिडी दिखाई है।
हमारे कृषि के फीडर अलग हैं। सभी पर मीटर लगे हैं। जितनी बिजली फीडर पर जाती है उसमें दर्ज होती है। जितने बिल किसानों की तरफ बनते हैं। उससे अंतर निकाल लिया जाता है। उसके अनुसार सब्सिडी ली जाती है। यह कहना बिल्कुल गलत है कि कृषि में खपत ज्यादा दिखाई जाती है। वास्तविक खपत ही एआरआर में दिखाई जाती है। हमारी कंपनियों का हर साल कैग की तरफ से ऑडिट होता है।
- अनुराग अग्रवाल, प्रबंध निदेशक, उत्तर-दक्षिण हरियाणा बिजली वितरण निगम।