अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस: यूआईईटी की वैज्ञानिक डॉ. निशिमा वांगू ने खतरनाक बीमारियों से बचाव के लिए शोध से जगाई आस
डॉ. निशिमा विज्ञान और कम्युनिकेशन के क्षेत्र में काम करने वाली देश की उन 75 महिलाओं में शामिल हैं, जिन पर गवर्नमेंट ऑफ इंडिया और रेड डॉट फाउंडेशन की ओर से किताब प्रकाशित की गई है।
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चंडीगढ़ की पंजाब यूनिवर्सिटी के यूनिवर्सिटी इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी (यूआईईटी) की वैज्ञानिक डॉ. निशिमा वांगू ने वैज्ञानिक शोध के जरिए खतरनाक बीमारियों से बचाव के प्रयास कर देशभर में खास मुकाम हासिल किया है। डॉ. निशिमा वांगू नैनो फाइब्रिल्स ऑफ नेचुरल अमीनो एसिड पर काम कर रही हैं। उनका काम डायग्नोस्टिक और थैरेप्यूटिक दोनों क्षेत्रों में है।
उन्होंने थोड़े समय पहले ही गोल्ड और नेचुरल अमीनो एसिड के जरिए गोल्ड पार्टिकल बनाए हैं, जिससे न्यूरोडीजेनरेटिव बीमारियों के इलाज में मदद मिलेगी। इससे अल्जाइमर (भूलने की बीमारी) और पार्किंसन की पहचान करने में सहायता मिलेगी। पार्किंसन ऐसी बीमारी है, जो मनुष्य के तंत्रिका तंत्र को प्रभावित करती है, जो हमारे शरीर के अंगों में कंपन महसूस होता है।
महिलाओं को विज्ञान के क्षेत्र में प्रेरित करने और उन्हें एकजुट करने के लिए डॉ. निशिमा वुमन इन साइंस के नाम से वर्ष 2020 से राष्ट्र स्तरीय कार्यक्रम करवा रही हैं। डॉ. निशिमा विज्ञान और कम्युनिकेशन के क्षेत्र में काम करने वाली देश की उन 75 महिलाओं में शामिल हैं, जिन पर गवर्नमेंट ऑफ इंडिया और रेड डॉट फाउंडेशन की ओर से किताब प्रकाशित की गई है। इसके साथ ही डॉ. निशिमा महिलाओं को विज्ञान के क्षेत्र में आगे लाने के लिए भी प्रयासरत हैं, जिससे महिलाएं पुरुषों के साथ विज्ञान और टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में कंधे से कंधा मिला सकें।
शिप्रा ने गरीब बच्चों को दिए पंख, अब शिक्षा के आसमान में भर रहे उड़ान
चंडीगढ़ के गांव और कालोनियों में रहने वाले कई गरीब लोग यह मान चुके थे कि महंगाई के इस दौर में शिक्षा उनके बच्चों के लिए नहीं है। बच्चे भी पढ़ाई छोड़कर स्कूल नहीं जाते थे। इन बच्चों को पढ़ाई से दूर होते देख शिप्रा आगे आईं और ऐसे बच्चों का भविष्य सुधारने का संकल्प लिया। उन्होंने इन बच्चों को नि:शुल्क पढ़ाना शुरू किया। मेहनत रंग लाई। सेक्टर-25 स्थित यूआईटी कैंपस में परवाज फाउंडेशन की संस्थापक शिप्रा अपने साथियों के साथ धनास, डड्डूमाजरा, नयागांव सहित कई कालोनियों के बच्चों को पढ़ाती हैं। पांच बच्चों से शुरू हुआ यह सफर आज छठवीं से लेकर 12वीं तक के 500 बच्चों तक पहुंच गया है। सबकी अलग-अलग कक्षाएं लग रहीं हैं। इसमें शिप्रा को पीयू और उससे संबद्ध कॉलेजों के शिक्षकों का भी पूरा सहयोग मिल रहा है।
कोरोना काल में भी बच्चों की मदद की ताकि पढ़ाई न रुके
कोरोना काल में जब कक्षाएं ऑनलाइन चलने लगीं तब बच्चों के सामने एक बार फिर पढ़ाई का संकट खड़ा हो गया। जैसे-तैसे बच्चों ने मोबाइल तो खरीद लिया लेकिन इंटरनेट के लिए पैसे नहीं थी। ऐसे में शिप्रा के फाउंडेशन ने बच्चों को इंटरनेट की सुविधा मुहैया करवाई। इसके बाद इन बच्चों की ऑनलाइन कक्षाएं चलीं। खास बात यह रही कि शहर के बाहर के शिक्षकों ने भी आसानी से कक्षाएं लेकर बच्चों को पढ़ाया।
घरों में काम करने वाली महिलाओं को भी किया शिक्षित
कोरोना काल में जब कोठियों व घरों में काम करने वालीं महिलाओं के पास कोई काम नहीं था, तब शिप्रा और उनकी टीम ने इन महिलाओं को भी शिक्षित करने का काम किया। शिप्रा ने बताया कि 50 महिलाओं का एक बैच हमने शिक्षित किया। यह हमारे जीवन का सबसे अलग अनुभव था, क्योंकि एक महिला शिक्षित होती है तो पूरा परिवार शिक्षित होता है।