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'प्लीज, लागू करें मेडिकेयर सर्विस एक्ट'
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़
Updated Wed, 05 Feb 2014 10:59 PM IST
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मेडिकोज लीगल एक्शन ग्रुप (एमएलएजी) ने ‘मेडिकेयर सर्विस पर्सनल एंड मेडिकेयर सर्विस इंस्टीट्यूशन (प्रीवेंशन ऑफ वायलेंस एंड डेमेज टू प्रॉपर्टी) एक्ट’ को चंडीगढ़ में अपनाए जाने और इसे अधिसूचित किए जाने की मांग फिर से उठाई है।
एमएलएजी के कनवीनर डा. नीरज नागपाल ने बताया कि डाक्टरी पेशा आज की तारीख में बड़ा जोखिमपूर्ण होता जा रहा है। उन्होंने बताया कि आए दिन डाक्टरों को मरीजों और उनके तीमारदारों के गुस्से का शिकार बनना पड़ता है।
इस अधिनियम के तहत, चिकित्सकीय पेशे में लगे सेवाप्रदाताओं पर बरपाई गई हिंसा को दंडनीय एवं गैर-जमानती अपराध की श्रेणी में रखा गया है।
अधिनियम में वर्णित प्रावधानों के अलावा, दोषी से उस नुकसान के एवज में दोगुनी भरपाई कराए जाने का नियम है, जिसे अदा किए जाने के आदेश संबंधित आरोपी को हिंसा और तोड़फोड़ का दोषी ठहराए जाने के बाद अदालती फैसलों में दिए जाते हैं।
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एमएलएजी ने कहा कि पूरे देश में 18 प्रदेशों और केंद्र शासित प्रदेशों में यह अधिनियम पहले ही अधिसूचित हो चुका है, जिनमें आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, गोवा, गुजरात, हरियाणा, केरल, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, उड़ीसा, पंजाब, राजस्थान, तमिलनाडू, त्रिपुरा, उत्तर प्रदेश और प. बंगाल आदि प्रमुख हैं।
चंडीगढ़ के डाक्टरों को दुर्भाग्यवश इस अधिनियम के तहत यूटी प्रशासन की ओर से अभी सुरक्षा नहीं मिल पाई है। प्रशासन के इसे लागू कराने में बरते जा रहे ढुलमुल रवैये पर रोष जताते हुए डा. नागपाल ने बताया कि आईएमए और एमएलएजी दोनों की ओर से संबंधित अधिकारियों को कई बार इस खामी को दुरुस्त कराने की गुहार लगाई जा चुकी है।
डा. नागपाल ने दलील दी कि चाहिए तो यह था कि चंडीगढ़ अपने यहां सबसे पहले इस अधिनियम को लागू कराने की पहल कराता पर दुर्भाग्यवश ये सभी दलीलें और जरूरतें बहरे प्रशासन के कानों तक नहीं पहुंच पाईं।
दरअसल, प्रशासन जागता तभी है जब कोई बेहद दुर्भाग्यशाली वारदात शहर में हो चुकी होती है, पर तब तक बड़ी देर हो जाती है और फिर कड़े कानून की खास अहमियत भी नहीं रहती।
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एमएलएजी के कनवीनर डा. नीरज नागपाल ने बताया कि डाक्टरी पेशा आज की तारीख में बड़ा जोखिमपूर्ण होता जा रहा है। उन्होंने बताया कि आए दिन डाक्टरों को मरीजों और उनके तीमारदारों के गुस्से का शिकार बनना पड़ता है।
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इस अधिनियम के तहत, चिकित्सकीय पेशे में लगे सेवाप्रदाताओं पर बरपाई गई हिंसा को दंडनीय एवं गैर-जमानती अपराध की श्रेणी में रखा गया है।
अधिनियम में वर्णित प्रावधानों के अलावा, दोषी से उस नुकसान के एवज में दोगुनी भरपाई कराए जाने का नियम है, जिसे अदा किए जाने के आदेश संबंधित आरोपी को हिंसा और तोड़फोड़ का दोषी ठहराए जाने के बाद अदालती फैसलों में दिए जाते हैं।
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एमएलएजी ने कहा कि पूरे देश में 18 प्रदेशों और केंद्र शासित प्रदेशों में यह अधिनियम पहले ही अधिसूचित हो चुका है, जिनमें आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, गोवा, गुजरात, हरियाणा, केरल, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, उड़ीसा, पंजाब, राजस्थान, तमिलनाडू, त्रिपुरा, उत्तर प्रदेश और प. बंगाल आदि प्रमुख हैं।
चंडीगढ़ के डाक्टरों को दुर्भाग्यवश इस अधिनियम के तहत यूटी प्रशासन की ओर से अभी सुरक्षा नहीं मिल पाई है। प्रशासन के इसे लागू कराने में बरते जा रहे ढुलमुल रवैये पर रोष जताते हुए डा. नागपाल ने बताया कि आईएमए और एमएलएजी दोनों की ओर से संबंधित अधिकारियों को कई बार इस खामी को दुरुस्त कराने की गुहार लगाई जा चुकी है।
डा. नागपाल ने दलील दी कि चाहिए तो यह था कि चंडीगढ़ अपने यहां सबसे पहले इस अधिनियम को लागू कराने की पहल कराता पर दुर्भाग्यवश ये सभी दलीलें और जरूरतें बहरे प्रशासन के कानों तक नहीं पहुंच पाईं।
दरअसल, प्रशासन जागता तभी है जब कोई बेहद दुर्भाग्यशाली वारदात शहर में हो चुकी होती है, पर तब तक बड़ी देर हो जाती है और फिर कड़े कानून की खास अहमियत भी नहीं रहती।