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हरियाणा विधानसभा भंग: सैनी गवर्नमेंट की कैबिनेट ने प्रस्ताव को दी मंजूरी, नई सरकार तक बने रहेंगे कार्यवाहक CM
Wed, 11 Sep 2024 09:08 PM IST
अंकेश ठाकुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
Published by: अंकेश ठाकुर
Updated Wed, 11 Sep 2024 09:08 PM IST
सार
हरियाणा विधानसभा चुनाव के लिए नामांकन प्रक्रिया के बीच बुधवार को नायब सिंह सैनी ने कैबिनेट की बैठक बुलाई थी। बैठक बुलाकर 14वीं विधानसभा को भंग करने का प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। अब नई सरकार बनने तक नायब सैनी कार्यवाहक मुख्यमंत्री बने रहेंगे।
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हरियाणा कैबिनेट की बैठक।
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
हरियाणा विधानसभा चुनाव से ठीक पहले सैनी सरकार ने कैबिनेट की बैठक बुलाकर 14वीं विधानसभा को भंग करने का प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। अब इस प्रस्ताव को राज्यपाल की स्वीकृति के पास भेजा जाएगा। राज्यपाल की मंजूरी के बाद विधानसभा भंग हो जाएगी। विधानसभा सचिवालय से अधिसूचना जारी होने के बाद मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी नई सरकार बनने तक कार्यवाहक सीएम बने रहेंगे।
वहीं, मंत्री भी कार्यवाहक और विधायक पूर्व कहलाएंगे। दरअसल, विधानसभा का सत्र नहीं बुलाए जाने की वजह से सैनी सरकार संवैधानिक संकट में फंस गई थी। इस संकट से निपटने के लिए सरकार ने विधानसभा भंग का फैसला किया है।
भारत के संविधान के अनुच्छेद 174 के मुताबिक दो सत्रों के बीच छह महीने से ज्यादा का अंतर नहीं होना चाहिए। नायब सिंह सैनी की सरकार ने 13 मार्च को आखिरी बार विधानसभा का सत्र बुलाया था। इसके बाद सरकार की तरफ से कई बार सत्र बुलाए जाने की बात कही गई, लेकिन इसे अमल में नहीं लाया जा सका। सत्र बुलाने की आखिरी डेडलाइन 12 सितंबर है। मगर चुनाव होने के कारण अब सत्र नहीं बुलाया जा सकता।
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जिसकी वजह से सरकार के पास विधानसभा भंग करने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं था। कैबिनेट की सिफारिश के बाद राज्यपाल विधानसभा को भंग कर देंगे। हरियाणा विधानसभा का कार्यकाल 3 नवंबर तक था। विधानसभा का सत्र नहीं बुलाए जाने पर हाईकोर्ट के एडवोकेट हेमंत कुमार ने राष्ट्रपति कार्यालय समेत अन्य जगहों पर ज्ञापन भी सौंपा था।
विधानसभा सत्र क्यों नहीं बुलाया
विधानसभा सत्र बुलाए नहीं जाने के पीछे के एक बड़ा कारण सरकार के पास बहुमत नहीं होना था। पहले दस विधायकों वाली जजपा ने समर्थन वापस लिया और बाद में तीन निर्दलीय विधायकों ने समर्थन वापस ले लिया था। इससे विधानसभा में अंकगणित बदला और सरकार अल्पमत में आ गई थी। हालांकि सरकार ने कई बार दावा किया कि उसके पास समर्थन पूरा है। वहीं, दूसरा एक कारण विधानसभा चुनावों की घोषणा जल्द होना। इस बार विधानसभा चुनाव महीने भर पहले घोषित कर दिए गए। इससे राजनीतिक दल और उनके विधायक चुनाव की तैयारियों में व्यस्त हो गए।
विधानसभा भंग नहीं करती तो सरकार की होती आलोचना
संवैधानिक कानून के जानकार हेमंत कुमार ने बताया यदि सरकार विधानसभा का सत्र न बुलाने के साथ विधानसभा को भंग नहीं करती तो नायब सैनी सरकार की संवैधानिक प्रावधानों के उल्लंघन के लिए आलोचना होती। यहां तक सरकार को बर्खास्त करने की मांग भी की जा सकती थी।
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वहीं, मंत्री भी कार्यवाहक और विधायक पूर्व कहलाएंगे। दरअसल, विधानसभा का सत्र नहीं बुलाए जाने की वजह से सैनी सरकार संवैधानिक संकट में फंस गई थी। इस संकट से निपटने के लिए सरकार ने विधानसभा भंग का फैसला किया है।
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भारत के संविधान के अनुच्छेद 174 के मुताबिक दो सत्रों के बीच छह महीने से ज्यादा का अंतर नहीं होना चाहिए। नायब सिंह सैनी की सरकार ने 13 मार्च को आखिरी बार विधानसभा का सत्र बुलाया था। इसके बाद सरकार की तरफ से कई बार सत्र बुलाए जाने की बात कही गई, लेकिन इसे अमल में नहीं लाया जा सका। सत्र बुलाने की आखिरी डेडलाइन 12 सितंबर है। मगर चुनाव होने के कारण अब सत्र नहीं बुलाया जा सकता।
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जिसकी वजह से सरकार के पास विधानसभा भंग करने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं था। कैबिनेट की सिफारिश के बाद राज्यपाल विधानसभा को भंग कर देंगे। हरियाणा विधानसभा का कार्यकाल 3 नवंबर तक था। विधानसभा का सत्र नहीं बुलाए जाने पर हाईकोर्ट के एडवोकेट हेमंत कुमार ने राष्ट्रपति कार्यालय समेत अन्य जगहों पर ज्ञापन भी सौंपा था।
विधानसभा सत्र क्यों नहीं बुलाया
विधानसभा सत्र बुलाए नहीं जाने के पीछे के एक बड़ा कारण सरकार के पास बहुमत नहीं होना था। पहले दस विधायकों वाली जजपा ने समर्थन वापस लिया और बाद में तीन निर्दलीय विधायकों ने समर्थन वापस ले लिया था। इससे विधानसभा में अंकगणित बदला और सरकार अल्पमत में आ गई थी। हालांकि सरकार ने कई बार दावा किया कि उसके पास समर्थन पूरा है। वहीं, दूसरा एक कारण विधानसभा चुनावों की घोषणा जल्द होना। इस बार विधानसभा चुनाव महीने भर पहले घोषित कर दिए गए। इससे राजनीतिक दल और उनके विधायक चुनाव की तैयारियों में व्यस्त हो गए।
विधानसभा भंग नहीं करती तो सरकार की होती आलोचना
संवैधानिक कानून के जानकार हेमंत कुमार ने बताया यदि सरकार विधानसभा का सत्र न बुलाने के साथ विधानसभा को भंग नहीं करती तो नायब सैनी सरकार की संवैधानिक प्रावधानों के उल्लंघन के लिए आलोचना होती। यहां तक सरकार को बर्खास्त करने की मांग भी की जा सकती थी।