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पढ़ाई के प्रति गजब के जज्बे के आगे नतमस्तक हुई दिव्यांगता, छात्र को करें सेल्यूट
ब्यूरो/अमर उजाला, रोड़ी(हरियाणा)
Updated Fri, 10 Mar 2017 01:14 PM IST
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कुछ कर गुजरने का जज्बा और हौंसला हो तो दिव्यांगता भी सफलता के रास्ते में नहीं आती। आपको सुना रहे हैं, ऐसे ही एक स्टूडेंट की कहानी। हरियाणा के एक गांव रोड़ी में दिव्यांग छात्र गुरपाल की ओर से शिक्षा बोर्ड से उसे लेखक मुहैया करवाने की मांग के बाद विभाग ने उक्त छात्र को इसकी अनुमति दे दी है। वीरवार को छात्र का हिंदी का पेपर था जो उसने लेखक के जरिए समयावधि में पूरा कर दिया।
गौरतलब हो कि गांव रोड़ी निवासी बारहवीं कक्षा में पढ़ने वाला गुरपाल सिंह हाथों व पैरों से निशक्त होने के कारण उसे परीक्षा देने में परेशानी महसूस हो रही थी। छात्र ने हरियाणा विद्यालय शिक्षा बोर्ड को एक पत्र भेजकर अवगत करवाया कि सात मार्च से शुरू होने वाली बारहवीं की परीक्षा में उसे एक लेखक छात्र मुहैया करवाया जाए ताकि वह अपनी परीक्षा मुकम्मल ढंग से पूर्ण कर सके।
छात्र की उक्त मांग पर बोर्ड ने उसे इसकी परमिशन दे दी। मंगलवार से शुरू परीक्षा के प्रथम दिन छात्र ने अपने सहपाठी लेखक छात्र तेजेंद्र सिंह का सहयोग लेकर परीक्षा दी। दिव्यांग छात्र गुरपाल सिंह लेखक के जरिए इंग्लिश व हिंदी के दो पेपर दे चुका है। छात्र ने बताया कि वह मुंह से लिखकर भी परीक्षा दे सकता है लेकिन समय की पाबंदी आड़े आने के कारण उसे परेशानी आ रही है।
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गौरतलब हो कि गांव रोड़ी निवासी बारहवीं कक्षा में पढ़ने वाला गुरपाल सिंह हाथों व पैरों से निशक्त होने के कारण उसे परीक्षा देने में परेशानी महसूस हो रही थी। छात्र ने हरियाणा विद्यालय शिक्षा बोर्ड को एक पत्र भेजकर अवगत करवाया कि सात मार्च से शुरू होने वाली बारहवीं की परीक्षा में उसे एक लेखक छात्र मुहैया करवाया जाए ताकि वह अपनी परीक्षा मुकम्मल ढंग से पूर्ण कर सके।
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छात्र की उक्त मांग पर बोर्ड ने उसे इसकी परमिशन दे दी। मंगलवार से शुरू परीक्षा के प्रथम दिन छात्र ने अपने सहपाठी लेखक छात्र तेजेंद्र सिंह का सहयोग लेकर परीक्षा दी। दिव्यांग छात्र गुरपाल सिंह लेखक के जरिए इंग्लिश व हिंदी के दो पेपर दे चुका है। छात्र ने बताया कि वह मुंह से लिखकर भी परीक्षा दे सकता है लेकिन समय की पाबंदी आड़े आने के कारण उसे परेशानी आ रही है।
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गजब का उत्साह है गुरपाल में
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जिंदगी ने भले ही गुरपाल के साथ मजाक करते हुए उसकी सामान्य बच्चों जैसी घूमने फिरने की आजादी पर पाबंदी लगा दी
लेकिन उसके उत्साह पर नहीं। हाथों व पैरों से कोई कार्य न कर पाने के चलते गुरपाल सिंह ने मुंह में कलम लेकर ग्यारहवीं तक की परीक्षा न केवल उत्तीर्ण की अपितु उसने आठवीं व दसवीं में फर्स्ट डिवीजन लेकर ये साबित कर दिखाया कि अगर मन में कुछ कर गुजरने का इरादा बुलंद हो तो कुछ भी नामुमकिन नहीं है।
वीरवार को परीक्षा के दूसरे दिन गुरपाल सिंह चारपाई पर लेटा हुआ था और उसका सहपाठी लेखक उसे प्रश्न पत्र से प्रश्न बोलकर गुरपाल सिंह द्वारा बोला गया उत्तर लिख रहा था। बारहवीं की परीक्षा को लेकर गुरपाल सिंह ने बेहतर ढंग से तैयारी करते हुए दो पेपर सफलतापूर्वक संपन्न किए हैं।
जन्म से ही दिव्यांग है गुरपाल
करीब 18 वर्षीय गुरपाल सिंह जन्म से ही दिव्यांग है। बचपन में ही उसकी शिक्षा के प्रति अत्यधिक रूचि थी लेकिन परिजनों को उसकी अपंगता आड़े आ रही थी। जिस पर उसकी मां ने उसके बचपन में शिक्षिका की भूमिका निभाते हुए स्लेट पर गिनती लिखकर उसको शिक्षा के प्रति उत्साहित करती।
अपनी मां व बड़े भाई से मिली तालीम के बाद गुरपाल का शिक्षा के प्रति रूझान इस कदर बढ़ा कि उसकी मां व भाई उसे स्कूल में चारपाई पर छोड़कर आते और फिर वापस लाते। गुरपाल सिंह ने अपने शिक्षा के क्षेत्र को इस कदर गति दी
लेकिन उसके उत्साह पर नहीं। हाथों व पैरों से कोई कार्य न कर पाने के चलते गुरपाल सिंह ने मुंह में कलम लेकर ग्यारहवीं तक की परीक्षा न केवल उत्तीर्ण की अपितु उसने आठवीं व दसवीं में फर्स्ट डिवीजन लेकर ये साबित कर दिखाया कि अगर मन में कुछ कर गुजरने का इरादा बुलंद हो तो कुछ भी नामुमकिन नहीं है।
वीरवार को परीक्षा के दूसरे दिन गुरपाल सिंह चारपाई पर लेटा हुआ था और उसका सहपाठी लेखक उसे प्रश्न पत्र से प्रश्न बोलकर गुरपाल सिंह द्वारा बोला गया उत्तर लिख रहा था। बारहवीं की परीक्षा को लेकर गुरपाल सिंह ने बेहतर ढंग से तैयारी करते हुए दो पेपर सफलतापूर्वक संपन्न किए हैं।
जन्म से ही दिव्यांग है गुरपाल
करीब 18 वर्षीय गुरपाल सिंह जन्म से ही दिव्यांग है। बचपन में ही उसकी शिक्षा के प्रति अत्यधिक रूचि थी लेकिन परिजनों को उसकी अपंगता आड़े आ रही थी। जिस पर उसकी मां ने उसके बचपन में शिक्षिका की भूमिका निभाते हुए स्लेट पर गिनती लिखकर उसको शिक्षा के प्रति उत्साहित करती।
अपनी मां व बड़े भाई से मिली तालीम के बाद गुरपाल का शिक्षा के प्रति रूझान इस कदर बढ़ा कि उसकी मां व भाई उसे स्कूल में चारपाई पर छोड़कर आते और फिर वापस लाते। गुरपाल सिंह ने अपने शिक्षा के क्षेत्र को इस कदर गति दी