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‘रिश्तेयां दा की रखिए नां’ में बयां किया देश के बंटवारे का दर्द
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चंडीगढ़। पंजाब कला भवन में मंगलवार को नाटक ‘रिश्तेयां दा की रखिए नां’ का मंचन देखकर लोग भावुक हो गए। इसमें देश के बंटवारे के साथ ही साथ 1984 के दंगों और 1990 में कश्मीरी पंडितों के साथ हुई घटनाओं और सीएए के बाद उपजी स्थिति में दंश झेल रहे लोगों के दर्द ने दर्शकों को झकझोर दिया।
इस नाटक में छह दृश्य हैं। कलाकारों ने नाटक में भावुक कर देने वाली प्रस्तुति दी। कलाकारों ने नाटक के माध्यम से बंटवारे का दर्द को जीवंत कर दिया। नाटक के डायरेक्टर हरमन पाल सिंह का कहना है कि कलाकारों ने जीवंत दुख झेले हैं वह दुख भी दर्शकों तक पहुंचा। यही हमारी कला है जो लोगों के दिल की गहराइयों तक जाए। इन नाटक के लेखक डॉ. आत्मजीत हैं। इसे हरमन पाल सिंह ने निर्देशित किया है। इस नाटक को मंटो की कहानी टोबा टेक सिंह से लिया गया है।
नाटक में बंटवारे का दर्द दिखाया गया है। पागलखाने में कई धर्म के लोग हैं। इसमें हिंदू, मुस्लिम और सिख भी हैं। यह कहानी देश के बंटवारे के समय की है। पागलखाने में अलग-अलग वजहों से पागल होकर आए लोग हैं। देश का बंटवारा होने पर हिंदुस्तान और पाकिस्तान बन गया। पागलखाने में पागल यह कहते हैं कि हमें मत बांटो। इस नाटक में दिखाया गया है कि जो समझदार लोग हैं वह अपने चाहने वालों से दुश्मनी मोल लेते हैं, लेकिन पागलखाने के पागल एक होकर रहना चाहते हैं। इस नाटक में व्यंग्य भी है।
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नाटक में बचन सिंह नाम का एक किरदार है। वह पागल हमेशा पेड़ के पास रहता है। उसे देखता है और आखिर में वह कहता है कि टहनियां जितने भी भिड़ लें, जड़ को मजबूत रहना चाहिए। मैं जड़ को मजबूत करने के लिए मजबूर करूंगा। इस नाटक में दंगे का व्यू भी क्रिएट किया गया है। यह नाटक करीब एक घंटे पांच मिनट का है। इसमें 13 कलाकार हैं और तीन सपोर्ट कलाकार हैं।
गुरप्यार सिंह, हितेश छाबड़ा, हनी, सतपाल सिंह, बलविंदर सिंह, गुरमीत सिंह, शिवम जयसवाल, अवरिंदर सिंह, मोहित पाल, बली सिंह, रजत सचदेवा, सिमरन कौर, जसप्रीत कौर, अनुगीत ने नाटक में अपनी भूमिका निभाई है। जगदेव सिंह ने संगीत दिया है।
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इस नाटक में छह दृश्य हैं। कलाकारों ने नाटक में भावुक कर देने वाली प्रस्तुति दी। कलाकारों ने नाटक के माध्यम से बंटवारे का दर्द को जीवंत कर दिया। नाटक के डायरेक्टर हरमन पाल सिंह का कहना है कि कलाकारों ने जीवंत दुख झेले हैं वह दुख भी दर्शकों तक पहुंचा। यही हमारी कला है जो लोगों के दिल की गहराइयों तक जाए। इन नाटक के लेखक डॉ. आत्मजीत हैं। इसे हरमन पाल सिंह ने निर्देशित किया है। इस नाटक को मंटो की कहानी टोबा टेक सिंह से लिया गया है।
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नाटक में बंटवारे का दर्द दिखाया गया है। पागलखाने में कई धर्म के लोग हैं। इसमें हिंदू, मुस्लिम और सिख भी हैं। यह कहानी देश के बंटवारे के समय की है। पागलखाने में अलग-अलग वजहों से पागल होकर आए लोग हैं। देश का बंटवारा होने पर हिंदुस्तान और पाकिस्तान बन गया। पागलखाने में पागल यह कहते हैं कि हमें मत बांटो। इस नाटक में दिखाया गया है कि जो समझदार लोग हैं वह अपने चाहने वालों से दुश्मनी मोल लेते हैं, लेकिन पागलखाने के पागल एक होकर रहना चाहते हैं। इस नाटक में व्यंग्य भी है।
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नाटक में बचन सिंह नाम का एक किरदार है। वह पागल हमेशा पेड़ के पास रहता है। उसे देखता है और आखिर में वह कहता है कि टहनियां जितने भी भिड़ लें, जड़ को मजबूत रहना चाहिए। मैं जड़ को मजबूत करने के लिए मजबूर करूंगा। इस नाटक में दंगे का व्यू भी क्रिएट किया गया है। यह नाटक करीब एक घंटे पांच मिनट का है। इसमें 13 कलाकार हैं और तीन सपोर्ट कलाकार हैं।
गुरप्यार सिंह, हितेश छाबड़ा, हनी, सतपाल सिंह, बलविंदर सिंह, गुरमीत सिंह, शिवम जयसवाल, अवरिंदर सिंह, मोहित पाल, बली सिंह, रजत सचदेवा, सिमरन कौर, जसप्रीत कौर, अनुगीत ने नाटक में अपनी भूमिका निभाई है। जगदेव सिंह ने संगीत दिया है।