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Chandigarh News: पूर्व मंत्री राव नरबीर के खिलाफ आपराधिक मामला चलाने की मांग खारिज

Thu, 29 Aug 2024 05:55 AM IST
Chandigarh Bureau चंडीगढ़ ब्यूरो
Updated Thu, 29 Aug 2024 05:55 AM IST
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Demand to initiate criminal case against former minister Rao Narbir rejected, Court News, Haryana News
-चुनाव के दौरान शिक्षा से जुड़े झूठे दस्तावेज पेश करने का मामला
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-माननीयों पर लंबित मामलों के जल्द निपटारे को लेकर सुप्रीम कोर्ट के आदेश का दिया गया था हवाला

अमर उजाला ब्यूरो

चंडीगढ़। पूर्व मंत्री राव नरबीर के चुनाव के दौरान शपथ पत्र में झूठे शैक्षणिक दस्तावेज लगाने के आरोप में आपराधिक मामला चलाने की मांग को लेकर दाखिल याचिका को पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया है। इस मामले में अभी विस्तृत आदेश आना बाकी है। हाईकोर्ट में यह याचिका करीब 5 साल से विचाराधीन थी। झूठे शैक्षणिक दस्तावेज मामले में राव नरबीर के खिलाफ आपराधिक मामला चलाने की मांग को लेकर हाईकोर्ट में लंबे समय से याचिका विचाराधीन है। हाईकोर्ट ने जुलाई 2019 में पूछा था कि क्यों न राव नरबीर के खिलाफ आपराधिक मामला चलाया जाए। इसके बाद कोरोना के चलते सुनवाई टलती रही। इसी बीच याची ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला देते हुए इस याचिका पर तुरंत सुनवाई की मांग की थी। याची ने बताया था कि सुप्रीम कोर्ट माननीयों पर लंबित मामलों का छह माह में निपटारा सुनिश्चित करने का आदेश दे चुका है। लेकिन इस मामले में सुनवाई ही नहीं हो पा रही थी।

आरटीआई कार्यकर्ता हरिंदर ढीगरा ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल करते हुए बताया था कि उन्होंने 2017 में मंत्री राव नरबीर की शैक्षणिक योग्यता की जानकारी मांगी थी। उन्हें सूचना नहीं मिली और प्रथम अपील दाखिल करनी पड़ी। 1 दिसंबर 2018 को उन्हें राव नरबीर के शपथ पत्रों और शैक्षणिक योग्यता की जानकारी मिली। उन्होंने आरोप लगाया है कि राव नरबीर ने झूठे शैक्षणिक पत्र दाखिल किए है। ढींगरा ने बताया कि राव नरवीर ने 2005, 2009 और 2014 में चुनाव लड़े और शपथ पत्र दाखिल किए। उन्होंने 2005 में शपथपत्र में बताया कि उन्होंने दसवीं 1976 में उत्तर प्रदेश से की है। 2009 के चुनाव में शपथ पत्र दाखिल कर बताया कि उन्होंने दसवीं बिरला विद्या मंदिर, नैनीताल से की है। उन्होंने 1986 में हिंदी साहित्य में हिंदी साहित्य सम्मेलन प्रयाग से ग्रेजुएशन करने की बात कही है। आरोप है कि सुप्रीम कोर्ट ने 2010 में एक मामले की सुनवाई के दौरान कहा था कि हिंदी साहित्य सम्मेलन को विश्वविद्यालय या बोर्ड की मान्यता नहीं है और ऐसे में इससे डिग्री लेकर सरकारी नौकरी लगे लोगों को हटाया जाए। इससे पहले याचिकाकर्ता ने गुड़गांव कोर्ट में भी यह याचिका दायर की थी लेकिन गुड़गांव कोर्ट ने उसकी यह याचिका खारिज कर दी थी।
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